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ईसा मसीह की मूर्ति का विरोध क्यों कर रहा है आरएसएस?

ईसा मसीह की मूर्ति का विरोध क्यों कर रहा है आरएसएस?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू जागरण वेदिके कर्नाटक में ईसा मसीह की मूर्ति लगाने का विरोध क्यों कर रहे हैं, उनका क्या कहना है?

ऐसे समय जब कर्नाटक में ईसाइयों पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं, ईसाई धर्म के पैगंबर ईसा मसीह की मूर्ति लगाने का खुले आम विरोध हो रहा है। ऐसे समय जब बीजेपी की राज्य सरकार धर्मातरण विरोधी विधेयक ला रही है और ईसाइयों का सर्वे करवा रही है, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और  हिंदू जागरण वेदिके ने ईसा मसीह की मूर्ति लगाने के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है। 

कर्नाटक की पिछली कांग्रेस सरकार ने बेंगलुरु से 65 किलोमीटर दूर कनकपुरा में ईसा मसीह की 114 फुट लंबी मूर्ति बनवाने के लिए 10 एकड़ ज़मीन देने का प्रस्ताव रखा था।

हिंदू जागरण वेदिके कर रहा है विरोध

दक्षिणपंथी संस्था हिंदू जागरण वेदिके ने मौजूदा बीजेपी सरकार से यह माँग की है कि वह इस प्रस्ताव को वापस ले।

हिंदू जागरण वेदिके के सदस्यों ने ईसा मसीह की प्रस्तावित मूर्ति के ख़िलाफ़ कनकपुरा में एक विशाल रैली भी की। 

मूर्ति लगाने के लिए सस्ती दर पर ज़मीन देने वाले कांग्रेस विधायक डी. के. शिवकुमार पर मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाया गया है। वे इस सिलसिले में पिछले साल 50 दिनों के लिए जेल में थे।

विवाद बढ़ा

शिवकुमार पिछली कांग्रेस सरकार में मंत्री थे और वे कनकपुरा से विधायक भी हैं। 

उन पर आरोप लगने के बाद प्रस्तावित मूर्ति को लेकर विवाद और बढ़ गया था। कुछ लोगों का कहना है कि शिवकुमार को डराने और उन पर दबाव डालने के लिए उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फंसाया जा रहा है।

क्या कर रहा है आरएसएस?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने इस मामले में कल्लडका प्रभाकर भट्ट जैसे नेता को आगे किया है। तक़रीबन दो दशक पहले कर्नाटक के तटीय ज़िलों को 'हिंदुत्व की प्रयोगशाला' में तब्दील करने का श्रेय कल्लडका को ही दिया जाता है। वे अब कनकपुरा रैली के महत्व बताते फिर रहे हैं।

भट्ट ने बीबीसी से कहा, 

मुझे सबसे ज़्यादा दुख इस बात का है कि उन्होंने मुन्नेश्वर पहाड़ी पर 'क्रॉस' रख दिया है। यह वह जगह है जहाँ मुनि पूजा होती है। क्या उन्हें ईसा मसीह की मूर्ति बनाने के लिए कोई और जगह नहीं मिली?


कल्लडका प्रभाकर भट्ट, आरएसएस से जुड़े नेता

'हिन्दुओं को अपमानित करने की कोशिश'

वे सवाल करते हैं, "वे हमें अपमानित करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? और सरकारी ज़मीन को धार्मिक मक़सद के लिए कैसे दिया जा सकता है? उनके इरादे क्या हैं?"

चर्च के सदस्य और स्थानीय निवासी संध्यागप्पा चिन्नाराज ने इस पर कहा, 

हम मुन्नेश्वरा पहाड़ी पर क्रॉस कैसे रख सकते हैं जब यह जगह कपालबेट्ट पहाड़ी वहाँ से तीन किलोमीटर दूर है?


संध्यागप्पा चिन्नाराज, चर्च के सदस्य

संघ की कोशिश

याद दिला दें कि केरल में सबरीमला मंदिर और कर्नाटक में बाबाबुडनगिरी दरगाह को केंद्र में रख कर आरएसएस ने आन्दोलन खड़ा कर दिया था। 

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने केरल स्थित सबरीमला मंदिर को लेकर कुछ ऐसी ही मुहिम छेड़ी थी। 

सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2018 के अपने फ़ैसले में 10-50 साल की महिलाओं को सबरीमला के स्वामी अयप्पा मंदिर में प्रवेश की इजाज़त दे दी थी। इसके बाद केरल में बीजेपी से संबद्ध दक्षिणपंथी संगठनों ने इसे बड़ा मुद्दा बनाने की कशिश की थी।

 - Satya Hindi

डी. के. शिवकुमार, विधायक, कांग्रेस

मूर्ति का शिलान्यास

ईसा मसीह की मूर्ति को लेकर विवाद पिछले साल ईसाइयों के पवित्र दिन 25 दिसंबर यानी क्रिसमस डे को तेज़ हुआ जब शिवकुमार ने कनकपुरा में एक पहाड़ी पर ईसा मसीह की मूर्ति की रेप्लिका लेकर शिलान्यास किया। 

शिवकुमार ने बीबीसी से कहा था,

यहाँ के ईसाई इस जगह पर 100 साल से भी ज़्यादा समय से प्रार्थना करते आ रहे हैं। मैं कुछ साल पहले यहाँ आया था, मैंने उनसे कहा कि वे सरकारी ज़मीन पर प्रार्थना न करें बल्कि इसके लिए एक स्थायी मूर्ति बना लें।


डी. के. शिवकुमार, विधायक, कांग्रेस

क्या कहना है शिवकुमार का?

उन्होंने इसके आगे कहा, ''उस वक़्त क़ागज़ी कार्रवाई पूरी हो गई थी। तब राजस्व सचिव ने भी इस बारे में पूछताछ की थी क्योंकि उस 10 एकड़ की ज़मीन में ग्रेनाइट पत्थर थे। जब सस्ते दाम में ज़मीन ख़रीदने की बात हुई तो मामला कैबिनेट के सामने आया।"

शिवकुमार सस्ते में ज़मीन देने के फ़ैसले पर कहते हैं, 

मंदिर और धर्मशाला वगैरह बनाने के लिए ज़मीन ख़रीदने पर 10 फ़ीसदी छूट मिलने का प्रावधान है। उस वक़्त मैंने चेक से पैसे चुकाने की बात कही थी।


डी. के. शिवकुमार, विधायक, कांग्रेस

जिस ज़मीन पर ग्रेनाइट से ईसा मसीह की यह मूर्ति बनाई जाएगी उसकी क़ीमत एक करोड़ बताई गई थी और शिवकुमार ने इसके लिए 10 लाख रुपये चुकाए थे।

बीजेपी सरकार मानती है कि यह फ़ैसला सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने लिया था। सस्ती ज़मीन का मसला जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन वाली एच. डी. कुमारस्वामी सरकार के सामने एक बार फिर सामने आया था।

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