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दावा पारदर्शिता का था तो फिर जानकारियां क्यों छिपा रही है मोदी सरकार?

दावा पारदर्शिता का था तो फिर जानकारियां क्यों छिपा रही है मोदी सरकार?

जो सूचनाएं 2014 से पूर्व सहज ही आरटीआई से मिल जाया करती थीं, वे आज “राष्ट्र-हित” के नाम पर नहीं दी जा रही हैं। 

हिसार के एक ग्रामीण ने देश के एक बड़े सार्वजनिक बैंक की फसल बीमा कंपनी से आरटीआई के तहत पूछा कि कितने किसानों को बीमा की राशि मिली। बैंक का जवाब था- “यह सूचना राष्ट्र की संप्रभुता के हित में नहीं दी जा सकती।” वैसे यह जानकारी देश के करीब पांच मंत्रालय/विभाग जिलेवार अपनी वेबसाइट पर नियमित रूप से डालते हैं। 

असम सरकार ने कोरोना महामारी के कारण कक्षा 12 के पाठ्यक्रम में 30 प्रतिशत की कटौती करते हुए “स्वतंत्रता के बाद की राजनीति” अनुभाग से जिन पाठों या घटनाओं को हटाया है उनमें- 1984 के दंगे, 2002 के गुजरात दंगे, बैकवर्ड-फॉरवर्ड मंडल आन्दोलन और राम मंदिर मुद्दे के अलावा राष्ट्र निर्माण में नेहरू की भूमिका, नेहरू की विदेश नीति आदि हैं लेकिन कश्मीर समस्या, चीन और पाकिस्तान से 1962, 65 और 71 के युद्ध, आपातकाल, जनता दल और बीजेपी के उभार को बनाए रखा गया है। 

नेहरू-विरोधी राजनीति 

अपनी नेहरू-विरोधी राजनीति के कारण भावी पीढ़ी को अज्ञानी बनाना एक अपराध होगा क्योंकि ये किशोर वैश्विक प्रतियोगिता में जायेंगे या देश के लिए काम करना शुरू करेंगे और वह भी अपने अर्ध और पूर्वाग्रहग्रस्त ज्ञान के साथ। याद करें, वादा तो था पारदर्शी सरकार देने का लेकिन अगर बैंक भी राष्ट्र और संप्रभुता की नयी परिभाषा गढ़ कर तथ्यों को छिपायेंगे तो वह दिन दूर नहीं कि दरोगा इसी परिभाषा के तहत अपने ख़िलाफ़ शिकायत करने वाले को रासुका में “भीतर” करने लगें। 

मोदी-2 सरकार ने आते ही सूचना कानून में संशोधन कर सीआईसी के पांच साल के कार्यकाल की निश्चितता समाप्त की और व्हिसिलब्लोअर की सुरक्षा का प्रावधान हटाया। जो सूचनाएं 2014 से पूर्व सहज ही आरटीआई से मिल जाया करती थीं, वे आज “राष्ट्र-हित” के नाम पर नहीं दी जा रही हैं।

कॉरपोरेट घरानों को सहूलियत

पारदर्शिता के दावे के ठीक विपरीत, 2017 में चुनाव आयोग के जबरदस्त विरोध के बावजूद चुनावी बांड खरीदने की नीति अपनाई गयी जिसके तहत कॉरपोरेट घराने बिन किसी रोकटोक के राजनीतिक दलों को पैसा दे सकते हैं और जब यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो वहां भी तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की सदारत वाली बेंच ने चुनाव ख़त्म होने के बाद सीलबंद लिफाफे में सरकार से राजनीतिक दलों को मिलने वाले धन का ब्यौरा माँगा। फिर मामला वहीं ठहर गया। पारदर्शिता समुन्नत प्रजातंत्र की अपरिहार्य शर्त है। 

पुलिस ने क्यों बदली चार्जशीट

ताज़ा खबर के अनुसार, पुलिस ने वह चार्जशीट बदल दी है जिसमें ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान अशांति बना कर देश की छवि खराब करने का तथाकथित षड्यंत्र 8 जनवरी को छात्र नेता उमर खालिद, पार्षद ताहिर हुसैन और कार्यकर्ता खालिद सैफी ने रचा था। पुलिस को तथाकथित “षड्यंत्र रचने की” तारीख को लेकर अपनी गलती का अहसास तब हुआ जब उसे पता चला कि ट्रम्प की भारत आने की खबर ही पहली बार भारतीय मीडिया में 13 जनवरी को प्रसारित हुई थी। लिहाज़ा पुलिस ने वह पैरा हटा कर अब षड्यंत्र की तारीख 16 जनवरी की है। हालाँकि चार्ज-शीट संख्या 65 और 101 आज भी कोर्ट के रिकॉर्ड में है। 

नई चार्ज-शीट संख्या 59 में “ट्रम्प एंगल और इसके लिए 8 जनवरी की मीटिंग” वाला भाग हटा दिया गया है। 

दिल्ली दंगों को लेकर देखिए, वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष का वीडियो- 

पुलिस के रवैये पर सवाल

देश ने देखा कि केंद्र का एक मंत्री नारा लगाते हुए “देश के गद्दारों को” कह रहा था और जनता से “गोली मारो...को” बुलवा रहा था जबकि एक स्थानीय नेता “24 घंटे के बाद तो हम आपकी भी नहीं सुनेंगे” कहकर एक पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में धमकी दे रहा था। लेकिन पुलिस को इसमें कोई भड़काऊपन नहीं दिखा लेकिन खालिद द्वारा 1000 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के अमरावती में दिए गए भाषण जिसमें बार-बार शांतिपूर्ण आन्दोलन की अपील थी, भड़काऊ और राष्ट्र के ख़िलाफ़ षड्यंत्रकारी लगे। 

डॉ. कफील ख़ान के ख़िलाफ़ उत्तर प्रदेश की पुलिस द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाने को हाई-कोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए ख़ारिज कर दिया।

शरजील इमाम का मामला

जेएनयू शोधकर्ता शरजील इमाम को देशद्रोही बताने के लिए पुलिस ने चार्ज-शीट में तमाम आरोपों के अलावा यह भी दावा किया है शरजील केवल एक पक्षीय किताबें पढ़ता है और दूसरे पक्ष की जानकारी अपने शोध-विषय के लिए नहीं लेता था, लिहाज़ा वह “कट्टर” (रेडिकल) बन गया है और अपने भाषणों में “ब्राह्मणवादी व्यवस्था और संविधान को “शिक्षित पंडितों” द्वारा लिखा दस्तावेज बता कर लोगों को भड़काता है।” 

दिल्ली पुलिस भूल गयी कि मनुवादी/ब्राह्मणवादी व्यवस्था बीएसपी का चुनावी नारा होता था। इस पार्टी से वर्तमान सत्तादल ने चुनावी-समझौता भी किया और जहाँ तक पढ़ने का सवाल है, तो पुलिस के जांचकर्ता को भारत का संविधान या आईपीसी यह अधिकार नहीं देती कि वह इस बात पर प्रॉसिक्यूशन थ्योरी बनाये कि शोध में क्या पढ़ा जाना चाहिए और क्या नहीं। यह काम शोधकर्ता के विश्वविद्यालय और गाइड का है।  

प्रश्न यह है पुलिस जब सत्ता की चेरी बन संविधान प्रदत्त दंड का आतंक समाज के एक वर्ग पर इतने भौंडे ढंग से करती है तो समाज का विश्वास सत्ताधारी वर्ग से ही नहीं सिस्टम से उठने लगता है जिसके दूरगामी और बहुआयामी परिणाम होते हैं।

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