आरएलडी में भड़का असंतोषः कितना बदलेगी जयंत और पश्चिमी यूपी की राजनीति

04:12 pm Apr 05, 2025 | सत्य ब्यूरो

राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के अध्यक्ष जयंत चौधरी के नेतृत्व वाली पार्टी वक्फ कानून को लेकर बड़े संकट में फंस गई है। यह पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और मुस्लिम समुदायों के गठजोड़ पर अपनी राजनीतिक ताकत बनाए रखती रही है। लेकिन पार्टी में इस्तीफे शुरू होने से एक बड़े संकट की तरफ बढ़ रही है। दरअसल, यूपी में सपा, बसपा और आरएलडी सिर्फ अपने-अपने समुदायों प्लस मुस्लिम वोटों के इर्द-गिर्द पूरी राजनीति करते हैं। मसलन सपा के साथ यादव और मुस्लिम गठजोड़, बसपा के साथ दलित और मुस्लिम गठजोड़ और आरएलडी के साथ जाट और मुस्लिम गठजोड़ अभी तक काम करते रहे हैं। आरएलडी पूरी तरह से पश्चिमी यूपी आधारित पार्टी है। जयंत पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह के पोते हैं।

यूपी में सपा, आरएलडी और बसपा से अगर कोई एक समुदाय छिटक जाए तो उस पार्टी के राजनीतिक अस्तित्व पर संकट आ जाता है। पश्चिमी यूपी में जैसे ही आरएलडी मुस्लिमों के छिटकने से कमजोर पड़ेगी। बीजेपी उसकी जगह ले लेगी। बीजेपी का यह प्रयोग तमाम राज्यों में जारी है। बिहार उसका ताजा उदाहरण है। जहां बीजेपी ने जेडीयू को एक तरह से प्रभावहीन कर दिया है।


इस विधेयक को लेकर पार्टी के कई प्रमुख मुस्लिम नेताओं, जैसे प्रदेश महासचिव शाहजेब रिजवी और हापुड़ के जिला महासचिव मोहम्मद जकी, ने इस्तीफा दे दिया है। इन इस्तीफों ने आरएलडी की राजनीतिक रणनीति और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसके आधार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 

वक्फ कानून जिसे केंद्र की एनडीए सरकार ने संसद में पारित किया, मुस्लिम समुदाय के बीच विवाद का विषय बन गया है। इस बिल को लेकर तमाम मुस्लिम संगठन और नेता इसे समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्तियों पर हमले के तौर पर मानते हैं। आरएलडी, जो एनडीए का हिस्सा है, ने इस बिल का समर्थन किया। जयंत चौधरी के इस फैसले से पार्टी के मुस्लिम नेताओं में नाराजगी फैल गई, जिसके परिणामस्वरूप शाहजेब रिजवी और मोहम्मद जकी जैसे नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। हालांकि जिला स्तर पर मुस्लिम कार्यकर्ताओं के पार्टी छोड़ने की तादाद कहीं ज्यादा है। आमतौर पर पश्चिमी यूपी के मुसलमान राजनीतिक तौर पर राकेश टिकैत की भारतीय किसान यूनियन और आरएलडी से जुड़े हैं। दूसरे नंबर पर सपा और कांग्रेस है। राकेश टिकैत पश्चिमी यूपी में जयंत चौधरी की ही पार्टी को समर्थन करते हैं।

शाहजेब रिजवी ने अपने इस्तीफे में कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आरएलडी की 10 विधानसभा सीटों की जीत में मुस्लिम वोटों का बड़ा योगदान था, लेकिन जयंत चौधरी ने इस समुदाय के साथ "विश्वासघात" किया। इसी तरह, मोहम्मद जकी ने पार्टी पर मुस्लिम और वंचित समुदायों की उपेक्षा का आरोप लगाया। इन नेताओं का मानना है कि जयंत सत्ता की लालच में अपने मूल सिद्धांतों से भटक गए हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आरएलडी की राजनीति पारंपरिक रूप से जाट और मुस्लिम समुदायों के समर्थन पर टिकी रही है। इस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी लगभग 32% है और जाट समुदाय भी प्रभावशाली है। 2022 के विधानसभा चुनाव में आरएलडी ने समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठबंधन कर 8 सीटें जीती थीं, जिसमें मुस्लिम वोटों की अहम भूमिका थी। हालांकि, 2024 में भाजपा के साथ गठबंधन और अब वक्फ बिल के समर्थन ने इस सामाजिक समीकरण को खतरे में डाल दिया है।

मुस्लिम नेताओं के इस्तीफे से यह संकेत मिलता है कि आरएलडी का मुस्लिम वोट बैंक कमजोर हो सकता है। पश्चिमी यूपी की कई विधानसभा और लोकसभा सीटों, जैसे सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, और बागपत, पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इन इस्तीफों से न केवल पार्टी की आंतरिक एकता प्रभावित होगी, बल्कि इसका असर आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिल सकता है।

जयंत चौधरी की चुनौतियां

मुस्लिम समुदाय का विश्वास खोना: जयंत चौधरी ने अपने दादा चौधरी चरण सिंह की विरासत को आगे बढ़ाने का दावा किया था, जो जाट-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। लेकिन वक्फ बिल का समर्थन और मुस्लिम नेताओं का पार्टी छोड़ना इस छवि को धूमिल कर सकता है। शाहजेब रिजवी ने कहा कि "मुसलमानों ने जयंत को अपनी आंखों का तारा समझा था," लेकिन अब वे ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। यह भावना मुस्लिम मतदाताओं को सपा या कांग्रेस जैसे दलों की ओर ले जा सकती है।

जाट वोटों पर निर्भरता बढ़ना: मुस्लिम समर्थन कम होने की स्थिति में जयंत को जाट वोटों पर अधिक निर्भर होना पड़ेगा। हालांकि, भाजपा के साथ गठबंधन के कारण जाट वोटों का बड़ा हिस्सा पहले ही भाजपा की ओर जा चुका है। ऐसे में आरएलडी का स्वतंत्र वजूद कमजोर हो सकता है।

पार्टी में असंतोष का बढ़ना: शाहजेब रिजवी ने दावा किया कि उनके साथ "2,000 से अधिक" कार्यकर्ता पार्टी छोड़ रहे हैं। हापुड़ में जकी का इस्तीफा और उनसे जड़े जमीन कार्यकर्ताओं का छिटकना भी यही बता रहा है। अगर यह सच साबित हुआ, तो आरएलडी की संगठनात्मक संरचना को बड़ा नुकसान होगा, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां उसकी जड़ें हैं।

एनडीए के लिए संकट: आरएलडी का कमजोर होना एनडीए के लिए भी चिंता का विषय है। पश्चिमी यूपी में भाजपा को जाट और मुस्लिम वोटों के लिए आरएलडी पर निर्भरता थी। अगर आरएलडी का आधार कमजोर होता है, तो भाजपा को इस क्षेत्र में कुछ नुकसान हो सकता है। हालांकि दूरगामी राजनीति में उसे फायदा होगा।

विपक्ष को अवसर: सपा और कांग्रेस जैसे दल इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं। सपा पहले ही वक्फ बिल को "सांप्रदायिक राजनीति का नया रूप" करार दे चुकी है, जिससे वह मुस्लिम वोटों को अपनी ओर आकर्षित करने की रणनीति बना सकती है।

जयंत की विश्वसनीयता पर सवाल: जयंत चौधरी की सेक्युलर छवि पर सवाल उठ रहे हैं। पहले उन्होंने किसान आंदोलन के जरिए जाट-मुस्लिम एकता को मजबूत किया था, लेकिन अब भाजपा के साथ गठबंधन और वक्फ बिल का समर्थन उनकी रणनीति पर सवाल उठा रहा है।

आरएलडी में वक्फ कानून के विरोध में मुस्लिम नेताओं के इस्तीफे जयंत चौधरी के लिए एक बड़ी चुनौती हैं। यह घटनाक्रम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी की राजनीतिक जमीन को कमजोर कर सकता है। अगर वे इस संकट को संभाल नहीं पाए, तो आरएलडी का प्रभाव क्षेत्रीय स्तर पर सिमट सकता है, और उनकी पार्टी एनडीए में केवल एक "लटकन" बनकर रह सकती है। दूसरी ओर, यह स्थिति विपक्ष के लिए एक सुनहरा मौका लेकर आई है, जिसका असर आने वाले चुनावों में साफ दिखाई देगा। जयंत चौधरी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अपने पारंपरिक समर्थकों का भरोसा कैसे वापस हासिल करें।