अयोध्या: सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करेगा मुसलिम बोर्ड

12:29 pm Nov 20, 2019 | कुमार तथागत - सत्य हिन्दी

बाबरी मसजिद-राम जन्मभूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद भी मामला थमता नज़र नहीं आ रहा है। ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका दायर करने का फ़ैसला किया है। 

रविवार को हुई एक बैठक के बाद ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर ज़रूर करेगी। बोर्ड ने इसके साथ ही अदालत के फ़ैसले में मसजिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने की बात को भी अस्वीकार कर दिया है। उसने कहा है, 'हम मसजिद के बदले ज़मीन स्वीकार नहीं कर सकते।' बोर्ड एक महीने के अंदर ही याचिका दायर कर देगी।   

अदालत ने मसजिद बनाने के लिए ज़मीन सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड को देने का फ़ैसला सुनाया था। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका दायर नहीं करने का फ़ैसला किया है। इसने कहा है कि वह 'एक बंद अध्याय को फिर से खोलना नहीं चाहती है क्योंकि इससे तनाव बढ़ेगा।'

जमिअत-उलेमा-ए-हिन्द के प्रमुख मौलाना असद मदनी ने भी पुनर्विचार याचिका दायर करने बात कही है। उन्होंने कहा, 'हालाँकि इसके शत प्रतिशत आसार हैं कि हमारी याचिका खारिज कर दी जाएगी, हम पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे। यह हमारा हक़ है।' जमिअत ने इससे जुड़ा एक प्रेस बयान भी जारी किया है। 

अरसद मदनी ने ज़मीन नहीं लेने के फ़ैसले का कारण बताते हुए कहा कि मसजिद एक जगह से दूसरी जगह नहीं ले जाई जा सकती, इसलिए दूसरी ज़मीन लेने का सवाल ही नहीं उठता है। 

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर समाधान दिया है, जबकि जमिअत न्याय की लड़ाई सालों से लड़ती आई है। उन्होने कहा :

सर्वोच्च न्यायालय ने मुसलिम पक्ष के अधिकतर तर्कों को स्वीकार किया है और यह माना है कि किसी मंदिर को तोड़ कर मसजिद नहीं बनाई गई थी। अदालत ने यह भी माना है कि 1949 में ग़ैरक़ानूनी तरीके से मसजिद में मूर्तियाँ लाकर रखी गई थीं।


अरसद मदनी, प्रमुख, जमिअत-उलेमा-ए-हिन्द

जमिअत प्रमुख ने कहा कि 'जिस जगह 90 साल तक नमाज पढ़ी जाती रही, उसे मंदिर बनाने के लिए दे देना समझ से परे है।' उन्होंने सवाल उठाया कि 'यदि 1992 में मसजिद न ढहाई गई होती तो क्या अदालत आज उसे तोड़ कर वह जगह मंदिर को देने का फ़ैसला देती'

ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक प्रेस बयान में कहा है कि अदालत के फ़ैसले में ही कहा गया है कि तीन गुम्बदों वाला भवन और अंदरूनी हिस्सा मुसलमानों के कब्जे में रहा है, यह भी कि 1949 में अवैध तरीके से मूर्तियाँ मसजिद में रख दी गई। 

बोर्ड ने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना है कि यह साबित नहीं किया जा सका है कि गुम्बद के नीचे वाली भूमि की पूजा पवित्र देवता के रूप में की जाती रही है। उसने यह भी कहा कि जिस अवैध तरीके से मूर्तियाँ मसजिद के अंदर रखी गईं, हिन्दू शास्त्रों के अनुसार भी उन्हें 'देवता' (deity) नहीं माना जा सकता।

बोर्ड ने यह भी कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय से अपील की जाएगी कि उसे मसजिद के नीचे वाली ज़मीन ही दी जाए। वह न्यायालय किसी दूसरी ज़मीन के लिए नहीं, बल्कि मसजिद के नीचे की ज़मीन के लिए गया था। लिहाज़ा, कोई दूसरी ज़मीन नहीं ली जाएगी। 

बता दें कि 9 नवंबर को दिए अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल रामलला को और मसजिद के लिए मुसलिम पक्ष को दूसरी ज़मीन देने का आदेश दिया गया है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि केंद्र सरकार तीन महीने में ट्रस्टी बोर्ड गठित करे। मंदिर के ट्रस्टी बोर्ड में निर्मोही अखाड़ा को उचित प्रतिनिधित्व देने का आदेश दिया गया है। कोर्ट ने ज़मीन को तीन हिस्सों में बाँटने का इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले को भी ग़लत बताया। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को आदेश दिया है कि मंदिर निर्माण के लिए वह 3 महीने के भीतर ट्रस्ट बनाए। कोर्ट ने मुसलिमों को भी अयोध्या में 5 एकड़ दूसरी ज़मीन देने का आदेश दिया है।

इस मुद्दे पर मुसलिम पक्षकारों के बीच फूट खुल कर सामने आ गई है। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और बाबरी मामले के पक्षकार इकबाल अंसारी ने पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक का बहिष्कार किया। 

मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड की बैठक में शामिल होने के लिए देश भर के मुसलिम नेता और उलेमा लखनऊ पहुँचे थे। सांसद ओवैसी जो पिछली कई बैठकों से ग़ैरहाज़िर रहे थे, इस बार भाग लेने मुमताज कालेज पहुँचे। मौलाना महमूद मदनी, अरशद मदनी, मौलाना जलालुद्दीन उमरी, सांसद ईटी बशीर, खालिद सैफ़उल्लाह रहमानी, वली रहमानी, ज़फरयाब जिलानी और खालिद ऱशीद फिरंगीमहली बैठक में मौजूद थे।