अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल ही में घोषित जवाबी टैरिफ ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में भूचाल ला दिया है। 3 अप्रैल, 2025 को वॉल स्ट्रीट के प्रमुख सूचकांकों में भारी गिरावट देखी गई। इसमें डाउ जोंस इंडस्ट्रियल इंडेक्स 1000 अंक से अधिक और नैस्डैक 800 अंक से ज्यादा टूट गया। सिर्फ़ एसएंडपी 500 इंडेक्स से लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर यानी क़रीब 168 ट्रिलियन रुपये का नुकसान हुआ। यह गिरावट ट्रंप के टैरिफ की घोषणा के तुरंत बाद शुरू हुई। इसने निवेशकों में वैश्विक मंदी और व्यापार युद्ध की आशंका को बढ़ा दिया। निवेशकों को डर है कि यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मंदी की ओर धकेल सकता है।
जानकारों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन के इस कदम से वैश्विक व्यापार में तनाव बढ़ सकता है, खासकर तब जब अमेरिका और कई अन्य देशों के बीच पहले से ही व्यापारिक संबंधों में खटास देखी जा रही है। नए टैरिफ से आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ने की आशंका है, जिसका असर अमेरिकी उपभोक्ताओं और कंपनियों पर पड़ सकता है। इस खबर के बाद शेयर बाजार में भारी बिकवाली शुरू हो गई।
दरअसल, ट्रंप ने अपने 'लिबरेशन डे' टैरिफ की घोषणा की, जिसमें सभी अमेरिकी व्यापारिक साझेदारों पर 10% का टैरिफ और कई देशों पर इससे ज़्यादा भी टैरिफ़ लगाया गया। इसके अलावा चीन पर 54%, वियतनाम पर 46%, और यूरोपीय संघ पर 20% तक के अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया। यह कदम ट्रंप के उस दावे का हिस्सा है जिसमें उन्होंने कहा कि ये टैरिफ अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगे और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देंगे। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह नीति उल्टा असर डाल सकती है।
इसका सबसे बड़ा असर तो व्यापार युद्ध की आशंका है। कनाडा, मैक्सिको, और चीन जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदारों ने जवाबी टैरिफ की धमकी दी है। इससे वैश्विक व्यापार में अवरोध और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान की आशंका बढ़ गई है।
व्यापार युद्ध की आशंका के बीच अब महंगाई का डर भी कम बड़ा नहीं है। टैरिफ से आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे अमेरिका में महंगाई बढ़ सकती है। इससे फेडरल रिजर्व को ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदें कमजोर हुईं, जिसने बाजार को और दबाव में डाल दिया।
इससे कंपनियाँ भी प्रभावित हुई हैं। टेक और रिटेल क्षेत्र की बड़ी कंपनियां सबसे ज़्यादा प्रभावित हुईं। ऐपल (9% गिरावट), नाइकी (13% गिरावट), और अमेजन में गिरावट आई है। इन कंपनियों की लागत बढ़ने से उनके मुनाफे पर असर पड़ा और इसने निवेशकों का भरोसा डगमगा दिया।
टैरिफ के असर को लेकर अनिश्चितता ने निवेशकों में 'पहले बेचो, बाद में सवाल करो' की मानसिकता पैदा की। इससे बाजार में भारी बिकवाली शुरू हो गई।
भारत पर असर
अमेरिका का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार भारत भी इस टैरिफ नीति से अछूता नहीं है। ट्रंप ने भारत पर 26% टैरिफ की बात कही है। इसका असर कई रूप में दिख सकता है। सबसे ज़्यादा असर तो निर्यात पर होगा। भारत से अमेरिका को होने वाला निर्यात, खासकर सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी), फार्मास्यूटिकल्स, और टेक्सटाइल क्षेत्रों में प्रभावित हो सकता है। इससे भारतीय कंपनियों की आय और रोजगार पर दबाव पड़ सकता है।
टैरिफ़ का असर है कि भारतीय शेयर बाजार में भी भारी उतार-चढ़ाव दिख रहा है। निफ्टी में पहले ही गिरावट के संकेत दिखे हैं। सेंसेक्स और निफ्टी जैसे सूचकांकों पर भी दबाव बढ़ने की संभावना है, क्योंकि वैश्विक अनिश्चितता से विदेशी निवेशक भारत से पूंजी निकाल रहे हैं।
अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने और पूंजी निकासी से भारतीय रुपये में कमजोरी आ सकती है, जिससे आयात महंगा हो सकता है और महंगाई बढ़ सकती है।
यदि भारत अमेरिकी टैरिफ से चीन जैसे प्रभावित देशों के विकल्प के रूप में उभरता है तो विनिर्माण और निर्यात में कुछ लाभ हो सकता है। हालांकि, यह दीर्घकालिक रणनीति पर निर्भर करेगा।
ट्रंप के टैरिफ का असर केवल अमेरिका और भारत तक सीमित नहीं है; यह वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करेगा। अंतरराष्ट्रीय चैंबर ऑफ कॉमर्स के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल एंड्रयू विल्सन ने चेतावनी दी है कि यह नीति 1930 के दशक की तरह व्यापार युद्ध को जन्म दे सकती है, जिससे वैश्विक मंदी की शुरुआत हो सकती है।
अमेरिकी बाजार पर निर्भर चीन, वियतनाम, और इंडोनेशिया जैसे देश भारी प्रभावित होंगे। इससे उनकी मुद्रा और शेयर बाजारों में गिरावट देखी जा सकती है।
वैश्विक मांग में कमी की आशंका से ब्रेंट क्रूड आयल की कीमतें 4% तक गिरकर 71.55 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं। इससे तेल निर्यातक देशों को नुकसान होगा, लेकिन भारत जैसे आयातक देशों को कुछ राहत मिल सकती है।
यूरोपीय संघ और जापान जैसे क्षेत्रों में भी शेयर बाजारों में गिरावट देखी गई, क्योंकि वे भी टैरिफ के दायरे में हैं। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और व्यापार पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
ट्रंप के टैरिफ ने वॉल स्ट्रीट को हिलाकर रख दिया है और यह गिरावट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी संकेत है। यह कदम अमेरिका को धनी बनाने के दावे के साथ शुरू हुआ, लेकिन फिलहाल यह निवेशकों और उपभोक्ताओं के लिए चिंता का सबब बन गया है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि यह टैरिफ नीति शायद एक निगोशिएशन टैक्टिक हो और लंबे समय तक न चले। फिर भी, अनिश्चितता के इस माहौल में निवेशक सतर्कता बरत रहे हैं।