संविधान सभा में नेहरू का ऐतिहासिक भाषण

09:12 am Jan 26, 2023 | सत्य ब्यूरो

भारत की संविधान सभा का गठन 1946 में हुआ था. उस समय तक भारत विधिवत आज़ाद नहीं हुआ था. परंतु 14 अगस्त, 1947 को मध्य रात्रि में संविधान सभा ने आज़ाद भारत की सर्वोच्च शक्ति सम्पन्न संस्था के रूप में आज़ाद भारत की सत्ता ग्रहण की थी. वह क्षण हमारे देश का प्रसन्नता, आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर था. उस दिन ठीक रात्रि के 12 बजे संविधान सभा ने एक प्रस्ताव स्वीकार कर सत्ता के हस्तांतरण को स्वीकार किया था. ठीक रात्रि के 12 बजे संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने एक अत्यधिक महत्वपूर्ण शपथ सदस्यों को दिलाई थी और उसी के माध्यम से देश की सत्ता संचालन का अधिकार संविधान सभा में निहित किया गया था. उसी रात्रि संविधान सभा ने यह भी तय किया था कि लार्ड माउंटबैटन आज़ाद भारत के प्रथम गवर्नर जनरल होंगे. 

उसी रात्रि दो और महत्वपूर्ण घटनाएं घटी थीं. संविधान सभा ने हमारे देश के राष्ट्रध्वज को स्वीकार किया था. उस ध्वज को संविधान सभा की महिला सदस्यों ने विधिवत रूप से संविधान सभा के अध्यक्ष को सौंपा था. उसी रात श्रीमती सुचिता कृपलानी ने संविधान सभा में डॉ. इकबाल द्वारा रचित सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा और रविन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित राष्ट्र गीत जन गण मन गाया था.

उस रात्रि संविधान सभा की विशेष बैठक सर्वप्रथम आज़ादी के आंदोलन के शहीदों को श्रद्धाजंलि के साथ प्रारंभ हुई थी. श्रद्धाजंलि के बाद संविधान सभा के अध्यक्ष ने पंडित जवाहरलाल नेहरू से उस प्रस्ताव को पेश करने का अनुरोध किया, जो एक ऐतिहासिक दस्तावेज बनकर रह गया. पंडित नेहरू ने अपने भाषण का प्रारंभ करते हुए कहा था कि वर्षों पूर्व हमने नियति से एक वादा किया था. हमने एक शपथ ली थी, एक प्रतिज्ञा ली थी. आज उस प्रतिज्ञा को पूरा करने का अवसर आ गया है. शायद वह प्रतिज्ञा अभी सही मायने में पूरी नहीं हुई है परंतु उसकी पूर्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम आज उठाया है. कुछ ही क्षणों में यह सभा एक पूर्ण रूप से स्वतंत्रत एवं आत्मनिर्भर सभा का रूप ले लेगी और एक आज़ाद मुल्क के प्रतिनिधि के रूप में अपने उत्तरदायित्वों को निभाएगी. 

हमारे ऊपर बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां आ गई हैं. यदि हम इन ज़िम्मेदारियों के महत्व को नहीं समझेंगे तो हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन ठीक से नहीं कर पाएंगे. इसलिए हम जो शपथ आज ले रहे हैं उसके असली अर्थ को समझना होगा. मैं जो प्रस्ताव अभी पेश कर रहा हूं वह उसी शपथ का हिस्सा है. सच पूछा जाए तो आज हमारे संघर्ष का पहला अध्याय समाप्त हुआ और आज प्रसन्नता का अवसर है. हमारे हृदय प्रफुल्लित हैं. ये हमारे गर्व और संतोष के क्षण हैं. परंतु हमें यह भी भी महसूस हो रहा है कि संपूर्ण देश इन खुशियों को मनाने की स्थिति में नहीं है. 

भारी संख्या में लोगों के दिल दुःखी हैं. दिल्ली के आसपास चारों तरफ आग लगी हुई है और उसकी आंच इस सभा के भीतर भी महसूस हो रही है. इसलिए हमारी यह प्रसन्नता अधूरी है. इन प्रतिकूल परिस्थितियों का हमें साहस के साथ सामना करना होगा. घबराने और निराशा से काम नहीं चलेगा. अब शासन की लगाम हमारे हाथ आ गई है. अब हमें अपने कर्तव्यों को ज़िम्मेदारी से निभाना है.

अनेक देशों ने आज़ादी खून-खराबे के बाद ही हासिल की है. हमारे देश में भी बहुत खून बहा है और इसका हमें दर्द है. इसके बावजूद हम यह कहने की स्थिति में हैं कि आज़ादी शांतिपूर्ण तरीकों से हासिल हुई है. दुनिया के सामने हमने एक अद्भुत आदर्श पेश किया है. हम आज़ाद तो हो गए हैं परंतु आज़ादी के साथ-साथ हमारी ज़िम्मेदारियां भी बढ़ी हैं. हमें उनका सामना करना है. वर्षों पहले देखा सपना आज पूर्ण हो रहा है. विदेशी शासकों को भगाकर आज़ादी हासिल करने की मंजिल पर हम पहुंच गए हैं. परंतु अकेले विदेशी शासकों को भगा देने से हमारा सपना पूरा नहीं होता है. हमें ऐसा वातावरण बनाना है जिसमें इस देश के लोगों के दुःख दर्द समाप्त हो जाए और वे सब आज़ादी के वातावरण में सांस ले सकें. यह बहुत की बड़ा महत्वाकांक्षी इरादा है परंतु हमें पूरा करना ही होगा.

समस्याएं इतनी गंभीर हैं कि उनके बारे में सोचकर ही हमारा हृदय कांपने लगता है. परंतु हमें यह सोचकर हिम्मत आती है कि हमने इसी प्रकार की समस्याओं का सामना किया है. आज हममें करने की इच्छा शक्ति है. हम उन तमाम मुसीबतों का, उन तमाम दिक्कतों का सामना करने के लिए तैयार हैं.

हम अब आज़ाद हैं. यह तो ठीक है परंतु जब हम आज़ाद हो रहे हैं तो हमें यह महसूस करना चाहिए कि यह देश किसी समूह, पार्टी या जाति का नहीं है. किसी एक धर्म के मानने वालों का भी नहीं है. यह सब का है चाहे उसका धर्म या जाति कोई भी हो.


हमारी आज़ादी कैसी होगी यह हम अनेक बार परिभाषित कर चुके हैं. इस संविधान सभा के उद्घाटन के अवसर पर भी मैंने एक प्रस्ताव पेश किया था जिसमें वादा किया था कि इस देश की आज़ादी सब के लिए है. आज़ाद भारत में सभी नागरिकों के अधिकार बराबर होंगे. आज़ाद भारत में हम किसी का शोषण नहीं होने देंगे और हम शोषितों के साथ खड़े रहेंगे. यदि हम इस रास्ते पर चलेंगे तो बड़ी से बड़ी समस्याओं का हल ढूंढ लेंगे. परंतु यदि हम संकुचित हो जाएंगे तो भटक जाएंगे. इसके बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने वह ऐतिहासिक प्रस्ताव पेश किया जो आने वाली सदियों में भी हमारे देश के इतिहास में स्वर्णअक्षरों में लिखा रहेगा.

प्रस्तावः “वर्षों पहले हमने भाग्य से यह वादा किया था और अब समय आ गया है कि वह प्रतिज्ञा पूरी हो रही है. आज ठीक जब घड़ी में रात्रि के 12 बजेंगे, जब सारी दुनिया सो रही होगी तब भारत आज़ाद होकर जागेगा.

“इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं पर बहुत कम आते हैं जब हम पुराने को त्याग कर नये में प्रवेश करते हैं. जब वर्षों के शोषण के बाद वाणी मिलती है. यह सही है कि हम स्वयं को देश और मानवता की सेवा के लिए अर्पित कर रहे हैं. जब मानवीय सभ्यता का उदय हुआ था तभी से हमारा देश उस मंजिल की ओर बढ़ चला था और सदियों उस मंजिल को प्राप्त करने का प्रयास करता रहा और उस मंजिल को प्राप्त करने में उसे सफलताएं और असफलताएं दोनों मिलती रहीं. इन तमाम पिछली सदियों में भारत अपने आदर्शों से विमुख नहीं हुआ. आज वह समय आ गया है कि जब हमारे इतिहास का वह काला अध्याय समाप्त हो गया है. आज हम उस दिशा में कदम रख रहे हैं जब अनेक सफलताएं हमारा रास्ता देख रही है और हम पूर्ण साहस के साथ आने वाली चुनौतियों का मुकाबला करेंगे. 

आज़ादी और सत्ता अपने साथ जिम्मेदारियां भी लाती हैं.


इस सदन के ऊपर, यह सदन जो कि एक सार्वभौमिक सदन है और जो इस देश की स्वतंत्र जनता का प्रतिनिधि है उसके ऊपर भी बहुत गंभीर जिम्मेदारियां आ पड़ी हैं. आज़ादी के आंदोलन के दौरान हमने अनेक मुसीबतों का सामना किया. अनेक तरह की यातनाएं झेली वह सब आज भी हमारी स्मृति पटल पर कायम है. परंतु हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि अतीत के दिन लद गए हैं और भविष्य हमारा इंतजार कर रहा है. भविष्य भी कांटों से परिपूर्ण है. इस देश में हमें अपने देशवासियों की सेवा करना है. उन देशवासियों की जो करोड़ों की संख्या में आज भी विभिन्न प्रकार के अभावों की जिंदगी जी रहे हैं. हमें करोड़ों लोगों की गरीबी, अज्ञानता और असमानता को दूर करना है. हमारी पीढ़ी के महानतम व्यक्ति की आकांक्षा इस देश के हर निवासी के आंसू पोंछने की है. यह बहुत ही महत्वाकांक्षी कार्य है परंतु हमें इसे करना होगा. और आज हमें इसे हासिल करने की प्रतिज्ञा  करना होगी. हमें अपने सपनों को साकार करने के लिए कड़ा परिश्रम करना होगा. यह सपने हमारे देश ही नहीं बल्कि संपूर्ण देशों के लिए हैं. दुनिया के सभी निवासियों के लिए है. 

हमें आज के इस प्रसन्नता के क्षण में इस बात को भी महसूस करना है कि दुनिया का कोई भी राष्ट्र अलग-थलग रह कर जिंदा नहीं रह सकता है. दुनिया के लिए शांति आवश्यक है. शांति, आज़ादी और प्रगति यह सब अविभाज्य मूल हैं.


“आज इस अवसर पर हम भारत के निवासियों को, जिनके हम प्रतिनिधि हैं, यह अपील करते हैं कि वे हममें पूरा भरोसा कर हमारे साथ चले. आज यह अवसर आलोचना का नहीं हैं, बुराईयों का नहीं है. एक दूसरे पर दोषारोपण का नहीं है. हमें आज़ाद भारत के भव्य भवन का निर्माण करना है. ऐसा भव्य जिसमें सब सुख और शांति की सांस ले सकें”.

इसके बाद संविधान सभा के सभी उपस्थित सदस्यों ने आधी रात को खड़े होकर तालियां की गड़गड़ाहट के बीच पंडित नेहरू द्वारा पेश किए गए इए प्रस्ताव को स्वीकार किया. उसके बाद संविधान सभा में दो और महत्वपूर्ण भाषण हुए थे. उनमें से एक डॉ. राधाकृष्णन का था, जो बाद में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के बाद देश के राष्ट्रपति बने थे. 

डॉ. राधाकृष्णन ने अपने भाषण में कहा कि जवाहरलाल नेहरू द्वारा पेश किया गया यह प्रस्ताव हमारे देश के प्राचीन एवं लंबे इतिहास का एक मील का पत्थर है. लंबी अंधेरी रातों के इंतजार के बाद हमने स्वतंत्रता का सूरज उगते देखा है. हम गुलामी से आज़ादी की मंजिल पर पहुंच गए हैं. डॉ. राधाकृष्णन ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा “शायद ही दुनिया में ऐसा कोई उदाहरण मिलेगा जब एक शक्तिशाली साम्राज्यवादी सत्ता ने उस देश को आज़ादी दी हो जिस पर उसने दो सदियों तक राज किया हो. आज डच, इंडोनेशिया से चिपके रहना चाहते हैं और फ्रांस उन देशों से हटने को तैयार नहीं जहां उनकी अभी भी सत्ता कायम है. इस संदर्भ में जो कुछ हमने (ब्रिटेन ने) किया है वह अद्भुत, अप्रत्याशित एवं ऐतिहासिक है”.

उन्होंने (डॉ. राधाकृष्णन) आज़ाद भारत के उत्तरदायित्वों की चर्चा करते हुए कहा कि हमें आज़ाद भारत में घृणा से छुटकारा पाना होगा. असहिष्णुता इंसान का सबसे बड़ा दुर्गुण है. हमें एक दूसरे के विचारों को समझने और सहने की आदत डालना होगी. डॉ. राधाकृष्णन ने अपने भाषण में इस बात का उल्लेख किया कि यह हमारा सौभाग्य है कि हमने आज़ादी का आंदोलन एक ऐसे व्यक्तित्व के नेतृत्व में लड़ा जो हर दृष्टि से विश्व का नागरिक है. जो इंसानियत का जीता जागता प्रतीक है. महात्मा गांधी हमारे देश में सदियों पुरानी परंपराओं के प्रतीक हैं उनमें उसी सभ्यता का नेतृत्व किया है जो भारत के लिए सदियों से रास्ता दिखाती रही है. उसी महान भारत के रूप में हम आज आज़ाद हो रहे हैं और हमें आज इस बात को याद रखना है कि आज़ाद भारत के रूप में अपना कल्याण ही नहीं बल्कि विश्व का कल्याण करेंगे. और समस्त विश्व के निवासियों की सुरक्षा और प्रगति के लिए संघर्षरत रहेंगे.

डॉ. राधाकृष्णन ने ऐतिहासिक वक्तव्य के बाद समस्त सदस्य अपनी सीटों के पास खड़े हो गए और रात्रि के 12 बजे का इंतजार करते रहे. घड़ी में 12 बजे ही संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरू के द्वारा तैयार किया गया प्रस्ताव सदन के समक्ष रखा जो पारित किया गया.

उसके बाद सदन ने यह तय किया कि अंग्रेज़ साम्राज्यवाद के प्रतिनिधि लार्ड माउंटबेटन को विधिवत सूचना दी जाए कि अब भारत आज़ाद हो गया है और इस संविधान सभा ने आज़ाद भारत की सत्ता संभाल ली है. उन्हें यह भी सूचित किया जाए कि संविधान सभा ने उन्हें आज़ाद भारत के प्रथम गवर्नर जनरल के रूप में नियुक्त किया है और यह भी निर्णय लिया गया है कि इस प्रस्ताव की सूचना पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, लार्ड माउंट बेटन को विधिवत रूप से पेश करें. 

इसके बाद संविधान सभा के अध्यक्ष को देश की समस्त महिलाओं की ओर से आज़ाद भारत का झंडा पेश किया गया. इस झंडे को श्रीमती सरोजनी नायडू, जिन्हें भारत कोकिला के नाम से जाना जाता था को पेश करना था परंतु किन्हीं कारण से उनकी अनुपस्थिति में श्रीमती हंसा मेहता ने यह उत्तरदायित्व निभाया. आज़ाद भारत के झंडे को देते हुए उन्होंने कहा कि मैं यह महान उत्तरदायित्व भारत की समस्त महिलाओं की ओर से पूरा कर रही हूं. यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि यह झंडा जो आज़ाद भारत के आकाश में लहराएगा महिलाओं की ओर से समर्पित किया जा रहा है. 

उन्होंने इस बात की उम्मीद प्रकट की कि यह झंडा हमारे देश की स्वाधीनता, सार्वभौमिकता के प्रतीक के रूप में लहराया रहेगा और आज़ाद भारत के निवासियों की हर दृष्टि से सेवा करने का अवसर देगा. इसके बाद उस समय भारत स्थित चीनी राजदूत द्वारा लिखित एक कविता के प्रति आभार प्रकट करते हुए उसे स्वीकार किया गया. उस रात्रि को सदन की कार्यवाही समाप्त करने से पूर्व श्रीमती सुचित कृपलानी ने सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा और जन गण मन का गायन किया. (उसके बाद सदन की कार्यवाही अगले दिन 15 अगस्त को 10 बजे तक के लिए स्थगित की गई).