वक्फ संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित

02:31 am Apr 03, 2025 | सत्य ब्यूरो

लोकसभा ने बुधवार देर रात वक्फ संशोधन विधेयक, 2025 को मंजूरी दे दी। यह विधेयक 12 घंटे से अधिक चली तीखी बहस के बाद पारित हुआ। इसमें 288 सांसदों ने इसके पक्ष में मतदान किया, जबकि 232 सांसदों ने इसके खिलाफ वोट डाला। इस विधेयक को लेकर सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्षी दलों के बीच जमकर बहस हुई। इसमें सरकार ने इसे पारदर्शिता और सुशासन का कदम बताया, वहीं विपक्ष ने इसे असंवैधानिक और अल्पसंख्यक विरोधी करार दिया।

विधेयक में कई अहम बदलाव प्रस्तावित हैं, जैसे वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति, कलेक्टर को वक्फ संपत्तियों की जांच का अधिकार देना, और सरकारी संपत्तियों को वक्फ से बाहर करना। इसके अलावा, वक्फ संपत्तियों को केंद्रीय डेटाबेस में पंजीकृत करना अनिवार्य किया गया है। सरकार का दावा है कि इससे वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग को रोका जा सकेगा और उनकी आय का उपयोग गरीब मुस्लिमों के कल्याण के लिए होगा।

इससे पहले वक्फ विधेयक को लेकर संसद में तीखी बहस हुई। कांग्रेस ने इसे संविधान पर हमला करार दिया, जबकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति केवल प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए होगी और यह धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। सरकार इसे पारदर्शिता और सुशासन का कदम बता रही है, लेकिन मुस्लिम संगठन और विपक्षी दल इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला मान रहे हैं। 

कांग्रेस ने वक्फ विधेयक को संविधान के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह अनुच्छेद 26 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक समुदायों को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार देता है। पार्टी के सांसद केसी वेणुगोपाल ने इसे 'भाजपा की विभाजनकारी नीति' का हिस्सा करार दिया और दावा किया कि यह विधेयक मुस्लिम समुदाय की स्वायत्तता को कमजोर करने की साजिश है। कांग्रेस का यह रुख संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा के साथ-साथ अल्पसंख्यक वोट बैंक को एकजुट करने की रणनीति का हिस्सा भी माना जा सकता है। 

अमित शाह ने लोकसभा में अपने संबोधन में कहा कि गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति वक्फ बोर्ड और परिषद में केवल प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए होगी, न कि धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप के लिए।

उन्होंने विपक्ष पर भ्रामक प्रचार का आरोप लगाया और जोर दिया कि यह विधेयक वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को बेहतर करने और उनकी आय को समुदाय के विकास के लिए सुनिश्चित करने के लिए है। शाह ने यह भी कहा कि गैर-मुस्लिम सदस्य धार्मिक संचालन में शामिल नहीं होंगे, बल्कि केवल संपत्ति के उपयोग की निगरानी करेंगे।

शाह का यह बयान सरकार की उस कोशिश को दिखाता है, जिसमें वह इस विधेयक को सुशासन और पारदर्शिता के ढांचे में पेश करना चाहती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह तर्क विपक्ष और मुस्लिम संगठनों के संदेह को दूर कर पाएगा? कई आलोचकों का मानना है कि गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति का प्रावधान, भले ही प्रशासनिक हो, समुदाय के भीतर अविश्वास पैदा कर सकता है।

सरकार का तर्क है कि वक्फ संपत्तियों में भ्रष्टाचार और दुरुपयोग की शिकायतें लंबे समय से चली आ रही हैं। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि यह विधेयक तकनीक आधारित प्रबंधन और पारदर्शिता लाने के लिए है। सरकार का कहना है कि वक्फ की आय, जो गरीब मुस्लिमों के कल्याण के लिए होनी चाहिए, अक्सर गलत हाथों में चली जाती है। इस संदर्भ में, गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति को एक तटस्थ निगरानी तंत्र के रूप में देखा जा सकता है। 

हालांकि, सरकार के इस दावे पर सवाल उठता है कि क्या यह काम समुदाय के भीतर से चुने गए लोगों या विशेषज्ञों के जरिए नहीं हो सकता था? गैर-मुस्लिमों को शामिल करने का फैसला संवेदनशीलता के बजाय राजनीतिक संदेश देने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे संगठनों ने इस विधेयक को वक्फ व्यवस्था को खत्म करने की साजिश करार दिया है। उनका कहना है कि वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों की मौजूदगी धार्मिक स्वतंत्रता और समुदाय की पहचान पर हमला है। विपक्षी दल भी इसे इसी नजरिए से देख रहे हैं और इसे अल्पसंख्यकों में डर पैदा करने का हथियार बना रहे हैं। 

यह विरोध न केवल विधेयक के प्रावधानों के खिलाफ है, बल्कि सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाता है। मुस्लिम संगठनों का मानना है कि यह कदम उनकी धार्मिक संस्थाओं पर बाहरी नियंत्रण थोपने की कोशिश है, जो लंबे समय में सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है।

यह विधेयक 2024 के चुनावों के बाद की राजनीतिक परिस्थितियों में खासा अहम है। भाजपा गठबंधन सरकार चला रही है और राज्यसभा में उसका पूर्ण बहुमत नहीं है। ऐसे में, सहयोगी दलों का रुख इस विधेयक की किस्मत तय करेगा। अगर यह राज्यसभा में अटकता है, तो यह सरकार के लिए चुनौती बन सकता है। 

सामाजिक स्तर पर, यह विधेयक धार्मिक ध्रुवीकरण को और गहरा कर सकता है। एक तरफ सरकार इसे सुधार के रूप में पेश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ यह मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा कर सकता है। यह विवाद आने वाले दिनों में सड़कों से लेकर संसद तक गूंज सकता है।

(रिपोर्ट का संपादन: अमित कुमार सिंह)