किसान आंदोलन पर इंग्लैंड के सांसदों की बहस से भारत नाराज़ क्यों?

11:25 am Mar 09, 2021 | सत्य ब्यूरो - सत्य हिन्दी

भारत में किसान आंदोलन पर इंग्लैंड के सांसदों की बहस को लेकर भारत सरकार ने कड़ा ऐतराज जताया है। लंदन में भारतीय उच्चायोग ने 'किसानों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन' और 'भारत में प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार' को लेकर कुछ ब्रिटिश सांसदों के बीच ई-याचिका पर बहस की निंदा की है। वह बहस ब्रिटेन की संसद परिसर में सोमवार को हुई। भारतीय उच्चायोग ने कहा है कि वह बहस ग़लत तथ्यों पर आधारित और एकतरफ़ा थी।

बहस एक ई-याचिका के जवाब में आयोजित की गई थी। ई-याचिका 100,000 हस्ताक्षर की सीमा को पार कर गई थी। इस सीमा को पार करना हाउस ऑफ़ कॉमन्स पेटिशन कमेटी द्वारा अनुमोदित किये जाने के लिए ज़रूरी होता है। 

ई-याचिका के बाद इसी बहस को लेकर भारतीय उच्चायोग ने अपनी नाराज़गी जताई और एक बयान जारी किया। इसने बयान में कहा है, 'हमें बेहद अफसोस है कि एक संतुलित बहस के बजाय, झूठे दावे - बिना किसी पुष्टि या तथ्यों के - किए गए और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और इसके संस्थानों पर संदेह जताया गया।'

इसने आगे कहा, 'विदेशी मीडिया, जिसमें ब्रिटिश मीडिया भी शामिल है, भारत में मौजूद है और बातचीत के मामलों का गवाह है। भारत में मीडिया की स्वतंत्रता की कमी का सवाल ही नहीं उठता।'

सोमवार को ब्रिटिश संसद ने भारत में 'किसानों की सुरक्षा' और 'प्रेस स्वतंत्रता' पर बहस करने के लिए 90 मिनट का समय निर्धारित किया। विरोध प्रदर्शनों पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर लेबर पार्टी, लिबरल डेमोक्रेट्स और स्कॉटिश नेशनल पार्टी के कई सांसदों ने चिंता जताई। 

ब्रिटिश सरकार ने कहा है कि जब दोनों देश के प्रधानमंत्री मिलेंगे तो इस मुद्दे को उठाया जाएगा। हालाँकि इसके साथ ही ब्रिटिश सरकार ने भारत के महत्व को भी तवज्जो दी है। इसने कहा है कि भारत और ब्रिटेन बेहतरी के लिए साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

इसने कहा है कि दोनों देश विभिन्न वैश्विक मुद्दों को सुलझाने में द्विपक्षीय सहयोग और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आपसी सहयोग से एक ताक़त के रूप में काम कर रहे हैं। 

बता दें कि किसान आंदोलन का यह मुद्दा तब ब्रिटेन की संसद में पहुँचा जब इसके लिए ई-याचिका की शुरुआत की गई थी। लिबरल डेमोक्रेट काउंसलर गुरच सिंह द्वारा उस ई-याचिका को शुरू किया गया। उस पर 100,000 से अधिक लोगों ने हस्ताक्षर किए। लिबरल डेमोक्रेट सांसद और विदेशी मामलों के प्रवक्ता लेयला मोरन ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों के हस्ताक्षर ने सरकार को इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर छिपने से रुकने के लिए मजबूर किया है। 

बता दें कि जब किसान आंदोलन पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने बयान दिया था तो कनाडा और भारत के बीच भी प्रतिक्रियाएँ आई थीं। तब भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि 'ऐसी कार्रवाई संबंधों को बेहद नुक़सान पहुँचाएँगी'।

भारत में किसानों के प्रदर्शन पर कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के बोलने के क़रीब 4 दिन बाद भारत ने कनाडा के उच्चायुक्त को तलब किया था। इसके साथ ही औपचारिक तौर पर भारत ने ट्रूडो के बयान की निंदा की थी। इसके अलावा भारत ने कनाडा के दूसरे सांसदों द्वारा किसानों के प्रदर्शन पर भी बोलने पर आपत्ति की थी। 

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत में किसानों के आंदोलन पर चिंता जताई थी। किसानों के आंदोलन पर बोलने वाले वह पहले अंतरराष्ट्रीय नेता थे।

ट्रूडो गुरुनानक की 551वीं जयंती पर एक ऑनलाइन कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे और वह ख़ासकर कनाडा में सिख समुदाय को संबोधित कर रहे थे। 

कनाडा में बड़ी तादाद में सिख रहते हैं और माना जाता है कि वहाँ सिख समुदाय का अच्छा-ख़ासा प्रभाव है। भारत में नये कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ जो प्रदर्शन हो रहा है उसमें भी अभी तक अधिकतर सिख ही मुखर होते हुए दिखे हैं।

तब ट्रूडो ने कहा था कि कनाडा हमेशा शांतपूर्ण प्रदर्शन के बचाव में खड़ा रहेगा। उन्होंने कहा था, 'किसानों के विरोध के बारे में भारत से ख़बरें आ रही हैं। स्थिति चिंताजनक है और हम सभी परिवार और दोस्तों के बारे में बहुत चिंतित हैं। मुझे पता है कि आप में से कई लोगों के लिए यह एक वास्तविकता है। मैं आपको याद दिला दूँ, कनाडा हमेशा शांतिपूर्ण विरोध के अधिकारों की रक्षा करेगा।'