नागरिकता क़ानून : असहमति से इनकार की नीति से बीजेपी को होगा नुक़सान

11:49 pm Dec 21, 2019 | प्रभु चावला - सत्य हिन्दी

जोश में भरे हुए विद्रोहियों का सपना होता है समतामूलक समाज। असहयोग और लोकतंत्र एक दूसरे के शत्रु नहीं हैं, बल्कि समाज और राजनीति के मिलन में एक दूसरे के सहभागी विपरीत विमर्श को रोकने का प्रयास विरोध को जन्म देता है और लोकतंत्र कमज़ोर होता है। पिछले कुछ महीनों से भारतीय राजनीतिक विमर्श से सकारात्मक राजनीतिक असहमति गायब है। इसका कारण विपक्षी राजनीतिक शून्यता नहीं है, इसका कारण है वैचारिक पंगुता। 

विश्वविद्यालयों ने की बग़ावत

जब केंद्र ने संविधान को दाँव पर लगाने का ख़तरा उठाया तो विश्वविद्यालयों ने बग़ावत कर दी। पिछले कुछ हफ़्तों से लोकतांत्रिक तरीके से बनाए गए नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ जिस तरह से असहमति के स्वर तेज़ हुए हैं, उन्हें देखने से साफ़ है कि ज़्यादातर विरोध वामपंथ के प्रभाव वाले विश्वविद्यालयों में है। उत्तर पूर्व से लेकर दक्षिण तक छात्र, विपक्षी नेता और उदारवादी तबके के लोग नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर आए हैं। उपद्रव और हिंसा ने सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाया है। 

2014 के बाद पहली बार मोदी सरकार को अपने विधायी काम की वजह से अखिल भारतीय विरोध का सामना करना पड़ रहा है। कुछ ऐसे देशों से भी आलोचना के स्वर सुनाई पड़ रहे हैं जो अब तक मोदी के साहसिक आर्थिक कार्यक्रमों से उनके साथ खड़े दिखाई देते थे।

'ब्रांड मोदी' हुआ कमज़ोर

ब्रांड मोदी जो अब तक अपराजेय दिखता था, उसे बड़ी चुनौती मिलती नज़र आ रही है। इस वक़्त बीजेपी के लिए द्वेष से भरे राजनीतिक दल से ख़तरा नहीं है, बल्कि भारत भर में विश्वविद्यालयों में जो गुस्सा उभर कर सामने आया है, वह एक बड़ी चुनौती है। बहुत सारे लोगों को यह लगता है कि उग्र हिन्दुत्व अब बीजेपी को उल्टे नुक़सान पहुँचा रहा है। देश भर में हर जगह सरकार विरोधी रैलियों में लोग उमड़ रहे हैं, उससे पता चलता है कि राष्ट्रीय मूड बदल रहा है। 

इतिहास गवाह है कि जब भी समाज में सामूहिक मानसिकता में बदलाव होते हैं, उसका पहला प्रमाण छात्रों के रूप में सामने आता है। दिल्ली के जामिया मिल्लिया इसलामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों के हाथों में महात्मा गाँधी और बाबासाहेब आंबेडकर की तसवीरें थीं, जो यह कह रही थी कि नागरिकता क़ानून का विरोध सिर्फ़ मुसलमानों को अलग रखने का विरोध नहीं है।

संविधान का उल्लंघन

उनके आरोप थे कि बीजेपी सरकार ने सबको समानता का अवसर देने वाले संविधान का उल्लंघन किया है। अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय और दूसरे अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के छात्र ‘नागरिकता क़ानून वापस लो’ के नारे के साथ उतरे। यह विडंबनापूर्ण है कि अलीगढ़ विश्वविद्यालय और जामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों को संविधान के रक्षक के रूप में देखा जा रहा है। फिर भी नागरिक क़ानून में सिर्फ़ मुसलमानों को ही नाराज़ नहीं किया है। बल्कि उत्तर पूर्व भारत में एनडीए के सहयोगी दल भी नाराज़ हैं। 

अपने कट्टर सहयोगियों को नहीं समझा पाने के लिए बीजेपी ख़ुद दोषी है। मामले की गंभीरता को समझते हुए मोदी ने नरम रुख अख़्तियार करने के संकेत दिए हैं। उन्होंने ट्वीट किया, 'नागरिकता क़ानून का सख़्त विरोध दुर्भाग्यपूर्ण और बेहद चिंताजनक है। बहस, वाद विवाद और असहमति लोकतंत्र के अनिवार्य अंग हैं, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान और सामान्य जीवन को अस्त-व्यस्त करना हमारी नैतिक परंपरा का हिस्सा नहीं है।'

विपक्ष को फ़ायदा

मौजूदा विरोध को मोदी और उनकी सरकार के तौर तरीके के ख़िलाफ़ विपक्ष के अचानक उभरे हुए असंतोष के रूप में नहीं देखना चाहिए। लगातार दो लोकसभा चुनाव निर्णायक तौर पर हारने के बाद विपक्ष और स्वयंभू उदारवादी इस ताक में थे कि प्रधानमंत्री कोई ग़लती करें और मोदी के ख़िलाफ़ वातावरण बनाया जा सके। ऐसे में एनआरसी इससे बेहतर समय नहीं आ सकता था। 

इन लोगों ने नागरिकता क़ानून को एक ऐसे मिसाइल के तौर पर पेश किया जो भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र और संविधान की मूल आत्मा को नष्ट कर देगा। चूंकि यह क़ानून पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश में प्रताड़ित किए गए हिन्दू, बौद्ध, सिख, पारसी जैसे अल्पसंख्यकों को अपने आप भारतीय नागरिकता दे देता है और मुसलिम शरणार्थियों को छोड़ देता है, इसलिए मोदी विरोधी उनकी सरकार को सांप्रदायिक और संविधान विरोधी घोषित कर रहे हैं। 

निसंदेह बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में पड़ोसी मुसलिम मुल्कों से भारत आए प्रताड़ित लोगों को नागरिकता देने का वायदा किया था, लेकिन ढेरों ऐसे लोग हैं, जो दशकों से भारत में रह रहे थे। 

मुसलमानों को बाहर रख कर एनडीए ने यह साफ़ कर दिया था कि 1971 के बाद बांग्लादेश से आए ग़ैरक़ानूनी घुसपैठियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 

घुसपैठियों को बाहर निकालने का शंखनाद बीजेपी ने किया था। वर्तमान में ख़ुद बीजेपी के लोगों और उनके समर्थकों को यह कहने के लिए मजबूर कर दिया है कि इसकी क्या ज़रूरत थी और अभी नागरिकता क़ानून क्यों लाया गया।

जल्दबाजी

ऐसे लोग आपस में कानाफूसी कर रहे हैं कि दूसरे कार्यकाल के  6 महीने के अंदर ही सरकार ने अपने हिन्दुत्व के मुख्य अजेंडे को लागू करने में कामयाबी हासिल कर ली है। धारा 370 ख़त्म कर दिया गया, तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ क़ानून बनाया गया, बीजेपी और सरकार ने राम मंदिर के मसले पर क़ानूनी लड़ाई जीत ली। मोदी और अमित शाह ने काफी हद तक हिन्दू विरोधी माहौल को बदलने में कामयाबी हासिल कर ली।

अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की संस्कृति को ख़त्म करते हुए सेकुलर शब्द को अप्रासंगिक कर दिया है। कांग्रेस से लेकर वामपंथ तक नरम हिन्दुत्व में अपने लिए वोट के अवसर तलाश रहे हैं और मंदिरों की तरफ भाग रहे हैं।

पाकिस्तानपरस्त अलग-थलग पड़ गए हैं और पाकिस्तान से बातचीत की वकालत करने वालों ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। 

भगवा समर्थक परेशान!

लेकिन, नागरिकता क़ानून ने उन्हें ऑक्सीज़न दिया है। अब से कुछ समय पहले तक जामिया और अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के सरकार विरोधी आन्दोलनों में मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियाँ शामिल नहीं होती थीं। लेकिन, नागरिकता क़ानून ने इन सबको एकजुट कर दिया है।  नागरिकता क़ानून से मुसलमानों को अलग रखने के सवाल पर ख़ुद भगवा समर्थक हैरान-परेशान हैं।

सरकार इसलामिक देशों के सभी प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को भारतीय पासपोर्ट देकर अपने उद्येश्य की पूर्ति कर सकती है। इसके लिए एक तबके को अलग करने की ज़रूरत नहीं थी। गृह मंत्री और दूसरे लोगों के मजबूत स्पष्टीकरण कि नागरिकता क़ानून भारतीय मुसलमानों के अधिकारों पर असर नहीं डालेगा, के बावजूद विपक्ष यह माहौल बनाने में कामयाब रहा कि नागरिकता क़ानून पूरी तरह मुसलिम विरोधी है और समावेशी भारत की अवधारणा को नुक़सान पहुँचा रहा है। श्रीलंका में सिंहलियों के ताप से परेशान हिन्दू तमिलों को इस क़ानून से अलग रखने की वजह से बीजेपी विरोधी ताक़तों को अतिरिक्त बल मिला। 

ताबड़तोड़ फ़ैसले

नागरिकता क़ानून से अलग मौजूदा विरोध ने सरकार की निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार पिछले दिनों बेहद तेज़ गति के साथ फ़ैसले कर रही थी। इसकी शुरुआत नोटबंदी और जीएसटी से हुई थी। इसके बाद धारा 370 और नागरिकता क़ानून अप्रत्याशित फ़ैसले करने के मोदी की प्रतिभा का एक सबूत है। इस मसले पर ग़लत क्रियान्वयन ने सरकार की मंशा पर सार्वजनिक संदेह के बादल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष आदतन शीर्ष पर सत्ता के अति-केंद्रीयकरण के आरोप लगा ही रहा था। 

सरकार राष्ट्रीय महत्व के मामलों में न तो अपने सहयोगियों से और न ही मसले से जुड़े लोगों से विचार विमर्श करती है। ज़्यादातर फ़ैसले एकतरफा होते हैं।

कार्यकर्ताओं की शिकायत

बीजेपी यह दावा करती है कि वह बिना देरी किए अपने घोषणा पत्र में किए गए वायदों को पूरा कर रही है। लेकिन पार्टी के कार्यकर्ताओं को यह शिकायत है कि संसद और विधानसभा में महिलाओं के आरक्षण, 75 मेडिकल कॉलेज की स्थापना, सिंचाई के लिए ज़्यादा से ज़्यादा ज़मीन को सिंचाई लायक बनाना, राष्ट्रीय राजमार्ग बढ़ाना, दो करोड़ नई नौकरियाँ देना, गंगा सफ़ाई और निर्यात दुगुना करने जैसे मसलों पर बीजेपी के दूसरे दर्जे के कार्यकर्ता शिकायत करते हैं। 

बीजेपी ने यह वायदा किया था कि सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री और सभी मुख्यमंत्रियों और दूसरे लोगों के साथ टीम इंडिया का निर्माण करेंगे। विपक्ष का आरोप है कि इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ है। चूंकि मोदी देश के सबसे ताक़तवर और लोकप्रिय नेता हैं, इसलिए अभी भी टीम बीजेपी और टीम इंडिया बना कर मौजूदा माहौल को बदल सकते हैं। रातोंरात चोला बदलने वाले और परजीवियों के तरीके से ऊपर चढ़ने वाले जिनका संघ की विचारधारा से कोई लेना देना नहीं है, प्रधानमंत्री को सही जानकारी नही देते हैं। 

राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व सांस्कृतिक एकता की धरोहर है, पर ये सतत विकास का विकल्प नहीं हो सकते। बीजेपी 2022 में भारत की आज़ादी के 75 साल का उत्सव मनाने के लिए अमृत महोत्सव के आयोजन की योजना बना रही है। श्रेष्ठ भारत नामक विचार पर उत्सव मनाने के लिए यह ज़रूरी है कि प्रतिनिधित्व लोकतंत्र मजबूत किया जाए, जिसका वायदा बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में कर रखा है। अगर देर से मिला हुआ इंसाफ़ नाइंसाफ़ी हो जाता है, वैसे ही असहमति को नकारना युवा को नकारना होगा, ऐसे मौक़े पर सच्चाई को नकारना अपने प्रति न्याय नहीं करना होगा।

(न्यू इन्डियन एक्सप्रेस से साभार)