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राज्यसभा चुनाव: महाराष्ट्र में 22 साल बाद वोटिंग की नौबत, कौन जीतेगा?

राज्यसभा चुनाव: महाराष्ट्र में 22 साल बाद वोटिंग की नौबत, कौन जीतेगा?

महाराष्ट्र में आख़िर 22 सालों में पहली बार ऐसी नौबत क्यों आई कि राज्यसभा चुनाव के लिए वोटिंग की ज़रूरत पड़ने वाली है? शह-मात के इस खेल में कौन मारेगा बाजी?

महाराष्ट्र में जैसे-जैसे राज्यसभा का चुनाव नज़दीक आता जा रहा है वैसे-वैसे सभी पार्टियों की धड़कनें बढ़ती जा रही हैं। महाराष्ट्र की 6 राज्यसभा सीटों के लिए 7 उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से माहौल गरमा गया है। पिछले 22 सालों में यह पहला मौक़ा बना है जब महाराष्ट्र में राज्यसभा का चुनाव हो रहा है। इससे पहले राज्य में जितने भी भी बार राज्यसभा का चुनाव हुआ वह सभी निर्विरोध चुने गए थे। लेकिन इस बार बीजेपी द्वारा एक उम्मीदवार के ज़्यादा उतारने के चलते मतदान की स्थिति पैदा हो गई है। हालाँकि महा विकास आघाडी सरकार के नेताओं ने बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस से मुलाक़ात कर चुनाव को निर्विरोध कराने की अपील की लेकिन बीजेपी पीछे हटती हुई दिखाई नहीं दे रही है। यही कारण है कि अब 10 जून को राज्यसभा का चुनाव तय माना जा रहा है।

महाराष्ट्र में राज्यसभा के चुनाव के लिए रस्साकशी तेज चल रही है। छठी सीट के लिए किसी भी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है। सभी पार्टियां छोटे राजनीतिक दल और निर्दलीय विधायकों की तरफ़ नज़र गाड़े बैठे हुए हैं। अगर सीटों की बात करते हैं तो महाराष्ट्र की सत्ता में बैठी महाविकास अघाडी सरकार के पास 169 विधायकों का समर्थन है। इसमें शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के कुल 152 विधायक हैं जबकि 8 निर्दलीय विधायक भी महा विकास आघाडी सरकार के साथ हैं। इसके अलावा छोटी पार्टियों के 8 विधायक भी महाराष्ट्र सरकार के साथ जुड़े हुए हैं। अगर सभी निर्दलीय विधायक और छोटी पार्टियों के विधायक मिलकर शिवसेना के दूसरे उम्मीदवार का समर्थन कर देते हैं तो फिर महा विकास आघाडी सरकार के चार सांसद राज्यसभा के लिए चुने जा सकते हैं लेकिन असल में बात यहीं पर अटकी हुई है।

महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी के 105 विधायक हैं। जिनमें से दो राज्यसभा सांसद तो आराम से चुने जा सकते हैं। राज्य में राज्यसभा सांसद को चुनने के लिए 42 वोटों की ज़रूरत है। इस हिसाब से बीजेपी के पास दो सांसद चुनने के बाद कुल 21 वोट बचते हैं। 

ऐसे में अगर बीजेपी निर्दलीय विधायकों और कुछ छोटी पार्टियों को अपने खेमे में कर लेती है तो फिर बीजेपी की तीसरी सीट निकल सकती है। ऐसा ही कुछ शिवसेना को भी करना होगा।

शिवसेना को एक उम्मीदवार चुनने के बाद 27 वोटों की ज़रूरत पड़ेगी जिसमें उसे कांग्रेस, एनसीपी और निर्दलीय विधायकों को इकट्ठा करना होगा जो थोड़ा सा मुश्किल लग रहा है। अगर महा विकास अघाडी सरकार छोटे दलों और निर्दलीयों को अपने पाले में कर लेती है तो फिर शिवसेना को दूसरी सीट भी हासिल हो सकती है।

हालाँकि चुनाव से पहले ही बीजेपी और शिवसेना दोनों पार्टियां अपने-अपने उम्मीदवारों के जीतने का दावा कर रहे हैं। शुक्रवार को महा विकास आघाडी सरकार के नेताओं ने बीजेपी नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से उनके घर पर जाकर मुलाक़ात की। एनसीपी की तरफ़ से छगन भुजबल, कांग्रेस की तरफ़ से सुनील केदार और शिवसेना की तरफ़ से अनिल देसाई ने देवेंद्र फडणवीस से मुलाक़ात की थी और उन्हें पर्चा वापस लेने की अपील की थी। देवेंद्र फडणवीस ने महा विकास अघाडी सरकार के नेताओं को दो टूक कह दिया कि राज्यसभा का चुनाव दिल्ली से मॉनिटर किया जा रहा है लिहाजा उनके हाथ में कुछ भी नहीं है। यही कारण रहा कि महा विकास आघाडी के ये तीनों नेता वापस बैरंग लौट आए। 

शिवसेना प्रवक्ता और राज्यसभा के उम्मीदवार संजय राउत ने बीजेपी सरकार पर हमला बोला है। राउत ने कहा कि बीजेपी कितना भी पैसा ख़र्च कर ले लेकिन जीत शिवसेना के उम्मीदवार की ही होगी। उधर बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने संजय राउत पर निशाना साधते हुए कहा कि जब शिवसेना को अपने विधायकों पर ही विश्वास नहीं है तो वह फिर राज्यसभा का चुनाव कैसे जीत सकती है।

महाराष्ट्र बीजेपी के सबसे बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दूसरी बार फिर ख़तरा मोल लिया है। इससे पहले देवेंद्र फडणवीस ने जब ढाई साल पहले एनसीपी नेता अजित पवार के साथ सुबह-सुबह शपथ ग्रहण कर सरकार बना ली थी उस समय उन्होंने जुआ खेला था लेकिन उसमें वह मात खा गए थे। लेकिन एक बार फिर देवेंद्र फडणवीस ने धनंजय महाडिक को मैदान में उतारकर फिर से जुआ खेला है। सूत्रों का कहना है कि देवेंद्र फडणवीस ने बीजेपी आलाकमान को यह साफ़-साफ़ बता दिया है कि इस बार वह अपने तीसरे उम्मीदवार को चुन कर दिखाएंगे। यही कारण है कि बीजेपी के बड़े नेता भी देवेंद्र फडणवीस को इस चुनाव में सपोर्ट कर रहे हैं और शिवसेना को मात देने में एक साथ लगे हुए हैं।

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