भारत में जनता का भाव कौन जीवित रखे हुए है? 

09:33 am Feb 21, 2022 | अपूर्वानंद

जनतंत्र के लिए सबसे अच्छी खबर क्या है? यह कि जनता जाग्रत है। जनता की जागृति का पता कैसे चलता है? क्या चुनावों में उसकी भागीदारी से? लम्बे वक्त से हमें यही समझाया जाता रहा है। जनता या नागरिक होने का मतलब अपना वोट डालना है, इसका प्रचार सरकारें और राजनीतिक दल भी करते रहते हैं। 

वे हमें बतलाते हैं कि आपका काम एक मतदान के बाद दूसरे मतदान के वक्त अपने मतदान-केंद्र तक आना है। एक बार आपने मतदान कर दिया फिर उसके आधार पर चुनी हुई सरकार बाकी काम करती रहेगी। आप फिर अपने काम से काम रखिए। 

लेकिन वोट तो स्टालिन के रूस में भी डाले जाते थे। क्या स्टालिन काल के सोवियत संघ के लोगों में जनता-भाव था? नहीं था, यह नहीं कहा जा सकता लेकिन तकरीबन 70 साल का सोवियत संघ का इतिहास उसके दमन और पार्टी के द्वारा उसके अपहरण का इतिहास है। 

जब जनता यह भूल जाए कि वह सर्वोपरि है, सत्ता और राज्य के भी ऊपर, तब मानना चाहिए कि वह जनता होने का बोध खो बैठी है। वह बोध समाज में कहीं बना रहता है, इस कारण विद्रोह होता है, क्रांतियाँ होती हैं। सत्ता भले ही अपने मत के कारण बनी हो, याद रखना आवश्यक है कि सत्ता बिना निगरानी के जनमत का अपहरण करने में नहीं हिचकिचाती। 

महाभारत के इस कथन को नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता को मालूम होता है कि धर्म क्या है लेकिन उसकी उस तरफ प्रवृत्ति नहीं होती। उसे यह भी मालूम होता है कि अधर्म क्या है लेकिन उससे उसकी निवृत्ति नहीं होती। इसीलिए सत्ता से जनता का रिश्ता हमेशा संदेह और सावधानी का ही होना चाहिए।

जनतंत्र में सत्ता के अधिकार को निरंकुश होने से रोकने के लिए कई उपाय किए जाते हैं। जनतंत्र एक जटिल प्रक्रिया भी है। चुनाव में बहुमत इकठ्ठा करके सरकार बना लेने के बाद अपने हर कदम को सरकार उस बहुमत की दुहाई देकर उचित ठहराना चाहती है। लेकिन यह जनतंत्र नहीं है। इसीलिए सरकार के हर कदम की जांच के लिए प्रावधान होता है। संसदीय बहुमत संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन करने का अधिकारी नहीं। न्यायपालिका को उसके क़ानून की जांच करने का अधिकार और जिम्मा है। संविधान की कसौटी पर। 

लेकिन इस प्रक्रिया को सजग और सक्रिय बनाए रखना जनता का काम है। इसके लिए उसमें अपनी संप्रभुता की सर्वोच्चता का भाव होना आवश्यक है। वही सबके ऊपर है, न तो सरकार, न राज्य। लेकिन जनता के जनता बने रहने के लिए खुद उसे सक्रिय रहना ज़रूरी है। 

सरकार इस सक्रियता को खत्म करने के लिए यह धोखा देना चाहती है, जनता के एक हिस्से को यह भ्रम पैदा करके कि वह उसकी है। लेकिन उन दोनों का रिश्ता जिस वजह से बन रहा है, वह गणतांत्रिक नहीं है। क्या सत्ता आपसे आपकी जाति, रंग, धर्म के आधार पर आत्मीयता स्थापित करना चाहती है? जसिंता केरकेट्टा की कविता  कविता 'सिंहासन की जाति क्या होती है?' इस छल से सावधान करती है:

 

"एक दिन उन्हें समझाया गया 

राजा जो अपनी जाति  का हो वह दुष्ट नहीं हो सकता 

फिर क्या 

सिंहासन पर जिस जाति का राजा बैठा 

उस जाति के लोग खुशी मनाने लगे 

यह सोचे बिना 

कि राजा की भले कोई जाति होती हो 

पर सिंहासन की जाति क्या होती है?"

कविता कहती है कि सिंहासन की पहली शर्त है उस पर बैठते ही हर राजा सबके लिए भला और न्यायी हो। अगर वह ऐसा नहीं, तो 

" राजा मेरी जाति का ही क्यों न हो 

    अगर वह मेरे पड़ोसियों की 

    हत्या की व्यवस्था करता हो 

     .....

    अगर वह जाति और जानवर के नाम पर 

    भले आदमियों को खत्म करना चाहता हो 

    और अपराधियों को शरण देता हो 

    अगर वह मनुष्य जीवन की गरिमा को 

     गर्त में ले जाता हो 

    और आग में जल रहे एक देश को 

    चाँद पर पानी मिल जाने पर 

    गर्व करने को कहता हो 

    तब मैं ऐसे राजा के खिलाफ बोलूँगी"

लेकिन प्रायः जनता इस कविता की तरह नहीं सोच पाती। वह राजा, या सत्ता और अपने बीच का फर्क मिटा देती है और यह मानने लगती है कि वह जो भी जुल्म या हत्या कर रहा है, वह उसकी तरफ से। इसलिए उसका विरोध करना तो दूर वह उसके साथ खड़ी हो जाती है, उसकी हिंसा में शामिल हो जाती है। 

 

जब वह सत्ता की हिंसा में शामिल हो जाती है तब भी उसे अपनी सक्रियता का भ्रम होता है। जनता का वह हिस्सा जो यह नारा लगाता है कि 'दिल्ली पुलिस लट्ठ चलाओ, हम तुम्हारे साथ हैं' या ‘मोदीजी तुम लट्ठ चलाओ, हम तुम्हारे साथ हैं", वह भी यह सोचता है कि वह सक्रिय है। लेकिन क्या वह वाकई वह सक्रियता है जो जनता-बोध के कारण पैदा होती है या जनता का बोध पैदा करती है? 

क्या वे लोग जो सीएए के खिलाफ आंदोलन के विरुद्ध हिंसा कर रहे थे और उसे भी आंदोलन कह रहे थे, उनमें जनता का बोध था या नहीं? वे जनता के ही एक हिस्से के खिलाफ हैं। वे जसिंता के ठीक उलट अन्याय के साथ हैं।

फिर भारत में जनता का भाव कौन जीवित रखे हुए है? वे छात्राएँ जो रोज़ ब रोज़ अपने स्कूल और कॉलेज जा रही हैं और हिजाब की वजह से जिन्हें क्लास में घुसने नहीं दिया जा रहा है, फिर भी जो रोज़ाना वहाँ जा रही हैं और अपने हक़ का दावा पेश कर रही हैं और अदालत में भी अपने संवैधानिक अधिकार के लिए बहस कर रही हैं, वे जनता के इस बोध को जीवित रखने का दायित्व पूरा कर रही हैं। 

सत्ता की ओर से हिंसा 

अगर पिछले कुछ सालों को देखें तो हमें सीएए में छिपी नाइंसाफी के खिलाफ लड़ती हुई औरतें दिखलाई पड़ती हैं जो प्रायः मुसलमान हैं। चाहे कर्नाटक की छात्राएँ हों या शाहीन बाग़ की औरतें, उनके स्वर में कहीं हिंसा नहीं है। उनके मुकाबले आप उस भगवाधारी भीड़ को देखिए जो इन छात्राओं पर फब्ती कसते हुए, हुड़दंग कर रही है। शाहीन बाग़ और वैसे धरनों के खिलाफ की भीड़ को भी याद करिए। उनके घृणा से विकृत चेहरों और नारों को याद कीजिए। इस भीड़ को भ्रम है कि उसमें और सत्ता में भेद नहीं रह गया है। सत्ता उसकी तरफ से हिंसा कर रही है और वह सत्ता की तरफ से। 

शहरों से बहुत दूर छत्तीसगढ़ के उन आदिवासियों को मत भूलिए जो सिलगेर और बस्तर के दूसरे इलाकों में कई महीनों से सैन्य बल के विस्तार के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। यह भी उस जनता भाव या बोध को जीवित रखने की कार्रवाई है। उनके स्वर में भी हिंसा नहीं है, क्रोध भले हो। जनता-बोध में 'दूसरी' जनता के प्रति कभी घृणा नहीं होती। वह सबसे एकजुटता और बंधुत्व की मांग करती है।  

बुलडोजर की धमकी 

चुनाव के समय हमें इस जनता बोध के बारे में विचार करना आवश्यक है। उसके समाज से लुप्त हो जाने के कारण 'राजा' में वह अहंकार पैदा हो जाता है जिसके चलते वह उन मतदाताओं को बुलडोज़र की धमकी देता है जिन्होंने उसे वोट नहीं दिए। चुनाव में मतदान करने से जो अपने बल का जो बोध पैदा होता है, उसे बनाए रखने के लिए मत देने के बाद भी बहुत कुछ करना होता है। 

वह करना तभी संभव है जब हम महाभारत के अनुसार धर्म और अधर्म का भेद कर सकें और अपना पक्ष चुन सकें।