प्रेमचंद 140 : 31वीं कड़ी : समाजोन्मुख-आत्मोन्मुख-भाषोन्मुख

09:22 am Sep 20, 2020 | अपूर्वानंद - सत्य हिन्दी

भाषा अपने आप में संसार है। या उससे आगे सृष्टि। वह इस संसार को देखनेवाली आँख भर नहीं। वह माध्यम मात्र नहीं अभिव्यक्ति का। इसलिए जब किसी की प्रशंसा में कहा जाए कि उसकी भाषा पारदर्शी है तो उसका अर्थ यही है कि वह इतनी सधी हुई है कि अहंमुक्त हो चुकी है। जैसे बड़े व्यक्तित्वों के साथ एक समय के बाद होता है। उनका व्यक्तित्व पारदर्शी लगता है। उसमें एक अनायासता और स्वाभाविकता होती है। भाषा की इस अनायासता या उसकी निरहंकार प्रकृति से धोखा हो जाता है।

रचनाकार रचना करता है। इसमें रचने की क्रिया को हम अक्सर भूल जाते हैं। प्रेमचंद ने कहीं अपनी भाषा के रचाव के बारे में अलग से कुछ नहीं लिखा। लेकिन पाठक के रूप में हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि जब हम कहते हैं कि लेखक प्रति संसार रच रहा है, तो वह होता भाषा का संसार है। लेखक भाषा के पार सिर्फ अर्थ तक पहुँचने की हड़बड़ी पसंद नहीं करता। यह जो दुनिया गढ़ी है उसने भाषा की, वह चाहता है कि आप उसे देखें। आपकी आँख शब्द, वाक्य पर अटकनी चाहिए। भाषा से आपका रंजन होना चाहिए। यह भाषा लेकिन कैसे सिरजी जाती है

प्रेमचंद कहानी के बारे में लिखते हुए कहते हैं, 

“...जो वस्तु आनंद नहीं प्रदान कर सकती, वह सत्य भी नहीं हो सकती। जहाँ आनंद है, वहीं सत्य है। साहित्य काल्पनिक वस्तु है; पर उसका प्रधान गुण है आनंद प्रदान करना, और इसीलिए वह सत्य है। मनुष्य ने जगत् में जो कुछ सत्य और सुंदर पाया है, और पा रहा है, उसी को साहित्य कहते हैं और गल्प भी साहित्य का एक भाग है।”

साहित्य और उसमें भी गल्प का विषय मनुष्य है। इसलिए कि वही सबसे मुश्किल शै है। उसकी गिरह खोलना ही गल्प का काम है:

“मनुष्य जाति के लिए मनुष्य ही सबसे विकट पहेली है। वह खुद अपनी समझ में नहीं आता है। किसी-न-किसी रूप में वह अपनी ही आलोचना किया करता है, अपने ही मनोरहस्य खोला करता है।”

इसके बाद का वाक्य और ठहर कर पढ़ने योग्य है, 

“मानव-संस्कृति का विकास ही इसलिए हुआ है कि मनुष्य अपने को समझे।”

कहानी या आख्यायिका मनुष्य को समझने की एक कवायद है,

“वर्तमान आख्यायिका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और जीवन के यथार्थ स्वाभाविक चित्रण को अपना ध्येय समझती है...। उसका मापदंड भी जीवन के मापदंड से अलग है। जीवन में बहुधा हमारा अंत उसी समय हो जाता है, जब वह वांछनीय नहीं होता। जीवन किसी का दायी नहीं है। उसके सुख-दुःख, हानि-लाभ, जीवन-मरण में कोई क्रम, कोई संबंध ज्ञात नहीं होता।”

कहानी को जीवन की यह सुविधा नहीं। 

“वह मनुष्य का रचा हुआ जगत है; और परिमित होने के कारण संपूर्णतः हमारे सामने आ जाता है, और जहाँ वह हमारी मानवी न्याय-बुद्धि या अनुभूति का अतिक्रमण करता हुआ पाया जाता है, हम उसे दंड देने को तैयार हो जाते हैं। कथा में अगर किसी को सुख प्राप्त होता है, तो इसका कारण बताना होगा।”

अमृत राय ने अपनी किशोरावस्था का एक प्रसंग कई बार याद किया है। ‘कलम का सिपाही’ के अलावा और भी कुछ अवसरों पर। तेरह साल के अमृत ने पिता प्रेमचंद को अपनी एक कहानी भेजी। किशोर अमृत के ख़याल में वह वयस्क कहानी थी। बहुत करुण भी थी। करुणा की स्रोतस्विनी बहाने के लिए सारे पात्रों को मार डाला गया था।

“...कहानी क्या थी अच्छा ख़ासा कोई मरघट था।” 

कहानी पढ़कर मुंशीजी ने किशोर लेखक को जवाब दिया। आदतन कहानी की तारीफ़ की लेकिन ज़रा दबी जुबान से कहा कि कहानी में अगर इतनी और इस कदर मौतें न हुई होतीं तो अच्छा था। नए लेखक को बुरा न लगे इसलिए साथ यह भी लिख दिया कि वैसे मैं भी इस कमजोरी का शिकार हूँ।

उभरते लेखक ने बड़ी गंभीरता से प्रति उत्तर दिया कि आम तौर पर तुम्हारी बात सही है, लेकिन मेरी कहानी का तर्क ही ऐसा है कि ये मौतें होनी ही थीं।

अमृत राय ने इस खतो किताबत को याद करते लिखा है कि इतनी ऊँचाई से जो जवाब भेजा गया था एक नेक सलाह को ठुकराते हुए, उसके उत्तर में मुंशीजी चुप हो रहे!

इस प्रसंग में कथा के भीतर के तर्क की अनिवार्यता की तरफ प्रेमचंद का इशारा दीख रहा है। कथालोक का तर्क अलग है और उसका पालन न करने पर कथाकार को माफी नहीं है:

“स्रष्टा को जनता की अदालत में अपनी हर एक कृति के लिए जवाब देना पड़ेगा। कला का रहस्य भ्रान्ति है; पर वह भ्रान्ति जिसपर यथार्थ का आवरण पड़ा हो।”

प्रेमचंद को ख़ूब पता था कि वे एक अलग यथार्थ का निर्माण कर रहे हैं और उसपर इस जीवन के तर्क लागू नहीं होते। लेकिन कथालोक का वह तर्क इस जीवन को प्रभावित करे, यह अवश्य हर रचनाकार की अपेक्षा और महत्त्वाकांक्षा रहती है। प्रेमचंद के अनुसार वे अपनी हर रचना में किसी दार्शनिक या भाव सत्य का उद्घाटन करने का प्रयास करते हैं। जब तक वह न मिले वे कहानी नहीं लिख पाते। लेकिन यह सब कुछ होता है भाषा के ज़रिए।

भाषा के क्या मायने हैं रचना के प्रसंग में वह है शब्द की तलाश। लेखक की पहली और आख़िरी खोज है एक सटीक शब्द की। अमृत राय ने ही प्रेमचंद पर बोलते हुए इसकी तरफ़ ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि लेखक के विवेक से अनुप्राणित होती है उसकी वाणी। वह वाणी अमूर्त नहीं है, वह ठोस शब्दों का ही दूसरा नाम है। अमृत राय कहते हैं कि शब्द की यह खोज बहुत कठिन है क्योंकि रचनाकार के लिए 

“किसी शब्द का कोई पर्यायवाची शब्द नहीं होता ... हरेक शब्द एक ब्रह्म है। कमबख्त वो खड़ा है अपने आप। कोई लंबा है, कोई छोटा है, कोई दुबला है, कोई मोटा है, कोई हल्का है, कोई भारी है, उनका  गठन अलग है, उनका रूप, गंध है, शब्दों में गंध होती है। कैसे मैं मान लूँ कि कोई भी शब्द आकर बैठ जाएगा।”

बॉदलेयर के हवाले से वे ‘जस्ट वर्ड’ की तलाश की बात करते हैं। यह उनका आशय हो न हो, लेकिन सही शब्द न्यायपूर्ण शब्द भी होना चाहिए। सटीक! लगभग से काम नहीं चलेगा! लेखक की पूरी मेहनत इस सटीक, निश्चित शब्द की तलाश की मेहनत है। लेकिन ऐसी भाषा जो इन्साफ के खयाल को और बुलंद करती हो। इन्साफ जो दर्दमंदी के बगैर किसी काम का नहीं। वह भाषा जो जीवन के प्रति लगाव पैदा करती हो, उसे इंसाफपसंद और इंसाफदोस्त बनाती हो।

प्रेमचंद की भाषा की तरफ़ सबका ध्यान गया है, लेकिन प्रायः उनके कथ्य के आगे उसकी ओर से नज़र हट भी जाती है। आज हम इसके कुछ नमूने देखें।

‘माँ’ शीर्षक कहानी में लंबी कैद से रिहाई पाकर लौटते पति आदित्य की प्रतीक्षा पत्नी करुणा कर रही है, 

“गगन-पथ का चिरगामी लपका हुआ विश्राम की ओर चला जाता था, जहाँ संध्या ने सुनहरा फर्श सजाया था और उज्ज्वल पुष्पों की सेज बिछा रखी थी। उसी समय करुणा को एक आदमी लाठी टेकता आता दिखाई दिया, मानो किसी जीर्ण मनुष्य की वेदना-ध्वनि हो।”

सूर्य के लिए ‘गगन पथ का चिरगामी’ और फिर करुणा के पति के लिए ‘जीर्ण मनुष्य की वेदना-ध्वनि।’ 

‘बेटों वाली विधवा’ में बेटे धोखे से पति के मृत्यु के बाद उसके गहने ले लेते हैं। माँ इस छल से अनजान है, 

“माता वात्सल्य-भरी आँखों से उनकी ओर देख रही थी और उसकी संपूर्ण आत्मा का आशीर्वाद जैसे उन्हें अपनी गोद में समेट लेने के लिए व्याकुल हो रहा था। आज कई महीने के बाद उसके भग्न मातृ-हृदय को अपना सर्वस्व अर्पण करके जैसे आनन्द की विभूति मिली। उसकी स्वामिनी कल्पना इसी त्याग के लिए, इसी आत्मसमर्पण के लिए जैसे कोई मार्ग ढूँढ़ती रहती थी। अधिकार या लोभ या ममता की वहाँ गंध तक न थी। त्याग ही उसका आनन्द और त्याग ही उसका अधिकार है। आज अपना खोया हुआ अधिकार पाकर अपनी सिरजी हुई प्रतिमा पर अपने प्राणों की भेंट करके वह निहाल हो गयी।”

आगे जब बेटे एक के बाद एक धोखा करते चले जाते हैं और उसे संपत्ति के अधिकार से ही वंचित कर देते हैं, तब का संवाद। माँ अपनी बेटी के विवाह के लिए पैसा चाहती है। बेटे उसी का पैसा उसे नहीं देते:

“फूलमती को जैसे सर्प ने डस लिया - क्या कहा! फिर तो कहना! मैं अपने ही संचे रुपये अपनी इच्छा से नहीं खर्च कर सकती

‘वह रुपये तुम्हारे नहीं रहे, हमारे हो गये।‘

‘तुम्हारे होंगे; लेकिन मेरे मरने के पीछे।‘

‘नहीं, दादा के मरते ही हमारे हो गये!’

उमानाथ ने बेहयाई से कहा - अम्माँ, क़ानून-कायदा तो जानती नहीं, नाहक उछलती हैं।

फूलमती क्रोध-विह्वल रोकर बोली - भाड़ में जाये तुम्हारा क़ानून। मैं ऐसे क़ानून को नहीं जानती। तुम्हारे दादा ऐसे कोई धन्नासेठ नहीं थे। मैंने ही पेट और तन काटकर यह गृहस्थी जोड़ी है, नहीं आज बैठने की छाँह न मिलती! मेरे जीते-जी तुम मेरे रुपये नहीं छू सकते। मैंने तीन भाइयों के विवाह में दस-दस हज़ार खर्च किये हैं। वही मैं कुमुद के विवाह में भी खर्च करूँगी।

कामतानाथ भी गर्म पड़ा - ‘आपको कुछ भी खर्च करने का अधिकार नहीं है।’

उमानाथ ने बड़े भाई को डाँटा – ‘आप खामख्वाह अम्माँ के मुँह लगते हैं भाई साहब! मुरारीलाल को पत्र लिख दीजिए कि तुम्हारे यहाँ कुमुद का विवाह न होगा। बस, छुट्टी हुई। कायदा-क़ानून तो जानतीं नहीं, व्यर्थ की बहस करती हैं।’

फूलमती ने संयमित स्वर में कहा – ‘अच्छा, क्या क़ानून है, जरा मैं भी सुनूँ।‘

उमा ने निरीह भाव से कहा – ‘क़ानून यही है कि बाप के मरने के बाद जायदाद बेटों की हो जाती है। माँ का हक केवल रोटी-कपड़े का है।’

फूलमती ने तड़पकर पूछा – ‘किसने यह क़ानून बनाया है’

उमा शांत स्थिर स्वर में बोला - 'हमारे ऋषियों ने, महाराज मनु ने, और किसने’

फूलमती एक क्षण अवाक् रहकर आहत कंठ से बोली – ‘तो इस घर में मैं तुम्हारे टुकड़ों पर पड़ी हुई हूँ’

उमानाथ ने न्यायाधीश की निर्ममता से कहा – ‘तुम जैसा समझो।‘

फूलमती की संपूर्ण आत्मा मानो इस वज्रपात से चीत्कार करने लगी। उसके मुख से जलती हुई चिनगारियों की भाँति यह शब्द निकल पड़े – ‘मैंने घर बनवाया, मैंने संपत्ति जोड़ी, मैंने तुम्हें जन्म दिया, पाला और आज मैं इस घर में गैर हूँ मनु का यही क़ानून है और तुम उसी क़ानून पर चलना चाहते हो अच्छी बात है। अपना घर-द्‌वार लो। मुझे तुम्हारी आश्रिता बनकर रहना स्वीकार नहीं। इससे कहीं अच्छा है कि मर जाऊँ। वाह रे अंधेर! मैंने पेड़ लगाया और मैं ही उसकी छाँह में खड़ी नहीं हो सकती; अगर यही क़ानून है, तो इसमें आग लग जाये।’

चारों युवकों पर माता के इस क्रोध और आतंक का कोई असर न हुआ। क़ानून का फ़ौलादी कवच उनकी रक्षा कर रहा था। इन काँटों का उन पर क्या असर हो सकता था”

इया संवाद में चतुर और क्रूर पुत्रों से घिरी हुई अपने पति को खो चुकी माँ की लाचारी में ही हिंदू पारिवारिक सिद्धांत की तीखी आलोचना है। माँ की छटपटाहट: ‘मैंने पेड़ लगाया और मैं ही उसकी छाँव में खड़ी नहीं हो सकती।’

इसके बाद का अंश पढ़िए। मनु समर्थित पारिवारिक तंत्र में मातृत्व को स्त्री के जीवन की पूर्णता के सिद्धांत को ऐसी लानत किसी पुरुष लेखक ने न दी होगी,

“जरा देर में फूलमती उठकर चली गयी। आज जीवन में पहली बार उसका वात्सल्य भग्न मातृत्व अभिशाप बनकर उसे धिक्कारने लगा। जिस मातृत्व को उसने जीवन की विभूति समझा था, जिसके चरणों पर वह सदैव अपनी समस्त अभिलाषाओं और कामनाओं को अर्पित करके अपने को धन्य मानती थी, वही मातृत्व आज उसे अग्निकुंड-सा जान पड़ा, जिसमें उसका जीवन जलकर भस्म हो गया।”

मातृत्व वह अग्निकुंड है जिसमें स्त्री का जीवन भस्म हो जाता है। मातृत्व का गुणगान एक तरफ और प्रेमचंद का यह वाक्यांश एक तरफ।

प्रेमचंद फूलमती के दुख से पीड़ित प्रकृति को निहारते हैं, 

“संध्या हो गयी थी। द्वार पर नीम का वृक्ष सिर झुकाए, निस्तब्ध खड़ा था, मानो संसार की गति पर क्षुब्ध हो रहा हो। अस्ताचल की ओर प्रकाश और जीवन का देवता फूलवती के मातृत्व ही की भाँति अपनी चिता में जल रहा था।” 

उस फूलमती के जीवन का अंत:

“गंगा बढ़ी हुई थी, जैसे समुद्र हो। क्षितिज के सामने के कूल से मिला हुआ था। किनारों के वृक्षों की केवल फुनगियाँ पानी के ऊपर रह गयी थीं। घाट ऊपर तक पानी में डूब गये थे। फूलमती कलसा लिये नीचे उतरी, पानी भरा और ऊपर जा रही थी कि पाँव फिसला। सँभल न सकी। पानी में गिर पड़ी। पल-भर हाथ-पाँव चलाये, फिर लहरें उसे नीचे खींच ले गयीं। किनारे पर दो-चार पंडे चिल्लाए - ‘अरे दौड़ो, बुढ़िया डूबी जाती है।’ दो-चार आदमी दौड़े भी, लेकिन फूलमती लहरों में समा गयी थी, उन बल खाती हुई लहरों में, जिन्हें देखकर ही हृदय काँप उठता था।

एक ने पूछा - 'यह कौन बुढ़िया थी'

‘अरे, वही पंडित अयोध्यानाथ की विधवा है।‘

‘अयोध्यानाथ तो बड़े आदमी थे’

‘हाँ थे तो, पर इसके भाग्य में ठोकर खाना लिखा था।’

‘उनके तो कई लड़के बड़े-बड़े हैं और सब कमाते हैं’

‘हाँ, सब हैं भाई; मगर भाग्य भी तो कोई वस्तु है!'”

कहानी जैसे चीख-चीख कर पूछती है

 “स्त्री का, माँ का इस समाज में यह भाग्य क्यों और क्या यह सचमुच भाग्य है स्त्री के भाग यही क्यों बदा है”

‘घरजमाई’ कहानी में माँ और बाप के बीच के अंतर का वर्णन देखिए:

“बच्चों के लिए बाप एक फालतू-सी चीज़ - एक विलास की वस्तु - है, जैसे घोड़े के लिए चने या बाबुओं के लिए मोहनभोग। मोहनभोग उम्र-भर न मिले, तो किसका नुक़सान है; मगर एक दिन रोटी-दाल के दर्शन न हो, तो फिर देखिए क्या हाल होता है! पिता के दर्शन कभी-कभी शाम-सबेरे हो जाते हैं, वह बच्चे को उछालता है, दुलारता है, कभी गोद में लेकर या उँगली पकड़कर सैर कराने ले जाता है और बस, यही उसके कर्तव्य की इति है। वह परदेश चला जाय, बच्चे को परवा नहीं होती; लेकिन माँ तो बच्चे का सर्वस्व है। बालक एक मिनट के लिए भी उसका वियोग नहीं सह सकता। पिता कोई हो, उसे परवा नहीं, केवल एक उछालने-कुदानेवाला आदमी होना चाहिए; लेकिन माता तो अपनी होनी चाहिए, सोलहों-आने अपनी। वही रूप, वही रंग, वही प्यार, वही सब-कुछ। वह अगर नहीं है, तो बालक के जीवन का स्रोत मानो सूख जाता है, फिर वह शिव का नन्दी है, जिस पर फूल या जल चढ़ाना लाज़िमी नहीं, अख़्तियारी है।”

यह प्रेमचंद की परिचित विनोदपूर्ण भाषा है, लेकिन आख़िरी वाक्य में एक व्यंग्य है, बहुत हल्का-सा!

‘पूस की रात’ में खेत अगोरते हल्कू का ठण्ड से मुकाबला:

“रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरु किया। हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया, फिर भी ठंड कम न हुई। ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया है, धमनियों मे रक्त की जगह हिम बह रहा है। उसने झुककर आकाश की ओर देखा, अभी कितनी रात बाकी है! सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े। ऊपर आ जायँगे तब कहीं सबेरा होगा। अभी पहर से ऊपर रात है।”

इस ठंड से लड़ने के लिए हल्कू पत्तियाँ इकठ्ठा कर अलाव जलाता है:

“थोड़ी देर में अलाव जल उठा। उसकी लौ ऊपर वाले वृक्ष की पत्तियों को छू-छूकर भागने लगी। उस अस्थिर प्रकाश में बगीचे के विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थे, मानो उस अथाह अंधकार को अपने सिरों पर सँभाले हुए हों। अंधकार के उस अनंत सागर मे यह प्रकाश एक नौका के समान हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था।

हल्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा था। एक क्षण में उसने दोहर उताकर बगल में दबा ली, दोनों पाँव फैला दिए, मानो ठंड को ललकार रहा हो, तेरे जी में जो आये सो कर। ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था।”

एकदम भिन्न भाव स्थिति की कहानी ‘दिल की रानी’ का आरंभ:

“जिन वीर तुर्कों के प्रखर प्रताप से ईसाई-दुनिया काँप रही थी, उन्हीं का रक्त आज कुस्तुन्तुनिया की गलियों में बह रहा है। वही कुस्तुन्तुनिया जो सौ साल पहले तुर्कों के आतंक से आहत हो रहा था, आज उनके गर्म रक्त से अपना कलेजा ठंडा कर रहा है।”

और हत्या की तर्कहीनता:

“मानव-रक्त का प्रवाह संगीत का प्रवाह नहीं, रस का प्रवाह नहीं - एक बीभत्स दृश्य है, जिसे देखकर आँखें मुँह फेर लेती हैं दृश्य सिर झुका लेता है।”

एक परंपराशील युवती का अपने संस्कारों से लड़ना। ‘कायर’ कहानी की प्रेमा बिरादरी के बाहर शादी का फैसला करने का साहस:

“प्रात:काल प्रेमा सोकर उठी, तो उसके मन में एक विचित्र साहस का उदय हो गया था। सभी महत्वपूर्ण फैसले हम आकस्मिक रूप से कर लिया करते हैं, मानो कोई दैवी-शक्ति हमें उनकी ओर खींच ले जाती है; वही हालत प्रेमा की थी। कल तक वह माता-पिता के निर्णय को मान्य समझती थी, पर संकट को सामने देखकर उसमें उस वायु की हिम्मत पैदा हो गयी थी, जिसके सामने कोई पर्वत आ गया हो। वही मन्द वायु प्रबल वेग से पर्वत के मस्तक पर चढ़ जाती है और उसे कुचलती हुई दूसरी तरफ जा पहुँचती है। प्रेमा मन में सोच रही थी — मानो, यह देह माता-पिता की है; किन्तु आत्मा तो मेरी है। मेरी आत्मा को जो कुछ भुगतना पड़ेगा, वह इसी देह से तो भुगतना पड़ेगा। अब वह इस विषय में संकोच करना अनुचित ही नहीं, घातक समझ रही थी। अपने जीवन को क्यों एक झूठे सम्मान पर बलिदान करे उसने सोचा विवाह का आधार अगर प्रेम न हो, तो वह देह का विक्रय है। आत्म-समर्पण क्या बिना प्रेम के भी हो सकता है” 

देह भले माता-पिता की दी हो, आत्मा पर उनका या किसी का अधिकार नहीं हो सकता और प्रेमविहीन विवाह में आत्माओं का मेल नहीं है। प्रेमचंद की कहानियों में प्रायः पति-पत्नी के बीच विचारों का संघर्ष दिखलाई पड़ता है। 

और इस वाक्य पर क्या आप कभी अटके हैं जो ‘बेटी का धन’ कहानी का आरंभ है,

“बेतवा नदी दो कगारों के बीच इस तरह मुँह छिपाए हुई थी, जैसे निर्मल हृदयों में साहस और उत्साह की मध्यम ज्योति छिपी रहती है।”

और आगे इसी कहानी में ‘लेखा जौ-जौ बखशीश सौ सौ’ के सिद्धांत पर चलनेवाले झगडू साहू अपने धर्म सिद्धांत के कारण यह देख विचलित हो उठते हैं कि चौधरी को अपनी बेटी का धन गिरवी रखना पड़ रहा है। प्रश्न सिर्फ अपने धर्म की रक्षा का नहीं है। समाज मात्र में अगर धर्म से कोई च्युत हो रहा हो तो उसे रोकना अपने धर्म की रक्षा जैसा ही कर्तव्य है।

 “उनके धर्मशास्त्र में कन्या के गाँव के कुएँ का पानी पीने से प्यासा मर जाना अच्छा था। वह स्वयं इस सिद्धांत के भक्त थे और इस सिद्धांत के अन्य पक्ष-पाती उनके लिए महामान्य देवता थे। वे पिघल गए; मन में सोचा, यह मनुष्य तो कभी ओछे विचारों को मन में नहीं लाया। निर्दय काल की ठोकर से अधर्म मार्ग पर उतर आया है, तो उसके धर्म की रक्षा करना हमारा कर्तव्य, धर्म है।”

अपना धर्म दूसरे को अधर्म की राह से बचा लेना भी है। इस प्रसंग में झगडू साहू के सिद्धांत के सही या गलत होने पर बहस नहीं है। प्रश्न जिसे वह धर्म समझता है, उसके समाज में बने रहने के लिए स्वार्थ त्याग का है।

न्याय के पथ को पहचान लेने और उसपर चल पड़ने के संकल्प के बाद हम पूरी तरह बदल जाते हैं और वह भी कैसे ‘जुलूस’ कहानी में पुलिस जुलूस पर लाठी चलाती है। जुलूस के नेता इब्राहिम पर भी लाठी पड़ती है और वे गिर पड़ते है। यह खबर फैलते ही 

“वह लोग, जो दस मिनट पहले तमाशा देख रहे थे इधर-उधर से दौड़ पड़े और हज़ारों आदमियों का एक विराट दल घटनास्थल की ओर चला। यह उन्मत्त, हिंसामद से भरे हुए मनुष्यों का समूह था, जिसे सिद्धांत और आदर्श की परवाह न थी। जो मरने के लिए ही नहीं, मारने के लिए भी तैयार थे। कितनों ही के हाथों में लाठियाँ थीं, कितने ही जेबों में पत्थर भरे हुए थे। न कोई किसी से कुछ बोलता था, न पूछता था। बस, सब-के-सब मन में एक दृढ़ संकल्प किये लपके चले जा रहे थे, मानो कोई घटा उमड़ी चली आती हो।”

उन्मत्त हिंसामद से भरी भीड़ का सिद्धांत और आदर्श से कोई लेना-देना नहीं होता और यह भीड़ किसी नेता के लिए गर्व का नहीं चिंता का विषय होना चाहिए। इसलिए इस विशाल भीड़ की खबर सुनकर इब्राहिम चिंतित हो उठते हैं। यह बेकाबू हो सकती है और। इस समय नेतृत्व का क्या दायित्व है इब्राहिम उसी झंडे को वापस फिरा देने को कहते हैं जिसे लेकर आगे बढ़ने के कारण उनपर वार हुआ था:

“इशारे की देर थी। संगठित सेना की भाँति लोग हुक्म पाते ही पीछे फिर गये। झंडियों के बाँसों, साफों और रूमालों से चटपट एक स्ट्रेचर तैयार हो गया। इब्राहिम को लोगों ने उस पर लिटा दिया और पीछे फिरे। मगर क्या वह परास्त हो गये थे अगर कुछ लोगों को उन्हें परास्त मानने में ही संतोष हो तो हो, लेकिन वास्तव में उन्होंने एक युगांतकारी विजय प्राप्त की थी। वे जानते थे, हमारा संघर्ष अपने ही भाइयों से है, जिनके हित परिस्थितियों के कारण हमारे हितों से भिन्न हैं। हमें उनसे वैर नहीं करना है। फिर, वह यह भी नहीं चाहते कि शहर में लूट और दंगे का बाजार गर्म हो जाय और हमारे धर्मयुद्ध का अंत लूटी हुई दूकानें, फूटे हुए सिर हों, उनकी विजय का सबसे उज्ज्वल चिह्न यह था कि उन्होंने जनता की सहानुभूति प्राप्त कर ली थी। वही लोग, जो पहले उन पर हँसते थे; उनका धैर्य और साहस देखकर उनकी सहायता के लिए निकल पड़े थे। मनोवृत्ति का यह परिवर्तन ही हमारी असली विजय है। हमें किसी से लड़ाई करने की जरूरत नहीं, हमारा उद्देश्य केवल जनता की सहानुभूति प्राप्त करना है, उसकी मनोवृत्तियों को बदल देना है। जिस दिन हम इस लक्ष्य पर पहुँच जायेंगे, उसी दिन स्वराज्य सूर्य उदय होगा।” 

गाँधी ने सुभाष बाबू के बारे में कहा था कि उनकी वीरता में कोई संदेह नहीं। उन्होंने जनजागरण का कठिन मार्ग नहीं चुना। स्वराज बिना इस जन जागरण के सार्थक नहीं। वह स्वाधीन लोगों का राज होना चाहिए, अपनी प्रभुता के स्थापित हो जाने से संतुष्ट हो जाना भर धोखा है। जनता की सहानुभूति प्राप्त कर उसकी मनोवृत्तियों को बदलना ही स्वराज प्राप्त करना है। वे मनोवृत्तियाँ कौन हैं जिन्हें बदला जाना है जैसे गाँधी का आंदोलन भारत की जनता को उसकी क्षुद्र और हिंसक मनोवृत्तियों से सजग करने का अभियान था, वैसे ही प्रेमचंद का साहित्य जनता को उसकी उन मनोवृत्तियों का बोध देने का अभियान है जो पराधीनता को स्वाभाविक अवस्था में बदल देती हैं।

इस वार से इब्राहिम की जान चली जाती है। उनके जनाजे के जुलूस को नियंत्रित करने का जिम्मा भी उनपर लाठी चलानेवाले पुलिस अधिकारी बीरबल का है। इस शांत जुलूस को देखते हुए बीरबल के मन में पछतावे का भाव पैदा होता है। 

“जुलूस शहर की मुख्य सड़कों से गुजरता हुआ चला जा रहा था। दोनों ओर छतों पर, छज्जों पर, जँगलों पर, वृक्षों पर दर्शकों की दीवारें-सी खड़ी थीं। बीरबल सिंह को आज उनके चेहरों पर एक नयी स्फूर्ति, एक नया उत्साह, एक नया गर्व झलकता हुआ मालूम होता था। स्फूर्ति थी वृक्षों के चेहरे पर, उत्साह युवकों के और गर्व रमणियों के। यह स्वराज्य के पथ पर चलने का उल्लास था। अब उनको यात्रा का लक्ष्य अज्ञात न था, पथभ्रष्टों की भाँति इधर-उधर भटकना न था, दलितों की भाँति सिर झुका कर रोना न था। स्वाधीनता का सुनहला शिखर सुदूर आकाश में चमक रहा था। ऐसा जान पड़ता था कि लोगों को बीच के नालों और जंगलों की परवाह नहीं है। सब उस सुनहले लक्ष्य पर पहुँचने के लिए उत्सुक हो रहे हैं।”

जो उन्होंने किया था, वह कर्तव्य न था:

“उनकी आत्मा इस समय स्वीकार कर रही थी कि उस निर्दय प्रहार में कर्त्तव्य के भाव का लेश भी न था - केवल स्वार्थ था, कारगुजारी दिखाने की हवस और अफसरों को खुश करने की लिप्सा थी।” 

उनके मातहत खुशामद करते हैं कि सरकार ने एक सरकश को सबक सिखला दिया। वे इस खुद इसका जवाब देते हैं, 

“बीरबल ने तीव्र भाव से कहा - चुप रहो! जानते भी हो, सरकश किसे कहते हैं सरकश वे कहलाते हैं, जो डाके मारते हैं, चोरी करते हैं, खून करते हैं। उन्हें सरकश नहीं कहते जो देश की भलाई के लिए अपनी जान हथेली पर लिये फिरते हों। हमारी बदनसीबी है कि जिनकी मदद करनी चाहिए उनका विरोध कर रहे हैं। यह घमंड करने और खुश होने की बात नहीं है, शर्म करने और रोने की बात है।”

‘आत्माराम’ में पिंजड़े से निकल भागे तोते के पीछे उसके मालिक महादेव की भाग दौड़ और दोनों की आँख मिचौनी:

“तोता कभी इस डाल पर जाता, कभी उस डाल पर। कभी पिंजड़े पर आ बैठता, कभी पिंजड़े के द्वार पर बैठ अपने दाना-पानी की प्यालियों को देखता, और फिर उड़ जाता। बुड्ढा अगर मूर्तिमान मोह था, तो तोता मूर्तिमयी माया। यहाँ तक कि शाम हो गयी। माया और मोह का यह संग्राम अंधकार में विलीन हो गया।”

‘मूर्तिमान मोह और मूर्तिमयी माया’, इसे काव्यात्मक क्यों कहें! यह गद्य का ही गुण क्यों न हो

और ‘वैर का अंत’ का यह वाक्य:

“युवावस्था आवेशमय होती है, क्रोध से आग हो जाती है तो करुणा से पानी भी हो जाती है।”

‘विस्मृति’ की ये सूक्तियाँ:

“जब कोई पुरुष अकारण मित्रता का व्यवहार करने लगे तो हमको सोचना चाहिए कि इसमें उसका कोई स्वार्थ तो नहीं छिपा है। यदि हम अपने सीधेपन से सी भ्रम में पड़ जाएँ कि कोई मनुष्य हमको केवल अनुगृहीत करने के लिए हमारी सहायता करने पर तत्पर है तो हमें धोखा खाना पड़ेगा। किन्तु अपने स्वार्थ की धुन में मोटी-मोटी बातें भी हमारी निगाहों से छिप जाती हैं और हमें छल अपने रँगे हुए भेष में आकर हमको सर्वदा के लिए परस्पर व्यवहार का उपदेश देता है।”

और

“घास और कास स्वयं उगते हैं। उखाड़ने से भी नहीं जाते। अच्छे पौधे देख-रेख से उगते हैं। इसी प्रकार बुरे समाचार स्वयं फैलते हैं, छिपाने से भी नहीं छिपते।”

या यह अंश 

“प्रकाश की धुँधली-सी झलक में कितनी आशा, कितना बल, कितना आश्वासन है, यह उस मनुष्य से पूछो जिसे अँधेरे ने एक घने वन में घेर लिया है। प्रकाश की वह प्रभा उसके लड़खड़ाते हुए पैरों को शीघ्रगामी बना देती है, उसके शिथिल शरीर में जान डाल देती है। जहाँ एक-एक पग रखना दुस्तर था, वहाँ इस जीवन-प्रकाश को देखते हुए यह मीलों और कोसों तक प्रेम की उमंगों से उछलता हुआ चला जाता है। परंतु दूजी के लिए आशा की यह प्रभा कहाँ थी वह भूखी-प्यासी, उन्माद की दशा में चली जाती थी।

शहर पीछे छूटा। बाग और खेत आये। खेतों में हरियाली थी, वाटिकाओं में वसन्त की छटा। मैदान और पर्वत मिले। मैदानों से बाँसुरी की सुरीली तानें आती थीं। पर्वतों के शिखर मोरों की झनकार से गूँज रहे थे।

दिन चढ़ने लगा। सूर्य उसकी ओर आता हुआ दिखाई पड़ा। कुछ काल तक उसके साथ रहा। कदाचित् रूठे को मनाता था। पुनः अपनी राह चला गया। वसंत ऋतु की शीतल, मंद, सुगन्धित वायु चलने लगी; खेतों ने कुहरे की चादरें ओढ़ लीं। रात हो गयी और दूजी एक पर्वत के किनारे झाड़ियों से उलझती, चट्टानों से टकराती चली जाती थी, मानो किसी झील की मंद-मंद लहरों में किनारे पर उगे हुए झाऊ के पौधों का साया थरथरा रहा हो। इस प्रकार अज्ञात की खोज में अकेली निर्भय वह गिरती-पड़ती चली जाती थी। यहाँ तक कि भूख-प्यास और अधिक श्रम के कारण उसकी शक्तियों ने जवाब दे दिया। वह एक शिला पर बैठ गयी और भयभीत दृष्टि से इधर-उधर देखने लगी। दाहिने-बायें घोर अंधकार था। उच्च पर्वतशिखाओं पर तारे जगमगा रहे थे। सामने एक टीला मार्ग रोके खड़ा था और समीप ही किसी जलधारा से दबी हुई सायँ-सायँ की आवाज सुनायी देती थी।”

घोर अंधकार के बीच तारों की जगमगाहट, एक ऊँचा टीला और जलधारा की दबी हुई आवाज़। प्रेमचंद की इसी बोलती हुई भाषा ने पीढ़ी दर पीढ़ी पाठकों का दिल जीता है। यह उपयोगितावादी भाषा नहीं है।

‘प्रारब्ध’ कहानी का अंतिम अंश:

“जैसे परती भूमि में बीज का असाधारण विकास और प्रसार होता है, उसी प्रकार विश्वासहीन हृदय में जब विश्वास का बीज पड़ता है तो उसमें सजीवता और विकास का प्रादुर्भाव होता है। उसमें विचार के बदले व्यवहार का प्राधान्य होता है। आत्म-समर्पण उसका विशेष लक्ष्य होता है।” 

‘लोकमत का सम्मान’ की यह उक्ति:

“निरंकुशता का तर्क से विरोध है।”

भारत का पुराना ग्रामीण दिमाग जो कथा को जीवन जीने का तरीका मानता है, प्रेमचंद का है। भारत ही क्यों, दुनिया के हर समाज ने कथा के सहारे अपनी नैतिकता की खोज की है या उसका निर्माण किया है। प्रेमचंद के लिए भी कहानी या कथा एक न्यायपूर्ण, दर्दमंद, सटीक, मानवीय शब्द की खोज है। वे पाठक को सहयात्री बनने का न्योता देते हैं। इस निमंत्रण को स्वीकार करना और प्रेमचंद का सच्चा पाठक बन पाना भी क्या सबके बस की बात है लेकिन प्रेमचंद की कहानियाँ हम सबको भरोसा दिलाती हैं कि हम वह हो सकते हैं। वह हमारे साथ हो सकता है, जिसकी कल्पना कभी मुक्तिबोध ने की थी,

“प्रेमचंदजी का कथा-साहित्य पढ़कर आज हम एक उदार और उदात्त नैतिकता की तलाश करने लगते हैं, चाहने लगते हैं कि प्रेमचंदजी के पात्रों के मानवीय गुण हममें समा जायें, हम उतने ही मानवीय हो जायें जितना कि प्रेमचंद चाहते हैं। प्रेमचंदजी का कथा-साहित्य हम पर एक बहुत बड़ा नैतिक प्रभाव डालता है। उनका कथा-साहित्य पढ़ते हुए उनके विशिष्ट उँचे पात्रों द्वारा हमारे अंत:करण में विकसित की गयी भावधाराएँ हमें न केवल समाजोन्मुख करती है, वरन् वे आत्मोन्मुख भी कर देती है। और अब प्रेमचंद हमें आत्मोन्मुख कर देते हैं, तब वे हमारी आत्म-केंद्रिता के दुर्ग को तोड़कर हमें एक अच्छा मानव बनाने में लग जाते हैं। प्रेमचंद समाज के चित्रणकर्त्ता ही नहीं, वरन् वे हमारी आत्मा के शिल्पी भी हैं।

माना कि हमारे साहित्य का टेकनीक बढ़ता चला जायेगा, माना कि हम अधिकाधिक सचेत और अधिकाधिक सूक्ष्म-बुद्धि होते जायेंगे, माना कि हमारा बुद्धिगत ज्ञान संवेदनाओं और भावनाओं को न केवल एक विशेष दिशा में मोड़ देगा, वरन् उनका अनुशासन-प्रशासन भी करेगा। किन्तु क्या यह सच नहीं है कि मानवीय सत्यों और तथ्यों को देखने की सहज भोली और निर्मल दृष्टि, ह्रदय का सहज सुकुमार आदर्शवाद, दिल को भीतर से हिला देने वाली कर्त्तव्योन्मुख प्रेरणा भी हमारे लिए उतनी ही कठिन और दुष्प्राप्य होती जायेगी

ओह! काश, हम भी भोली कली से खिल सकते! पराये दु:ख में रोकर उसे दूर करने की भोली सक्रियता पा सकते! शायद मैं विशेष मन:स्थिति में ही यह सब कह रहा हूँ। फिर भी मेरी यह कहने की इच्छा होती है कि समाज का विकास अनिवार्यत: मानवोचित नैतिक-हार्दिक विकास के साथ चलता जाता है, यह आवश्यक नहीं है। सभ्यता का विकास नैतिक विकास भी करता है, यह जरूरी नहीं है।”

आत्म और समाज के भेद पर बहस खत्म नहीं हुई है। मुक्तिबोध को लेकर भी आशंका थी कि क्या वे आत्मोन्मुख ही तो नहीं। प्रेमचंद मुक्तिबोध के लिए बड़े इसलिए हैं कि वे हमें सिर्फ़ समाजोन्मुख नहीं, आत्मोन्मुख भी करते हैं। उसके बिना सभ्यता और नैतिकता की सहयात्रा संभव नहीं। याद कीजिए कि प्रेमचंद ने भी कहा था कि मानव सभ्यता की यात्रा मनुष्य को ख़ुद को समझने की, शक्ति अर्जित करने की यात्रा है। मुक्तिबोध एक जटिल प्रत्यय गढ़ते हैं: ‘मानवोचित नैतिक-हार्दिक विकास।’ लेकिन वह इतना भी जटिल नहीं: ‘पराए दुःख में रोकर उसे दूर करने की भोली सक्रियता’ ही तो हासिल करनी है। वह भोली सक्रियता ही हमें नैतिक भी बनाती है। प्रेमचंद की कहानियों के ज़रिए इस भोली सक्रियता हम हासिल कर सकते हैं। शर्त है कि हम भाषोन्मुख भी हों।