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कमाई की अपेक्षा भोजन की क़ीमतें ज़्यादा तेज़ी से बढ़ीं: रिपोर्ट

कमाई की अपेक्षा भोजन की क़ीमतें ज़्यादा तेज़ी से बढ़ीं: रिपोर्ट

एक रिपोर्ट के अनुसार खाने के सामान की क़ीमतें आख़िर कमाई यानी सैलरी या दैनिक मज़दूरी से ज़्यादा तेज़ी से बढ़ने का क्या मतलब है? जानिए, एक रिपोर्ट में क्या कहा गया है।

क्या आपको भी ऐसा लगता है कि सामान की क़ीमतें तो बढ़ गईं, लेकिन मज़दूरी या फिर सैलरी नहीं बढ़ी? या फिर यदि सैलरी बढ़ भी गई तो उसकी अपेक्षा खाने-पीने की चीजों की क़ीमतें बेतहासा बढ़ी हैं?

एक रिपोर्ट में पिछले एक साल की क़ीमतों की तुलना करने से तो कम से कम ऐसी ही बात सामने आई है। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2024 में औसतन स्वस्थ भोजन की लागत पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 52% बढ़ गई है। इस बीच औसत वेतन और मजदूरी में 9 से 10% की वृद्धि हुई है। वैसे तो ऐसी स्थिति होने से सभी लोग प्रभावित हुए हैं, लेकिन दिहाड़ी मज़दूरों और कम वेतन पाने वालों के लिए यह बेहद ही डरावनी तस्वीर है।

आम तौर पर दिहाड़ी और अनियमित मज़दूर अपनी कमाई का अधिकतर हिस्सा खाने में ही ख़र्च कर देते हैं और पैसे बचत न के बराबर ही होते रहे हैं। लेकिन पिछले एक साल में भोजन की क़ीमतों में ही इतनी बढ़ोतरी होने से इनके लिए और भी दुरुह स्थिति हो गई है। जिन घरों में महिलाएँ एकमात्र कमाने वाली हैं, उनकी हालत और ज़्यादा ख़राब है।

अंग्रेज़ी अख़बार ने कहा है कि इस विश्लेषण के लिए यह माना गया है कि एक औसत भारतीय परिवार अपनी दैनिक आहार संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने में तभी सक्षम होगा जब वे प्रतिदिन दो थाली के बराबर भोजन का उपभोग करते हैं, जो नाश्ते, दोपहर के भोजन और रात के खाने में बाँटा जाए। पिछले डेटा की कमी के कारण मांसाहारी वस्तुओं पर विचार नहीं किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि सब्जियों की क़ीमतें मुंबई से ली गईं और अन्य वस्तुओं के लिए महाराष्ट्र को एक उदाहरण के रूप में चुना गया। ऐसा इसलिए क्योंकि राज्य में लगातार डेटा उपलब्ध था। मजदूरी के आँकड़े भी उसी राज्य से लिए गए।

सब्जियों की खुदरा क़ीमतों का पता राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के डैशबोर्ड से लगाया गया। सब्जियों के अलावा अन्य वस्तुओं की खुदरा क़ीमतें उपभोक्ता मामलों के विभाग के डैशबोर्ड से ली गईं।

थाली की क़ीमतों में वृद्धि को सीधे तौर पर अधिकांश सब्जियों की लागत में तेज़ बढ़ोतरी से जोड़ा जा सकता है। इस दौरान टमाटर, आलू और लहसुन की खुदरा क़ीमतों में काफ़ी वृद्धि हुई है।

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2023 और अक्टूबर 2024 के बीच टमाटर की कीमतों में 247%, आलू की कीमतों में 180% और लहसुन की कीमतों में 128% की वृद्धि हुई। औसतन, थाली में इस्तेमाल होने वाली सभी सब्जियों की खुदरा क़ीमत में सामूहिक रूप से 89% की वृद्धि हुई, जबकि गैर-सब्जी वस्तुओं की क़ीमत में केवल 1.5% की वृद्धि हुई। हालाँकि, इसी दौरान तुअर दाल और चावल की क़ीमतों में क्रमशः 2.6% और 0.7% की गिरावट आई। नमक, सूरजमुखी तेल और गेहूं जैसी अन्य वस्तुओं की क़ीमतों में केवल मामूली वृद्धि हुई, जो 3% से 18% के बीच थी।

रिपोर्ट के अनुसार नियमित श्रमिकों के लिए महाराष्ट्र में एक कैलेंडर महीने के दौरान अर्जित औसत वेतन पर विचार किया गया। अनियमित मजदूरों के लिए, सार्वजनिक कार्यों के अलावा अन्य कार्यों में लगे लोगों की प्रतिदिन औसत कमाई पर विचार किया गया। मूल्य आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण रिपोर्ट (अक्टूबर से दिसंबर तिमाही -2023) से लिए गए थे। 2024 के लिए डेटा पिछली पाँच अक्टूबर से दिसंबर तिमाहियों के लिए चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर की गणना करके प्राप्त किया गया था। 

महाराष्ट्र में पुरुषों का औसत दैनिक मज़दूरी अक्टूबर-दिसंबर 2023 में 451 रुपये प्रति दिन से बढ़कर अक्टूबर-दिसंबर 2024 में 492 रुपये प्रति दिन हो गया। महिलाओं के लिए इसी तरह के आँकड़े 293 रुपये प्रतिदिन और 324 रुपये प्रतिदिन थे। 

महाराष्ट्र में पुरुषों का औसत मासिक वेतन अक्टूबर-दिसंबर 2023 में 24,321 रुपये से बढ़कर अक्टूबर-दिसंबर 2024 में 26,509 रुपये हो गया। महिलाओं के लिए इसी तरह के आंकड़े 18,959 रुपये और 20,928 रुपये थे।

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