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कौन सा आधुनिकता बोध आज प्रासंगिक- प्रेमचंद या निर्मल वर्मा का?

कौन सा आधुनिकता बोध आज प्रासंगिक- प्रेमचंद या निर्मल वर्मा का?

साहित्यकार वीरेंद्र यादव के इस पोस्ट पर विवाद हो गया है कि कौन सा आधुनिकता बोध आज प्रासंगिक है प्रेमचंद का या निर्मल वर्मा का? आख़िर निर्मल वर्मा पर उस पोस्ट से कुछ लोगों की भावनाएँ आहत क्यों हो गईं।

निर्मल वर्मा पर मेरी पिछली पोस्ट से कुछ मित्रों की भावनाएँ आहत हो गईं। मेरा ऐसा कोई सचेत इरादा नहीं था। उन सभी मित्रों से मेरा विनम्र आग्रह है कि वे निर्मल वर्मा संबंधी मेरी किसी पोस्ट को पढ़कर  भावनाओं के आहत होने का जोखिम न उठाएँ। इस पोस्ट को भी नहीं, क्योंकि इससे वे और अधिक आहत होंगे।

निर्मल वर्मा एक कथाकार होने के साथ-साथ एक विचारक और निबंधकार भी थे। जितने उनके उपन्यास और कहानी संग्रह हैं, उससे अधिक उनके निबंध संग्रह हैं। ये सब कूड़ेखाने की भेंट चढ़ने के लिए नहीं हैं। उनके कथाकार पर बात होती रहती है, लेकिन विचार पक्ष पर प्रायः बात नहीं होती। यह अपनी पसंद और प्राथमिकता का मसला है कि कौन कब उनके कथात्मक लेखन की चर्चा करता है, कब वैचारिक लेखन की। इसे विचार बनाम रचनात्मक साहित्य के द्विविभाजन के रूप में क्यों समझा जाए। निर्मल वर्मा ने ‘आधुनिकता और भारतीयता' की अवधारणा पर विस्तार से लिखा है। मैंने उनके लिखे के ही संदर्भ में यह जिज्ञासा प्रकट की कि 'वह कौन सा आधुनिकता बोध है जिसमें वर्णाश्रमी जातिवादी व्यवस्था का क्रिटिक तो दूर उसका समर्थन शामिल है?' इस मुद्दे पर विचार करने के बजाय भक्त मुद्रा में भावनाओं के आहत होने और निर्मल वर्मा पर 'आस्था' डिगने का ख़तरा दिखाई देने लगा। यह भी कहा गया कि मैं पाठकों का रेजिमेंटेशन कर रहा हूँ। गोया कि निर्मल वर्मा इतने छुई मुई हैं कि उनके लेखन को प्रश्नांकित करने मात्र से उनके पाठक उनसे दूर चले जाएंगे!

मैंने उनके विचार पक्ष पर बात करके क्या ईशनिंदा कर दी? निर्मल वर्मा तो स्वयं मूर्तिभंजक थे। वे अपनी पूर्व परंपरा से टकराते ही नहीं थे, उसे ध्वस्त भी करते थे। उन्होंने प्रेमचंद की परंपरा को अप्रासंगिक घोषित करने का जोखिम उठाया था, उन्होंने 'गोदान' का यह कहकर कुपाठ किया था कि “होरी की यातना उन दायित्वों को सम्पन्न न कर पाने की है जो उसके 'धर्म' के निकष और कसौटी है।... इससे बढ़कर क्या यातना हो सकती है कि होरी मरते क्षण गोदान के पैसे भी नहीं जुटा पाता, जो उसकी आत्मा को इस लोक में न सही, परलोक में शांति दे सके।”

यहाँ विचारणीय यह है कि निर्मल वर्मा होरी के जीवन में एक गाय पालने की लालसा को गोदान की लालसा में क्यों बदल देते हैं। क्या 'गोदान' के टेक्स्ट में इसकी छूट है? होरी मरते क्षण धनिया से अंतिम बात यह कहता है कि 'मेरा कहा-सुना माफ करना धनिया! अब जाता हूँ। गाय की लालसा मन में ही रह गई। अब तो यहाँ के रुपये क्रिया-करम में जाएंगे।’ 'गोदान' में होरी के इस स्पष्ट कथन के बावजूद यदि निर्मल वर्मा होरी की यातना 'गोदान के लिए भी पैसे न जुटा पाना' मानते हैं तो वे 'गोदान' के टेक्स्ट के बाहर जाकर 'गोदान' का कुपाठ ही नहीं करते बल्कि अपने पूर्वाग्रहों एवं मनोगत निष्कर्षों को प्रेमचंद पर थोपते हैं। इसे क्यों नहीं प्रश्नांकित किया जाना चाहिए? 

सच तो यह है कि अध्यात्म, हिंदू अस्मिता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जिस ज़मीन पर खड़े होकर निर्मल वर्मा 'गोदान' का पाठ करते हैं, वह भारतीय किसान के दैनन्दिन जीवन से बाहर है और प्रेमचंद जिस भारतीय किसान की कथा कहते हैं, उससे निर्मल वर्मा का अपरिचय है। यही कारण है कि वे होरी की गाय की लालसा को किसान की सामाजिक व आर्थिक स्थिति से न जोड़कर गोदान के धार्मिक व आध्यात्मिक  कर्मकांडी विमर्श में रुपांतरित कर देते हैं। इस पर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए?

मेरा अभिमत है कि निर्मल वर्मा द्वारा प्रेमचंद के इस कुपाठ के पीछे प्रेमचंद का वह आभिजात्य विरोधी चिंतन है जो साहित्य के सौंदर्य की कसौटी बदलने की मांग करता है और दलित, उत्पीड़ित और वंचित को साहित्य में केन्द्रीयता प्रदान करता है...

प्रेमचंद अपनी वैचारिक प्रतिज्ञा और साहित्य में बहुजन के विरुद्ध अभिजन की दुरभिसंधि के व्याख्याकार थे। अभिजन को जिस तरह जनतंत्र नहीं सुहाता उसी तरह आभिजात्य धारा के लेखकों को साहित्य के जनतंत्र से अरुचि है। यही कारण है कि निर्मल वर्मा प्रेमचंद की परंपरा को अप्रासंगिक मानकर प्रेमचंद को ही उससे मुक्त करने का संकल्प कर उसे विमर्शकारी बनाते हैं। इस पर बहस क्यों स्थगित कर देनी चाहिए। दरअसल, यह साहित्य की दो भिन्न और विरोधी दृष्टियों का मुद्दा है। भारतीय संस्कार और स्मृतियों के सहारे निर्मल वर्मा 'अपनी खोई हुई पहचान को ऐतिहासिक विस्मृति के कुहासे से निकालकर दिन के उजाले में लाना चाहते हैं, ताकि हम अपने 'चेहरे' को वैसा ही देख सकें, जैसा वह है...'  प्रश्न है कि निर्मल वर्मा का संवेदनशील भारतीय अतीत अपने किस  चेहरे को देखना चाहता है? उस चेहरे को, जो प्रेमचंद ने 'गोदान' के  पंडित दाता दीन, 'सद्गति' के पंडित घासीराम, 'ठाकुर का कुंआ' के ठाकुर साहब सरीखे पात्रों में देखा था या कि होरी, धनिया, दुखी चमार, सिलिया चलाई, शंकर कुर्मी या भोला अहीर जैसे पात्रों में जो अज्ञेय और निर्मल वर्मा सरीखे अभिजात दर्शन के लेखकों में अनुपस्थित है।

यह उचित है कि अभिजन लेखकों से यह मांग नहीं की जानी चाहिए कि वे उस साहित्य की रचना करें जो उनके अनुभव क्षेत्र और सरोकारों से परे है। लेकिन उनसे यह अपेक्षा तो की जा सकती है कि वे निर्मल वर्मा की तर्ज़ पर यह फतवा तो न दें कि "यथार्थवाद की समूची बहस जो प्रेमचंद की परंपरा के नाम पर पिछले पचास वर्षों से चल रही है, आज बिल्कुल अप्रासंगिक हो गयी है।" निर्मल वर्मा ने प्रेमचंद की परंपरा को अप्रासंगिक घोषित करते हुए यह पहरा नहीं लगाया था कि उनकी साहित्यिक निष्पत्तियों पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए। तो फिर आपकी भावनाएँ उनके प्रश्नांकन से क्यों आहत होती हैं? आप इसे नहीं करते, यह आपकी आजादी, लेकिन जो करते हैं उन पर तोहमत क्यों मढ़ते हैं? साहित्य के जनतंत्र को जनतांत्रिक रहने दीजिये, उस पर धार्मिक नगरी की आचारसंहिता मत लागू कीजिये। जब तक संवैधानिक जनतंत्र पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता तब तक तो धैर्य रखिये!

वीरेंद्र यादव की वह पोस्ट जिसपर आपत्तियाँ आईं

बाबरी मस्जिद ध्वंस के मसले पर निर्मल वर्मा के खुले हिंदुत्ववादी नज़रिये के बावजूद हिंदी के एक अध्येता मित्र की सम्मति है कि ‘साम्प्रदायिकता निर्मल वर्मा के आधुनिकताबोध के बुनियादी स्वभाव का अंग नहीं है और उनका लेखन महत्वपूर्ण है।’ मेरी जिज्ञासा यह जानने की है कि यह कैसा आधुनिकता बोध है, जिसमें वर्णाश्रमी जातिवाद की आलोचना तो दूर उसका समर्थन शामिल है। इस संदर्भ में निर्मल वर्मा का यह कथन ध्यान देने योग्य है-

“...जीवन के हर क्षेत्र में अपनी जगह चाहे वह 'वर्ण व्यवस्था' में ही निहित क्यों न हो, के प्रति निष्ठा रखने में ही मनुष्य का देवत्व छिपा रहता है। मनुष्य की जवाबदेही यहाँ भी है --वह एक 'दी हुई' पूर्व निर्धारित ज़िम्मेदारी है, समाज के प्रति, जाति के प्रति, परिवार के प्रति। इसलिए मनुष्य की पीड़ा उन विवशताओं से उत्पन्न होती है, जो उसे अपनी 'बुनियादी' अच्छाई से  स्खलित करती है-- उसे अपनी परंपरागत जगह से उन्मूलित करती है।”

विशेषकर तब और भी जब निर्मल वर्मा स्पष्ट रूप से 'धर्म की हिन्दू अवधारणा को समूची राष्ट्रीय परंपरा में गुंथा' हुआ मानते हों। इसी के चलते उन्हें प्रेमचंद से यह शिकायत है कि ‘अंग्रेजी राज ने इस (आध्यात्मिक) विरासत को जिस तरह आहत किया था, उसकी पीड़ा का आयाम प्रेमचंद के उपन्यासों में नहीं दिखाई देता।’ आख़िर ऐसा क्यों है कि प्रेमचंद के आधुनिकता बोध में वर्ण व्यवस्था का अनिवार्य उन्मूलन शामिल था, जबकि निर्मल वर्मा के आधुनिकता बोध में उसका समर्थन? कौन सा आधुनिकता बोध आज प्रासंगिक है प्रेमचंद का या निर्मल वर्मा का? या कि इन मुद्दों पर बात करना 'उच्छेदवादी' होना है?

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