सीपीआई(एम) के अंतरिम समन्वयक और पोलित ब्यूरो के सदस्य प्रकाश करात ने कहा है कि केवल वामपंथी ताक़तें ही हिंदुत्व के नव-फासीवाद का प्रभावी ढंग से मुक़ाबला कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा करने के लिए वैचारिक दृढ़ता और साहस केवल वामपंथ के पास है। उन्होंने कहा कि यह वामपंथ ही है जो साम्राज्यवादी मंसूबों के ख़िलाफ़ लड़ाई का नेतृत्व कर सकता है।
दरअसल, प्रकाश करात ने बीजेपी और आरएसएस पर तीखा हमला बोला है। वह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीआई(एम) की 24वीं पार्टी कांग्रेस के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। यह आयोजन तमिलनाडु के मदुरै में 2 से 6 अप्रैल तक चलना है और इसमें पार्टी के भविष्य की रणनीति और नए नेतृत्व के चयन पर चर्चा होगी।
करात ने बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ को बढ़ावा देने और अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों को निशाना बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने इसे नव-फासीवादी विशेषताओं वाला शासन करार दिया। करात ने यह भी जोर दिया कि हालांकि सीपीआई(एम) सभी धर्मनिरपेक्ष ताक़तों को बीजेपी के ख़िलाफ़ एकजुट करने की कोशिश कर रही है, लेकिन वामपंथ ही एकमात्र ऐसी शक्ति है जो नव-उदारवादी नीतियों और हिंदुत्व की सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लगातार और दृढ़ता से लड़ सकती है।
सीपीआई(एम) नेता ने कहा, 'लोगों के बीच सांप्रदायिकता और प्रतिक्रियावादी हिंदुत्व के ख़िलाफ़ जोरदार अभियान चलाने की ज़रूरत है तभी जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक किया जा सकता है।'
पार्टी की यह कांग्रेस ऐसे समय में हो रही है जब सीपीआई(एम) को पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे अपने पारंपरिक गढ़ों में कमजोर होने का सामना करना पड़ा है। करात ने स्वीकार किया कि पार्टी को अपनी स्वतंत्र ताक़त बढ़ाने और जनाधार का विस्तार करने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि इस कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी राजनीतिक-रणनीतिक रेखा तैयार करना है जो बीजेपी-आरएसएस के ख़िलाफ़ बहुआयामी संघर्ष को मज़बूत करे।
करात ने वामपंथी और लोकतांत्रिक ताक़तों के बीच एकजुटता पर जोर दिया ताकि एक मज़बूत विकल्प तैयार किया जा सके।
करात ने ‘नव-फासीवाद’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए इसे परंपरागत फासीवाद से अलग बताया। उनके मुताबिक़, भारत में हिंदुत्व की विचारधारा इस नव-फासीवाद का मुख्य आधार है, जो अल्पसंख्यकों और असहमति के ख़िलाफ़ हिंसा और भेदभाव को बढ़ावा देती है। उन्होंने केंद्र सरकार पर क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा देने और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला करने का भी आरोप लगाया। यह शब्दावली पहली बार पार्टी के दस्तावेजों में शामिल की गई है, जिसे लेकर पहले ही विवाद हो चुका है।
हालाँकि, करात का यह बयान कई सवाल भी खड़े करता है। क्या वामपंथ अकेले बीजेपी के विशाल संगठनात्मक ढांचे और हिंदुत्व की विचारधारा का मुक़ाबला कर पाएगा? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वामपंथी दलों को व्यापक गठबंधन बनाने की ज़रूरत है, लेकिन सीपीआई(एम) की नव-उदारवाद विरोधी नीतियों के प्रति अडिग रुख कांग्रेस जैसे अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ सहयोग को जटिल बना सकता है।
सीपीआई(एम) के लिए यह कांग्रेस एक महत्वपूर्ण मोड़ है। पार्टी को न केवल अपने संगठन को मज़बूत करना है, बल्कि केरल जैसे राज्यों में अपनी सत्ता को बनाए रखते हुए अन्य क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ाने की चुनौती भी है। करात ने अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में भी बात की और डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी साम्राज्यवाद को भारत के लिए ख़तरा बताया। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार की नीतियाँ अमेरिकी हितों के साथ जुड़ी हुई हैं, जिसका विरोध करना वामपंथ की जिम्मेदारी है।
प्रकाश करात का यह बयान सीपीआई(एम) की वैचारिक प्रतिबद्धता को दिखाता है, लेकिन यह भी सवाल उठाता है कि क्या यह रणनीति व्यावहारिक रूप से सफल होगी। बीजेपी के ख़िलाफ़ लड़ाई में वामपंथ की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन इसके लिए व्यापक जन-आंदोलन और गठबंधन की ज़रूरत होगी। पार्टी की यह कांग्रेस न केवल पार्टी की दिशा तय करेगी, बल्कि यह भी दिखाएगी कि वामपंथ भारत की जटिल राजनीतिक परिस्थितियों में कितना प्रासंगिक रह पाता है।