प्रधानमंत्री का भाषण इतना अर्थहीन कैसे हो सकता है?

11:09 am Aug 20, 2023 | वंदिता मिश्रा

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस की 77वीं वर्षगांठ,15 अगस्त, के अवसर पर देश को संबोधित किया। अपने लगभग 90 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार की विभिन्न योजनाओं और उपलब्धियों का ज़िक्र किया। उपलब्धियां गिनाते-गिनाते पीएम मोदी इतना आगे चले गए कि 2024 में अपनी सरकार फिर से बनने का सपना देखने लगे। अपनी पीठ स्वयं थपथपाते हुए उन्होंने कहा कि “बदलाव का वादा मुझे यहाँ ले आया, मेरा प्रदर्शन मुझे फिर यहाँ ले आया…और अगली बार 15 अगस्त को इसी लाल किले से मैं आपको देश की उपलब्धियां, आपके सामर्थ्य, आपके संकल्प उसमें हुई प्रगति, उसकी जो सफलता है, उसके गौरवगान उससे भी अधिक आत्मविश्वास के साथ आपके सामने प्रस्तुत करूंगा।”

मुझे नहीं पता प्रधानमंत्री जी का भाषण किसने लिखा है लेकिन जो भी इसका सूत्रधार है उसने भारत के प्रधानमंत्री को भ्रमित करने की भरपूर कोशिश की है। 15 अगस्त वह दिन है जब आज से लगभग 77 साल पहले भारत ब्रिटिश सत्ता से आजाद हुआ था। इसी आजादी के पर्व को याद करने के लिए हर साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। आजादी के बाद से हमेशा भारत के सभी प्रधानमंत्री दिल्ली के लालकिले पर तिरंगा लहराकर भारत की आजादी के पर्व की शुरुआत करते रहे हैं। यह दिन राष्ट्र को आजादी और उसके महत्व को याद दिलाने का समय होता है न कि अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को व्यक्त करने का। 

भारत के लिए भावी विजन की बात करते करते पीएम मोदी अप्रत्यक्ष रूप से 2024 के आम चुनावों में अपनी व्यक्तिगत सफलता की बात करने लगे। यह वास्तव में उचित नहीं था। यह 2024 के चुनावों के लिए आयोजित मंच नहीं था यह तो सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए एक गौरवशाली दिन था जिसे एक व्यक्ति, उससे सम्बद्ध राजनैतिक दल और उसकी विचारधारा की अगले चुनावों में निश्चित सफलता की घोषणा से जोड़ने की कोशिश की गई, जो दुर्भाग्यपूर्ण था। 

लेकिन जब पीएम मोदी ने आत्मविश्वास के साथ लगभग यह घोषणा कर ही दी है कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में न सिर्फ उनका दल ही चुनाव जीतेगा बल्कि वो स्वयं ही अपने दल से प्रधानमंत्री के रूप में चुने जाएंगे, तब यह समीक्षा करनी जरूरी है कि पिछले लगभग 9 सालों में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी भारत को कहाँ लेकर आ गए हैं। उनका भाषण यह साबित करता है कि उन्हे पार्टी के अंदर लोकतंत्र की बिल्कुल जरूरत नहीं है। आखिर उन्होंने कैसे सोच लिया कि उनका दल उन्हे ही पीएम के रूप में चुनेगा? अन्य दलों पर परिवारवाद के नाम पर हमला करने वाले पीएम मोदी अपनी पार्टी में किस ‘वाद’ को बढ़ावा दे रहे हैं जिसमें चुनावों से 6-8 महीने पहले ही वह अकेले ही पार्टी के सारे निर्णय ले रहे हैं? मुझे बस इतना पता है कि यह जो भी ‘वाद’ है वह परिवारवाद से काफी खतरनाक है।  

बात सिर्फ पार्टी के अंदर फैल रहे अलोकतांत्रिक चेतना की ही होती तो शायद रुका जा सकता था, लेकिन भारत में पिछले 9 सालों में जो हुआ है उससे भारत की दशकों पुरानी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को आघात पहुँचा है।


वी-डेम(वैरायटीज़ ऑफ डेमोक्रेसी) डेमोक्रेसी रिपोर्ट 2023 के अनुसार भारत ‘चुनावी लोकतंत्र सूचकांक’ में 108वें स्थान पर है। भारत की हालत तंजानिया, बोलीविया, मैक्सिको और नाइजीरिया जैसे देशों से भी नीचे है। दुर्भाग्य से भारत उन 10 देशों में शामिल है जो पिछले 10 वर्षों के दौरान सबसे ज्यादा निरंकुश रहे हैं। 2021 में, वी-डेम ने भारत को "चुनावी निरंकुशता" वाले राष्ट्र के रूप में वर्गीकृत किया था। तब इस रिपोर्ट की बहुत आलोचना की गई थी लेकिन    वी-डेम एकमात्र संस्था नहीं है जिसने भारत में बिखरते लोकतंत्र की धारणा को आंकड़ों से पुष्ट किया हो। 2021 में ही वाशिंगटन-डीसी स्थित संगठन ‘फ्रीडम हाउस’ ने अपनी रिपोर्ट ‘फ्रीडम इन द वर्ल्ड’ के माध्यम से भारत को "आंशिक रूप से स्वतंत्र" राष्ट्र के रूप में सूचीबद्ध किया था। राजनैतिक अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता के आधार पर अपनी रिपोर्ट बनाने वाली इस संस्था की एक और रिपोर्ट ‘फ्रीडम ऑन द नेट’, जोकि विभिन्न राष्ट्रों में मिल रही इंटरनेट फ्रीडम का आँकलन करती है इसमें भी भारत की स्थिति अच्छी नहीं है। 

इसके अतिरिक्त एक और प्रतिष्ठित संस्था ‘इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस’ ने अपनी रिपोर्ट ‘ग्लोबल स्टेट ऑफ डेमोक्रेसी (जीएसओडी)’ रिपोर्ट-2021 में भारत को पीछे खिसकने वाले और "प्रमुख गिरावट वाले" लोकतंत्र के रूप में वर्गीकृत किया था।

जीएसओडी रिपोर्ट विश्व की विभिन्न सरकारों के लिए एक ‘स्कोर’ भी जारी करती है। इस स्कोर को ‘प्रतिनिधि सरकार स्कोर’ का नाम दिया गया है। एक प्रतिनिधि लोकतंत्र में सबसे अहम है उच्च प्रतिबद्धता वाली प्रतिनिधि सरकार ऐसे में यह स्कोर किसी वर्ष विशेष में किसी देश में उपस्थित और प्रचलित लोकतान्त्रिक मानकों की जांच कर सकती है। जीएसओडी के आंकड़ों से पता चलता है कि 1975 और 1995 के बीच भारत का प्रतिनिधि सरकार स्कोर 0.59 से बढ़कर 0.69 हो गया। वर्ष 2015 में यह बढ़कर 0.72 तक पहुँच गया था। लेकिन 2020 में इसने 0.61 के स्तर को छू लिया जोकि 1975 में आपातकाल के दौरान के भारत के स्कोर 0.59 के निकट था। यही नहीं जीएसओडी रिपोर्ट-2021 में 1975 के बाद से धार्मिक स्वतंत्रता संकेतक पर सबसे कम स्कोर के लिए श्रीलंका और इंडोनेशिया के साथ भारत को भी सूचीबद्ध किया गया है। 

स्पष्ट है कि पिछले 10 सालों में भारत लोकतंत्र के रास्ते से पूरी तरह भटक गया है। ये सभी रिपोर्ट न भी उपलब्ध हों तब भी संसद से लेकर सड़क तक सरकार के रवैये से यह बिल्कुल साफ है कि वर्तमान में लोकतान्त्रिक मूल्यों में होने वाला क्षरण डराने वाला है।

प्रधानमंत्री जी कहते कुछ और हैं जबकि उनकी सरकार काम कुछ और करती है। G-20 के स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेते हुए पीएम मोदी ने स्वास्थ्य पर जोर देने और इससे संबंधित तकनीकी हस्तांतरण पर जोर दिया। जब वो स्वयं देश के मुखिया होने के बावजूद यहाँ जरूरी दवाओं के दाम बढ़ने से नहीं रोक सकते तब किस आधार पर वह अन्य राष्ट्रों से उनकी तकनीक को अबाध रूप से पाना चाहते हैं? 01 अप्रैल 2023 से भारत में जरूरी दवाओं सहित 384 दवाइयों की कीमत को बढ़ा दिया गया है। अब देश के सभी राज्यों में दर्द-निवारक, एंटीबायोटिक, एंटी-इन्फेक्टिव और हृदय रोग की दवाओं की कीमत बढ़ चुकी है।  

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 3-4 सालों में शेड्यूल्ड दवाओं(कीमतों पर सरकारी नियंत्रण) की कीमत में 15-20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। जब रुपये की कीमत विश्व बाजार में लगातार घट रही हो, घरेलू बाजार में भी सामान खरीदने पर ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ रहे हों ऐसे में जरूरी दवाओं के दाम में बढ़ोत्तरी अन्याय नहीं है? इससे भी ज्यादा बुरी खबर यह है कि आयुष्मान भारत योजना में अरबों का घोटाला सामने आ गया है जिसे भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में बताया है।

15 अगस्त के भाषण और स्व-वाहवाही से इतर भारत में जानने के लिए बहुत कुछ है, संभवतया जिसकी जानकारी भारत के प्रधानमंत्री को होगी ही। सीएमआईई के बेरोजगारी संबंधी हालिया, के आँकड़े बता रहे हैं कि अगले 1000 सालों का सपना दिखाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के अंतर्गत भारत में बेरोजगारी ‘ऐतिहासिक’ स्तर पर है। जुलाई 2023 के आंकड़ों के अनुसार इस समय बेरोजगारी दर 7.95% के स्तर पर है। मोदी सरकार की विफलता यह है कि 2014-15 में जब उन्हे मनमोहन सिंह से सत्ता मिली थी तब बेरोजगारी दर मात्र 5.44% थी, वर्तमान, 7.95% के आँकड़े के माध्यम से चाहें तो पीएम कैलकुलेट कर लें कि भारत का युवा कहाँ से कहाँ पहुँच गया है। 

पीएम मोदी ने लाल किले से कहा कि “डेमोग्राफी,डेमोक्रेसी और डाइवर्सिटी की त्रिवेणी भारत के हर सपने को पूरा करेगी”। पर क्या वह बताएंगे कि यह कैसे सम्पन्न होगा? लोकतंत्र की दशा और दिशा तो आंकड़ों ने स्पष्ट कर ही दी है। भारत की डेमोग्राफी(जननांककीय) को लेकर भी वर्तमान सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट समझा जा सकता है।

2019 में लाया गया CAA-NRC, असम सरकार का अल्पसंख्यकों के प्रति दृष्टिकोण, मणिपुर में चल रही नृजातीय हिंसा व हरियाणा और पंजाब उच्च न्यायालय की नूह हिंसा पर की गई टिप्पणी इस बात पर संदेह व्यक्त करने के लिए पर्याप्त है कि यह किसी भी तरह भारत के सपने को पूरा नही कर सकती है। जहां तक जननांकिकीय लाभ का प्रश्न है तो तमाम अर्थशास्त्री यह कहने लगे हैं कि भारत को अपेक्षाकृत बड़ी युवा जनसंख्या के कारण, जिस जननांकिकीय लाभ से फायदा हो सकता था अब वो पहुँच से दूर जा रहा है। जहां तक प्रश्न डाइवर्सिटी(विविधता) के माध्यम से भारत के सपने पूरे करने का है उसके लिए प्रधानमंत्री को देश के बड़े हिस्से में फैल रही अल्पसंख्यक विरोधी आवाजों से लड़ना होगा या यह कहें कि उन्हे कानून के माध्यम से खत्म करना होगा लेकिन जिस तरह वो लिन्चिंग, ब्रजभूषणों और मणिपुर जैसे खतरनाक मामलों पर चुप रहने की जिद कर लेते हैं उससे उनकी क्षमता पर संदेह होता है। 

प्रधानमंत्री जी ने G-20 की बैठक में एसबीआई की एक रिपोर्ट का जिक्र किया है। भारत ‘रिपोर्ट में’ आर्थिक रूप से सशक्त होता दिख रहा है। यदि एसबीआई की हालिया रिपोर्ट सही है तो इसका प्रभाव भारत की आर्थिकी पर नजर आना चाहिए। एक आँकड़े के अनुसार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार जबसे सत्ता में आई है भारत में औसत वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर 5.3% है जबकि इसी दौरान ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार हेतु संचालित मनरेगा योजना के तहत रोजगार की मांग में 5.4% की वृद्धि हुई है। क्या एसबीआई को यह नहीं लगता कि यदि देश में हो रही वृद्धि वास्तविक और प्रभावकारी है तो इसका असर ग्रामीण क्षेत्रों में भी जाना चाहिए था, मनरेगा के तहत रोजगार की मांग में कमी आनी चाहिए थी और इन लोगों को रोजगार फैक्ट्रियों में मिलने चाहिए थे न कि गाँव में कुआं और तालाब खोदने में ताकि उन्हे निम्नतर जीवन जीने से मुक्ति मिल पाती।

ऐसा प्रतीत होता है कि देश की वास्तविक अर्थव्यवस्था और उसके सरकारी आंकड़ों में बड़ा विरोधाभास है।  

भारत के प्रधानमंत्री का भाषण इतना अर्थहीन कैसे हो सकता है? प्रधानमंत्री स्वयं में बहुत बड़ा कद है, इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि कोई कितने साल भारत का प्रधानमंत्री रहता है लेकिन जबतक रहे भारत की गरिमा और छवि को नुकसान नहीं होना चाहिए। लाल किले से भाषण के दौरान पीएम ने कहा कि कि उनकी सरकार ने अपनी 'वाइब्रेंट विलेजेज' योजना के जरिए सीमावर्ती गांवों के बारे में सोच बदल दी है। उन्होंने कहा, "सीमा पर स्थित गांव भारत का आखिरी गांव नहीं है, जैसा कि पहले कहा गया था, यह देश का पहला गांव है।" 

पीएम मोदी बिल्कुल नहीं समझ पा रहे हैं कि शब्द बदलने से देश नहीं बदल सकता है। आज भारत को धरातल और वास्तविकता में बदलाव चाहिए। क्या ‘रेसकोर्स’ का नाम ‘लोककल्याण मार्ग’ कर देने से कुछ बदला? पहलवान वहीं दिल्ली में बैठे रहे, अपने शोषण के लिए गुहार लगाते रहे लेकिन ‘लोककल्याण मार्ग’ से आवाज तक नहीं आई। वैसे ही पहले गाँव और आखिरी गाँव से कुछ नहीं बदलने वाला।


भारत राम, बुद्ध, कृष्ण, महावीर और गाँधी का देश है यहाँ ऐसा कुछ भी नया शब्द नहीं गढ़ पाएंगे जो देश बदल देगा, जिस देश ने कण-कण में भगवान खोज लिया हो वहाँ शब्दों से कुछ नहीं बदलने वाला। सीमावर्ती राज्यों जम्मू एवं कश्मीर और मणिपुर के हालात प्रधानमंत्री की इच्छाशक्ति और निर्णयन क्षमता से बदलेंगे किसी शब्दमात्र से नहीं। मणिपुर में फिर से हिंसा हो गई। सरकार से लूटे गए हथियारों के सहारे नगा प्रभाव वाले क्षेत्र के थवई कुकी गाँव में कुछ लोगों ने हमला करके 3 लोगों को मार डाला। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसी गाँव के पास असम राइफल्स की एक चौकी बनी हुई थी जिसे कुछ दिन पहले यहाँ से हटा दिया गया, पता नहीं ऐसा क्यों किया गया? सीमावर्ती राज्य में हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है, चीन द्वारा छीनी गई जमीन पर कोई फैसला और ‘कड़ा कदम’ उठाया नहीं जा सका है बस शब्द बदलने और नाम बदलकर देश को बदलने की नाकाम कोशिश में देश के संसाधनों को बर्बाद किया जा रहा है।  

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट केंद्र सरकार की पोल खोल रही है। शब्दों की आड़ और आडंबर में छिपी सरकार को बताना चाहिए कि कैसे इतना बड़ा ड्रग्स रैकेट राज्य में फैल गया? युवाओं को पत्थर फेंकेने से बचाने के लिए निकली सरकार उन्हे ड्रग्स के दलदल में जाने से क्यों नहीं रोक सकी? भारत की आंतरिक सुरक्षा पर प्रश्न उठाती यह रिपोर्ट पीएम मोदी, गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की कार्यक्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगाती है।

जम्मू एवं कश्मीर के DGP दिलबाग़ सिंह ने कहा है कि “पंजाब में भी ऐसा किया गया। वहां आतंकवाद खत्म हो चुका है, लेकिन ड्रग्स की समस्या पहले जैसी ही भयावह है। हम भी उसी दिशा की ओर अग्रसर हैं।”केंद्र के अधिकार में चल रहे जम्मू एवं कश्मीर में हालत यह है कि युवा नशे में डूब चुका है और घाटी के सबसे बड़े रीहैब सेंटर में हर 12 मिनट पर एक युवा नशे की लत के कारण अस्पताल पहुँच रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक नशीले पदार्थों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल 15 से 30 वर्ष की आयु वाले युवा कर रहे हैं। केंद्र सरकार और उनके प्रतिनिधि मनोज सिन्हा को बताना चाहिए कि कैसे साल 2019 में 103 किलोग्राम हेरोइन जब्त की गई थी, वो 2022 में बढ़कर 240 किलो हो गई? यदि सरकार जब्त की गई ड्रग्स को अपनी कामयाबी मान रही है तो यह भी बता दे कि नशे के चक्र में फंसे युवाओं की संख्या कैसे बढ़ गई? रोजगार की माला जपने वाली सरकार को इस आँकड़े पर पर गौर करना चाहिए जिसके अनुसार नशा करने वाले 25% युवा बेरोजगार है। 

द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में जम्मू-कश्मीर के डीजीपी ने कहा, “घाटी में नशीली दवाओं की महामारी फैल रही है। अगर हमने समय से ध्यान नहीं दिया और अभी से ड्रग्स की चुनौती का सामना करने के लिए आगे नहीं बढ़े तो बहुत बड़ा दर्द हमारा इंतजार कर रहा है”। डीजीपी सिंह ने कहा कि ड्रग्स की चुनौती आतंकवाद से बड़ी है। क्या इसका मतलब यह हुआ कि जिस एक चुनौती, आतंकवाद से लड़ने के नाम पर धारा 370 को हटाया गया, राज्य का दर्जा छीन लिया गया, नेताओं को घरों में नजरबंद कर दिया गया, लगभग साल भर इंटरनेट बंद किया गया वहाँ इतनी अधिक अक्षमता से काम किया गया कि उससे भी बड़ी समस्या आकर खड़ी हो गई? यह कैसा प्रशासन है, कैसी सरकार है? जम्मू एवं कश्मीर को बेहतर स्थिति में लाने के वादे के बाद उसे बदतर स्थिति में पहुँचने से रोक क्यों नहीं पाई मोदी सरकार?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या कहते हैं और क्या वादा करते हैं उस पर भरोसा करना थोड़ा मुश्किल है। संसद में भावी 1000 सालों की बात करने वाले पीएम मोदी लालकिले से 2047 की बात कर रहे हैं। 2047 में भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की बात करने वाले पीएम मोदी यह नहीं बता रहे हैं कि जिस देश में पहले से स्थापित शांति को बरकरार रखने में मुश्किल हो रही है वह 2047 तक विकसित राष्ट्र कैसे बनेगा। 

क्या कुछ हजार किलोमीटर सड़क बन जाने से या कुछ लाख कारें और बिक जाने से भारत को विकसित कहा जाने लगेगा? निवेश के धन से देश कभी विकसित नहीं बनते, उन्हे विकसित बनाता है आपसी सद्भाव और स्थायित्व।


सिर्फ आर्थिक विकास ही स्वप्न नहीं हो सकता है क्योंकि ऐसे राष्ट्रों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है जहां आर्थिक विकास तो हुआ है लेकिन नागरिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र का क्षरण अतुलनीय है। वी-डेम रिपोर्ट के अनुसार, अंतर-लोकतंत्र विश्व व्यापार 1998 में 74% से घटकर 2022 में 47% हो गया है।दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद का 46% अब निरंकुश देशों से आता है और पिछले तीन दशकों में लोकतान्त्रिक देशों की निरंकुश देशों पर निर्भरता दोगुनी हो गई है। मतलब यह हुआ कि कोई नेता आर्थिक विकास के स्वप्न दिखाकर नीचे से लोकतंत्र की जमीन खिसका सकता है और इस तरह नागरिक सिर्फ एक आर्थिक यूनिट बनकर रह जाएंगे जिन्हे काम का पैसा तो मिलेगा लेकिन जीवन की स्वतंत्रता अनिश्चित हो जाएगी!

ऐसे में भारत को विकसित बनाने की प्रक्रिया में ऐसे लोगों को हाशिये पर लाना होगा या तो पेज से ही बाहर करना होगा जिनकी मानसिकता 2023 में भी यह बनी हुई है कि उन्हे “मियां वोटों की जरूरत नहीं है”। उन्हे देश में उस मानसिकता को आग लगानी होगी जो तुष्टीकरण को खत्म करने के नाम पर हर दिन सुबह से शाम तक देश के अल्पसंख्यकों में डर का माहौल पैदा कर रहे हैं। उन्हे देश के कानून को 360 डिग्री घुमाकर देखना चाहिए कि आखिर इसमें या इसका अनुपालन करवाने वालों में क्या ऐसी कमी है जिससे खुलेआम “यूपीएससी जिहाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति, भारत में एक टीवी न्यूज चैनल चला रहा है। या वो स्वयं भी अपने मुख्य सलाहकार बिबेक देबरॉय की उस बात को मानने का मन बना चुके हैं जिसमें सलाहकार साहब को लगता है कि देश को अब नए संविधान की जरूरत है? यदि वास्तव में ऐसा है तो 2024 का चुनाव सिर्फ लोकसभा चुनाव नहीं होगा बल्कि जनता को दो शक्तियों के बीच चुनाव करना होगा। 

जनता को गाँधी, नेहरू और स्वतंत्रता संघर्ष के आदर्शों को मानने वालों और उन्हे नकारने वालों के बीच चुनाव करना होगा। इस चुनाव का जो भी परिणाम होगा वो भारत के आगामी भविष्य, यहाँ मिलने वाली नागरिक स्वतंत्रता और रहने वाले नागरिकों संख्या और संरचना को आकार देगा। पर यह बात तय है कि यदि स्वतंत्रता संघर्ष के आदर्शों को आघात पहुँचा तो भारत नकारात्मक रूप से सदा के लिए बदल जाएगा, कोशिश की जाए कि ऐसा न हो!