दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार का 87 साल की उम्र में निधन

09:31 am Apr 04, 2025 | सत्य ब्यूरो

हिंदी सिनेमा के एक युग का अंत हो गया। दिग्गज अभिनेता, निर्माता और निर्देशक मनोज कुमार का शुक्रवार सुबह 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने मुंबई के कोकिलाबेन धीरूबाई अंबानी अस्पताल में अपनी अंतिम सांस ली। 'भारत कुमार' के नाम से जाने जाने वाले मनोज कुमार पिछले कुछ समय से उम्र से संबंधित बीमारियों से जूझ रहे थे और पिछले कुछ हफ्तों से अस्पताल में भर्ती थे। उनके निधन की खबर से फिल्म उद्योग और उनके प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई।

मनोज कुमार के बेटे कुणाल गोस्वामी ने बताया, 'पिताजी पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे। उनकी हालत पिछले हफ्ते से गंभीर हो गई थी, और आज सुबह उन्होंने शांति से अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार शनिवार सुबह मुंबई में किया जाएगा।' मनोज कुमार के परिवार में उनकी पत्नी शशि गोस्वामी, बेटा कुणाल और बेटी कोमल हैं। 

मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को ब्रिटिश भारत के नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रांत के एबटाबाद में हुआ था जो अब पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में है। उनका असली नाम हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी था। 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया, जहां से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ। उन्होंने 1957 में फिल्म 'फैशन' से अपने करियर की शुरुआत की। उनकी दूसरी फिल्म 'कांच की चूड़ियां' (1961) ने उन्हें पहली सफलता दिलाई, लेकिन असली शोहरत उन्हें 1965 में आई फिल्म 'शहीद' से मिली, जिसमें उन्होंने भगत सिंह की भूमिका निभाई।

मनोज कुमार ने अपनी देशभक्ति से भरी फिल्मों के लिए खास पहचान बनाई। 'शहीद', 'उपकार', 'पूरब और पश्चिम', 'रोटी कपड़ा और मकान', और 'क्रांति' जैसी उनकी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों के दिलों में 'भारत कुमार' के रूप में स्थापित किया।

'भारत कुमार' के रूप में पहचान

1967 में आई फिल्म 'उपकार' ने मनोज कुमार को 'भारत कुमार' की उपाधि दी। इस फिल्म में उन्होंने एक किसान की भूमिका निभाई और देशभक्ति का संदेश दिया, जो उस समय के भारत के लिए बेहद प्रासंगिक था। इसके बाद 'पूरब और पश्चिम' (1970), 'रोटी कपड़ा और मकान' (1974), और 'क्रांति' (1981) जैसी फिल्मों ने उनकी छवि को और मजबूत किया। 

मनोज कुमार की फिल्में न केवल मनोरंजन का साधन थीं, बल्कि सामाजिक संदेश और राष्ट्रीय एकता की भावना को भी बढ़ावा देती थीं। उन्होंने अपनी फिल्मों के ज़रिए देश के आम लोगों की समस्याओं को उठाया और उन्हें सशक्त तरीके से पर्दे पर पेश किया।

मनोज कुमार सिर्फ अभिनेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल निर्देशक, लेखक और संपादक भी थे। उन्होंने अपनी ज्यादातर फिल्मों को खुद लिखा और निर्देशित किया। उनकी फिल्मों में देशभक्ति के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर गहरी छाप देखने को मिलती थी। 'उपकार' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला, जबकि 'रोटी कपड़ा और मकान' ने उन्हें व्यावसायिक सफलता के साथ-साथ आलोचनात्मक प्रशंसा भी दिलाई। उनकी फिल्मों में संगीत का भी खास महत्व था, और 'मेरे देश की धरती' जैसे गीत आज भी लोगों के दिलों में बसे हैं।

मनोज कुमार के योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1992 में पद्मश्री से सम्मानित किया। 2015 में उन्हें भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार दिया गया। इसके अलावा, उन्होंने सात फिल्मफेयर पुरस्कार भी जीते, जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण हैं। उनकी फिल्में आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने ट्वीट किया, 'मनोज कुमार जी का निधन हिंदी सिनेमा के लिए एक बड़ा नुकसान है। उनकी फिल्में देशभक्ति और सामाजिक जागरूकता का प्रतीक थीं।' अभिनेता अनुपम खेर ने कहा, 'उनकी सादगी और देश के प्रति प्रेम उनकी हर फिल्म में दिखता था। वह एक सच्चे देशभक्त थे।'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शोक व्यक्त करते हुए कहा, 'मनोज कुमार जी ने अपनी फिल्मों के जरिए देशभक्ति और भारतीय संस्कृति को जीवंत किया। उनका निधन एक अपूरणीय क्षति है। उनके परिवार और प्रशंसकों के प्रति मेरी संवेदनाएं।'

मनोज कुमार का निधन हिंदी सिनेमा के उस सुनहरे दौर का अंत है, जब फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम भी थीं। उनकी फिल्में और उनका व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने रहेंगे। हिंदी सिनेमा ने आज एक सच्चा सितारा खो दिया। उनका निधन हिंदी सिनेमा के एक युग का अंत माना जा रहा है।