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महापालिका चुनाव: उद्धव ठाकरे के सामने पहली अग्निपरीक्षा! 

महापालिका चुनाव: उद्धव ठाकरे के सामने पहली अग्निपरीक्षा! 

एकनाथ शिंदे और उनके समर्थक विधायकों की बग़ावत के बाद उद्धव ठाकरे के लिए अपनी सियासत को जिंदा रख पाना बेहद मुश्किल हो गया है। क्या वह इस मुश्किल से उबर पाएंगे?

महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार और शिवसेना का अग्नि परीक्षा काल शुरु हो गया है। राज्य की सत्ता हाथ से निकलने के बाद पार्टी के समक्ष अपने गढ़ यानी ठाणे और मुंबई महानगपालिका को बचाने की चुनौती आ खड़ी हुई है। क्योंकि सितंबर महीने में प्रदेश की कई महानगरपालिकाओं में चुनाव होने वाले हैं।

स्थानीय निकाय संस्थाओं में आरक्षण की भागीदारी तय करने के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह आदेश भी दिया कि दो सप्ताह के अंदर ही चुनावों की घोषणा कर दी जाय। 

प्रदेश में कोरोना और आरक्षण के इस मुद्दे को लेकर विगत दो सालों से अनेक महानगरपालिकाओं में कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद चुनाव नहीं हो पाए हैं। अब मुद्दा यह है कि ये चुनाव ऐसे समय होने जा रहे हैं जब प्रदेश में भारी राजनीतिक हड़कंप मचा हुआ है। विधायकों की बगावत कराकर सत्ता परिवर्तन कराया गया। सबसे बड़ी चुनौती शिवसेना के समक्ष है। वह भी ऐसे समय में जब पार्टी के बड़ी संख्या में विधायक और सांसद उसका साथ छोड़कर एक नया गुट ही नहीं अपने आपको " असली शिवसेना " होने का दावा कर रहे हैं। 

इस गुट ने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर प्रदेश में सत्ता स्थापित कर ली है और तमाम सरकारी मशीनरीज के दमखम पर वह " मातोश्री " की ताकत को चुनौती  दे रहा है। वह मातोश्री जहां लालकृष्ण आडवाणी से लेकर अमित शाह तक को शिवसेना से चुनावी गठबंधन के लिए जाना पड़ता था। इसी मातोश्री में 2019 के विधान सभा चुनावों के पहले उद्धव ठाकरे और अमित शाह के बीच हुई बैठक के वादे की पूर्ति नहीं  किये जाने पर शिवसेना ने अपने करीब तीन दशक तक राजनीतिक साझीदार रही भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस का हाथ थाम लिया। इस नए गठबंधन ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया ध्रुवीकरण तैयार किया था। 

भारतीय जनता पार्टी को यह नया समीकरण पहले दिन से ही खटकने लगा था और उसने सरकार के आधे कार्यकाल पूर्ण होते होते ही शिवसेना को उस स्थिति में ला दिया कि यह प्रश्न खड़ा होने लगा कि क्या उद्धव ठाकरे शिवसेना को बचा पाएंगे ?

उद्धव ठाकरे और उनके सहयोगी विधायक दल और संसदीय दल में मची टूट फूट के बाद अपने मोहरों की विश्वसनीयता जांचने में ही व्यस्त थे कि राजनीति की नयी बिसात बिछ गयी। और वह भी ऐसी बिसात जहाँ हार का मतलब अपनी पैतृक पार्टी या यूं कह लें की राजनीतिक विरासत से हाथ से गवां देना। महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण का मुद्दा लम्बे अरसे से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन था। इस प्रकरण और कोरोना की वजह से प्रदेश की करीब 9 महानगरपालिकाओं के चुनाव पिछले दो सालों से कार्यकाल ख़त्म हो जाने के बावजूद लंबित पड़े थे।

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लेकिन मंगलवार को अदालत के आदेश के बाद अब ओबीसी आरक्षण के प्रावधान के अनुसार दो सप्ताह में चुनाव की घोषणा की जानी है।  मुंबई, नवी मुंबई, ठाणे, कल्याण-डोंबिवली, पुणे, नासिक, औरंगाबाद सहित  22 महानगरपालिकाओं में चुनाव होने वाले हैं। यानी की आने वाले दिनों में महाराष्ट्र में " सत्ता का सेमी फाइनल " होने जा रहा है। इस सेमी फाइनल से यह निर्धारित हो जाएगा की किसकी कितनी ताकत है। 

सबसे बड़ी चुनौती उद्धव ठाकरे के लिए ही है क्योंकि उसे मुंबई और ठाणे बचाना है। ठाणे वह महानगरपालिका है जहां पर शिवसेना ने अपनी पहली सत्ता कायम की थी जबकि मुंबई में पिछले पच्चीस वर्षों से उसकी सत्ता है। 

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री का पद छोड़ते समय जनता के नाम संबोधन में कहा था, “मैं अपनी पीठ की सर्जरी करा रहा था, पता चला इस दौरान साजिश करके मेरे अपनों ने ही मेरी पीठ में खंजर घौंप दिए।”

बागियों के वार से घायल सेनापति कैसे अपनी सेना को खड़ा करते हैं और समर जीतते हैं यह तो वक्त बताएगा लेकिन मातोश्री का युवराज (आदित्य ठाकरे) इन दिनों सड़क पर है। मुंबई और उपनगरों में वे " निष्ठा यात्रा " कर रहे हैं। पिछली विधानसभा चुनावों में सातारा की एक चुनावी सभा में बारिश में भीगते हुए शरद पवार के भाषण की तरह ही मंगलवार को वडाला में आदित्य ठाकरे ने भी एक सभा को संबोधित किया। 

बुधवार से वे तीन दिन की " शिव  संवाद यात्रा " भिवंडी से शुरु कर रहे हैं। मातोश्री और शिवसेना भवन में उद्धव ठाकरे की बैठकों का दौर शुरु है। लेकिन इस बीच सरकारी यंत्रणाओं का दौर भी जारी है। ठाकरे के सिपहसालारों को प्रवर्तन निदेशालय के नोटिस भी जारी हैं। सबसे बड़ा संभावित खतरा पार्टी के चुनाव चिन्ह पर है। एकनाथ शिंदे गुट चुनाव आयोग में पंहुच गए हैं और अपने आपको असली शिवसेना बता रहे हैं। यदि उनके दावे पर मुहर लग जाती है तो इतने कम समय में अपने चुनाव चिन्ह को लोगों के बीच में पंहुचा पाने में उद्धव ठाकरे और उनकी टीम के लिए टेढ़ी खीर जैसा होगा। 

वैसे यह चुनौती एकनाथ शिंदे गुट के लिए भी होगी क्योंकि विवादास्पद होने की स्थिति में धनुष बाण का चुनाव चिन्ह जब्त कर दोनों पार्टियों को नया चिन्ह आवंटित किया जा सकता है।

उद्धव ठाकरे के समक्ष चुनौतियां कम नहीं हैं। केंद्र की ताकत के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए उन्हें जनता के बीच में जाना है। वैसे उनके मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद सोशल मीडिया में उनके पक्ष में माहौल स्पष्ट नज़र आता है। बाला साहब ठाकरे के पुत्र को धोखा देने वालों को गद्दारों की संज्ञा तथा विश्वासघात बताया जा रहा है। दूसरी बात यह है कि एकनाथ शिंदे भले ही राज्य के  मुख्यमंत्री  बन गए हैं लेकिन उनके कामकाज़ का दायरा ठाणे जिले तक ही सीमित रहा है। इसकी वजह से  ठाणे, कल्याण-डोंबिवली महानगपालिका को छोड़ दें तो  मुंबई व अन्य महापालिकाओं में शिंदे गुट को भी बहुत चुनौतियां होंगी।

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मुख्यमंत्री बनने के बाद ठाणे के 67 पूर्व  नगरसेवकों (पार्षदों ) में से 66 ने शिंदे का समर्थन किया है लेकिन मुंबई में ऐसी स्थिति नहीं है। मुंबई में केवल शीतल म्हात्रे नामक एक मात्र नगरसेविका शिंदे गुट में शामिल हुई है। मुंबई के दो विधायक सदा सरवणकर और मंगेश कुडाळकर भले भी शिंदे गुट में चले गए हैं लेकिन दोनों सांसद अरविंद सावंत और गजानन कीर्तिकर अभी भी उद्धव ठाकरे के साथ हैं। यही नहीं संगठन के पदाधिकारी भी शिवसेना के साथ ही बने हुए हैं। 

यहां एक बात याद रखने की है वह है  मुंबई महानगरपालिका का 2017 का चुनाव। उस चुनाव में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया था और अब शिवसेना में फूट डालकर वह महानगरपालिका पर अपना कब्ज़ा जमाने की हर संभव कोशिश करेगी।

लेकिन शिवसेना अपने नए सहयोगियों कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस से कैसा तालमेल करेगी या अकेले चुनाव लड़ेगी सारा दारोमदार उस बात पर निर्धारित होगा। इन महानगरपालिका चुनावों में ना सिर्फ बात बागियों या वफादारों की होगी अपितु शिवसेना की तरफ से मराठी वोटों के ध्रुवीकरण के लिए पार्टी की नीति भी नजर आएगी। 

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