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दिल्ली चुनाव में युवाओं की पहली पसंद मोदी नहीं, अरविंद केजरीवाल

दिल्ली चुनाव में युवाओं की पहली पसंद मोदी नहीं, अरविंद केजरीवाल

क्या आम आदमी पार्टी की बड़ी जीत की बड़ी वजह युवा हैं? क्या युवाओं की पहली पसंद अब केजरीवाल की पार्टी बन गई है? यदि ऐसा है तो युवाओं की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी कैसे मात खा गई? 

क्या आम आदमी पार्टी की बड़ी जीत की बड़ी वजह युवा हैं क्या युवाओं की पहली पसंद अब केजरीवाल की पार्टी बन गई है यदि ऐसा है तो युवाओं की पहली पसंद कहे जाने वाले मोदी कैसे मात खा गए क्या मोदी युवाओं से ज़्यादा उम्रदराज लोगों की पसंद हो गए हैं कम से कम दिल्ली चुनाव में मतदाताओं के आँकड़ों के विश्लेषण से तो यही लगता है।

चुनाव पूर्व कराए गए लोकनीति-सीएसडीएस के सर्वे बताते हैं कि आम आदमी पार्टी को युवाओं ने जमकर वोट दिया। 18 से 25 आयु वर्ग के हर 5 मतदाताओं में से तीन ने केजरीवाल की पार्टी को चुना। यानी 59 फ़ीसदी युवाओं ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया। यह 2015 के विधानसभा चुनाव से 2 फ़ीसदी ज़्यादा है। इस आयु वर्ग में हर तीन में से एक यानी 33 फ़ीसदी युवाओं ने बीजेपी को वोट दिया। यह बीजेपी को मिले कुल मत प्रतिशत से क़रीब सात फ़ीसदी कम है। बता दें कि बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री का चेहरा ही पेश किया गया था और उनके चेहरे पर ही वोट माँगे गए थे। पार्टी ने तो मुख्यमंत्री उम्मीदवार भी घोषित नहीं किया था। इससे पहले 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने प्रधानमंत्री के चेहरे पर वोट माँगा था और तब युवाओं में उनका ज़बरदस्त क्रेज था। इन चुनावों के अलावा भी दूसरे चुनावों और चुनावी रैलियों में युवा मोदी के करिश्मे से काफ़ी प्रभावित रहे हैं।

'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, लोकनीति के आँकड़े दिखाते हैं कि युवाओं की अपेक्षा बीजेपी को ज़्यादा उम्र के लोगों ने वोट दिया। बीजेपी को सबसे ज़्यादा 46 से 55 आयु वर्ग के 46 फ़ीसदी और 56 साल से ज़्यादा उम्र के 42 फ़ीसदी मतदाताओं ने वोट किया। यह पिछली बार के चुनाव से क्रमश: 12 और 6 फ़ीसदी ज़्यादा है। हालाँकि आम आदमी पार्टी को भी इन दोनों आयु वर्ग में क्रमश: 49 और 51 फ़ीसदी वोट मिले, लेकिन एक मामले में एक फ़ीसदी की कमी आई है तो दूसरे में छह फ़ीसदी ज़्यादा है। 

ये आँकड़े साफ़ दिखाते हैं कि युवाओं का रुझान आप के प्रति बढ़ा है तो ज़्यादा उम्र के लोगों का बीजेपी की ओर।

 - Satya Hindi

26-35 आयु वर्ग में आम आदमी पार्टी को जहाँ 54 फ़ीसदी वोट मिले वहीं बीजेपी को 40 फ़ीसदी वोट मिले। दोनों के बीच अंतर अब सिर्फ़ 14 फ़ीसदी का रह गया है, जबकि 2015 में यह अंतर 29 फ़ीसदी का था। तब इस आयु वर्ग में आम आदमी पार्टी को जहाँ 60 फ़ीसदी लोगों ने वोट दिया था वहीं बीजेपी को 31 फ़ीसदी। यानी इस उम्र के लोगों में आप और बीजेपी के बीच फासले कम हुए हैं।

इस बार इस आयु वर्ग में आप और बीजेपी के बीच जो वोटों का अंतर रहा वह पुरुषों और महिलाओं का अलग-अलग ट्रेंड भी दिखाता है। जहाँ पुरुषों के मामले में आम आदमी पार्टी को बीजेपी के मुक़ाबले सिर्फ़ दो फ़ीसदी ज़्यादा वोट मिले वहीं महिलाओं के मामले में 29 फ़ीसदी ज़्यादा वोट मिले। इसका मतलब है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं ने आप को ज़्यादा वोट दिया। 

तो ऐसा किस कारण से हुआ कि आम आदमी पार्टी ने युवाओं में अपनी पैठ बना ली

लोकनीति के सर्वे में इस सवाल का जवाब भी कुछ हद तक मिला जाता है। और इसकी मूल वजह है अलग-अलग मुद्दों को लेकर किया गया छात्रों का प्रदर्शन और उस पर पुलिस की कार्रवाई। सर्वे में सवाल पूछा गया था कि क्या इन प्रदर्शनों में पुलिस द्वारा पीटे जाने की कार्रवाई सही थी या ग़लत तो 18-25 वर्ष के 64 फ़ीसदी युवाओं ने इसे ग़लत बताया। जामिया में घुसकर पुलिस द्वारा छात्रों को पीटे जाने को 71 फ़ीसदी युवाओं ने ग़लत बताया। सर्वे में यह भी कहा गया है कि जब छात्रों से पूछा गया तो इसका प्रतिशत और भी ज़्यादा था। 

बता दें कि छात्रों ने हाल के दिनों में अलग-अलग माँगों को लेकर प्रदर्शन किया था। नागरिकता क़ानून, एनआरसी और एनपीआर के विरोध में जामिया में प्रदर्शन हुआ था और शाहीन बाग़ में यह अभी भी जारी है। फ़ीस बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ जेएनयू में छात्र विरोध कर रहे थे तो दर्जनों नकाबपोश लोगों ने कैंपस में घुसकर हमला किया था। इसके समर्थन में भी अधिकतर युवा दिखे। 

सर्वे में यह पूछा गया कि क्या दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन कर देना चाहिए तो 52 फ़ीसदी युवाओं ने कहा कि हाँ। 

कहा जा रहा है कि बसों में यात्रा मुफ़्त करने से युवा लड़कियों के बीच भी आप की पैठ बनी है। 

माना जा रहा है कि चुनावी रैलियों के दौरान नफ़रत और भड़काऊ बयान देने के कारण भी ग़लत संदेश गया। बीजेपी नेता अनुराग ठाकुर से लेकर प्रवेश वर्मा, योगी आदित्यनाथ और ख़ुद अमित शाह ने भी ऐसा ही बयान दिया था। मतदाताओं ने इसे खारिज कर दिया। माना जा रहा है कि युवाओं को ऐसी भाषा पसंद नहीं आई। ख़ुद गृह मंत्री अमित शाह ने भी इसे स्वीकार किया है कि नफ़रत वाले बयान से नुक़सान हुआ होगा। 

तो इन आँकड़ों से क्या लगता है क्या प्रधानमंत्री मोदी से युवा दूर नहीं हो रहे हैं

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