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कर्नाटक ने कुत्सित सांप्रदायिकता और छद्म राष्ट्रवाद का दिया जवाब

कर्नाटक ने कुत्सित सांप्रदायिकता और छद्म राष्ट्रवाद का दिया जवाब

कर्नाटक के चुनाव नतीजे उस दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा को भी जवाब है, जिसे कृत्रिम माहौल बनाकर देश पर जबरन थोपने की कोशिश की जा रही है। कर्नाटक के चुनाव नतीजों पर पढ़िए प्रियदर्शन का नजरियाः

कर्नाटक की चुनावी सभाओं में प्रधानमंत्री आख़िरी कुछ दिन जिस तरह ‘जय बजरंग बली’ के नारे लगा कर अपने भाषण की शुरुआत करते थे, वह कई मायनों में अश्लील भी था और असंवैधानिक भी। बजरंग दल पर प्रतिबंध की कांग्रेस की घोषणा के बाद कर्नाटक में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बिल्कुल चरम पर ले जाने की यह कुत्सित कोशिश सीधे प्रधानमंत्री के स्तर पर हो रही थी, यह बात कुछ और डरावनी थी। प्रधानमंत्री यहां तक कहते रहे कि लोग वोट देने जाएं तो बजरंग बली का नारा लगाकर वोट दें। सिर्फ़ कल्पना की जा सकती है कि अगर किसी दूसरे राजनीतिक दल या नेता नेअपने चुनावी भाषणों की शुरुआत ‘अल्लाह हो अकबर’ के नारे से की होती और लोगों को वोट देने के बाद यह नारा लगाने को कहा होता तो बहुसंख्यक जमात की प्रतिक्रिया क्या होती। इसे लोकतंत्र और देश के लिए ख़तरनाक बताया जाता। मगर कर्नाटक में किसी अदालत, किसी चुनाव आयोग को प्रधानमंत्री के भाषण में कुछ भी आपत्तिजनक नज़र नहीं आया, किसी संवैधानिक भावना का, आचार संहिता के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं दिखा। राहत की बात है कि कर्नाटक के लोगों ने प्रधानमंत्री का यह सुझाव ठुकरा दिया। बजरंग बली और बजरंग दल को एक करने की तजबीज उन्हें पसंद नहीं आई।

ध्यान से देखें तो कर्नाटक के पूरे चुनाव को विकास, कल्याणकारी योजनाओं और डबल इंजन के पिटे हुए मुहावरे के सहारे से प्रभावित करने के अलावा बीजेपी ने सांप्रदायिक आधार पर भी बांटने की कोशिश में कोई कसर नहीं छोड़ी। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में ‘केरल स्टोरी’ जैसी फिल्म का उल्लेख कर यह साबित करने की कोशिश की कि कांग्रेस आतंकवादियों के साथ है। इसी तरह उन्होंने कांग्रेस द्वारा ‘संप्रभुता’ शब्द के इस्तेमाल पर यह साबित करना चाहा कि वह कर्नाटक को देश से अलग करना चाहती है। कर्नाटक और महाराष्ट्र के विवाद में ‘संप्रभुता’ शब्द का इस्तेमालअधिकतम ग़लत शब्द-चयन का उदाहरण भर हो सकता है, लेकिन इससे यह नतीजा निकालना लगभग हास्यास्पद था कि कांग्रेस कर्नाटक को अलग देश बनाने की बात कर रही है।

ध्यान से देखें तो दरअसल प्रधानमंत्री भाषण कर्नाटक में दे रहे थे, मगर सुना पूरे देश को रहे थे। उनके भाषण को बिल्कुल मनोयोग से घंटे भर दिखाने वाले टीवी चैनल इस काम में उनका सहयोग कर रहे थे। वस्तुतः कुत्सित सांप्रदायिकता और छद्म राष्ट्रवाद के जिस गठजोड़ पर दक्षिणपंथ की पूरी राजनीति परवान चढ़ी है, उसे अगले चुनाव तक बचाए रखने का काम बीजेपी के तमाम नेता निष्ठापूर्वक करते हैं और फिर अगले चुनाव की तैयारी में लग जाते हैं।

इस लिहाजसे यह राहत की बात है कि कर्नाटक की जनता ने इस बार ज़हर का यह प्याला नकार दिया। लेकिन क्यों नकार दिया? क्या वह कुछ ज़्यादा समझदार हो गई? या कांग्रेस ने कर्नाटक की जातीय गोलबंदी बीजेपी के मुक़ाबले कहीं बेहतर ढंग से साधने में कामयाबी हासिल की? या फिर कर्नाटक के ठोस स्थानीय मुद्दे बीजेपी कीराष्ट्रीय और भावुक अपीलों पर भारी पड़े? कर्नाटक में व्यापक भ्रष्टाचार इन चुनावों में एक बड़ा मुद्दा रहा। अक्सर इस मुद्दे का इस्तेमाल बीजेपी अपने पक्ष में करती है, लेकिन कर्नाटक के लोगों के अनुभव ने बताया कि यह भ्रष्टाचार उन पर भारी पड़ रहा है।

बहरहाल, किन्हीं चुनावी नतीजों की व्याख्या आसान नहीं होती। यह सरलीकरण भी उचित नहीं कि एक चुनाव का नतीजा दूसरे चुनाव को प्रभावित करता है। बीते कुछ वर्षों में- शायद टीवी पत्रकारिता के असर में- तमाम विधानसभा चुनावों को लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल बताने का चलन चल पड़ा है। हालांकि दिलचस्प ये है कि चुनावी नतीजों का इतिहास इसकी पुष्टि नहीं करता। विधानसभा चुनाव जीतने वाले दल कई बार लोकसभा चुनाव में पिट जाते हैं। इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण 2004 में दिखा, जब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद वाजपेयी सरकार ने समय से पहले लोकसभा चुनाव करा दिए। उन चुनावों में अपराजेय लगने वाली अटल-आडवाणी की जोड़ी हार गई। तो यह नतीजा निकाल लेना उचित नहीं होगा कि कर्नाटक के चुनावी नतीजे 2024 की ओर इशारा कर रहे हैं।

मगर हर चुनाव फिर भी कुछ कहता है। कर्नाटक के चुनावी नतीजों का भी अपना पैगाम है। सबसे पहला और बड़ा पैग़ाम यही है कि सांप्रदायिकता और छद्म राष्ट्रवाद की राजनीति अपरिहार्यतः जीत की गारंटी नहीं है। लोगों के लिए उनके ठोस मुद्दे, उनकी ज़रूरतें,उनके सामाजिक-सांस्कृतिक रोजमर्रा के जीवन का अमन-चैन भी महत्वपूर्ण हैं। इस लिहाज से नक़ली और विभाजनकारी मुद्दों की अति कई बार भारी पड़ सकती है।

दूसरी बात यह कि भारत जैसे देश में सामाजिक समीकरणों का अपना महत्व है- बस इसलिए नहीं कि उनसे वोट मिलते हैं, बल्कि इसलिए भी कि उनकी समरसता, उनकी समृद्धि, लोकतंत्र में उनकी साझेदारी एक देश के रूप में हमारी मज़बूती की अनिवार्य शर्त है। तो जो दल 2024 में बीजेपी को चुनौती देना चाहते हैं, उन्हें इस बात पर नजर रखनी होगी कि बहुसंख्यकवाद के इस राजनीतिक उफान में वे कौन से सामाजिक समूह हैं जो ख़ुद को हाशिए पर पा रहे हैं, जिन्हें अपने साथ लगातार अन्याय और छल होता नज़र आ रहा है और जो लगातार उपेक्षित ही नहीं, एक तरह के अलगाव के शिकार भी महसूस कर रहे हैं। उनके मुद्दों को संबोधित करते हुए, उनके असुरक्षा बोध को कम करते हुए, उनको लोकतंत्र में बराबर का साझेदार मानते और बताते हुए जो राजनीतिक गोलबंदी होगी, वह कहीं ज़्यादा सार्थक और प्रभावी होगी। उन्हें यह महसूस होना चाहिए कि इस देश में उनके मुद्दे उठाने वाले, उनकी लड़ाई लड़ने वाले लोग और दल बचे हुए हैं। 

कर्नाटक का एक सबक दरअसल यह भी है। जब कांग्रेस के घोषणापत्र में पीएफ़आई की तरह बजरंग दलपर भी प्रतिबंध की बात आई तो इसे सबने कांग्रेस का आत्मघाती क़दम- ‘सेल्फ़ गोल’- माना। कांग्रेस के नेता भी इस घोषणा से छिटकते नज़र आए। उनकी सामान्य समझ यह बताती रही कि इससे बहुसंख्यक तबका बिदक जाएगा। बीजेपी ने भी इसी के बादबजरंग बली और बजरंग दल को एक करना शुरू किया। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यहां तक कह दिया कि कांग्रेस की मति मारी गई है।

लेकिन शायद किसी ने यह समझने की कोशिश नहीं की कि इस एक घोषणा ने बजरंग दल या ऐसे ही उग्र हिंदूवादी संगठनों से त्रस्त अल्पसंख्यक जमातों को कितनी बड़ी राहत और तसल्ली दी। बजरंग दल पर प्रतिबंध लगेगा या नहीं, यह दूर की बात है, पहली बात तो यही है कि एक दल सार्वजनिक तौर पर यह मानता है कि ऐसे संगठन प्रतिबंध के लायक हैं। तरह-तरह की चोट से घायल उनके दिलों के लिए यह संदेश एक मरहम की तरह आया। शायद इसी के साथ कांग्रेस और जेडीएस के बीच चुनाव के असमंजस में फंसे अल्पसंख्यक वोटर को अपने वोट तय करने का निर्णायक कारण मिल गया। वैसे इसका एक मतलब यह भी है कि बहुसंख्यकवाद के दबाव में भारतीय राजनीति और पत्रकारिता अब बाक़ी समुदायों का मन पढ़ने का अभ्यास भी भुला बैठी है- वरना वह बजरंग दल पर पाबंदी की बात को सेल्फ़ गोल नहीं कहती। 

कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के और भी कारण रहे होंगे- पहली बार एक दलित अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में चुनाव लड़े गए जो खुद कर्नाटक का है, मल्लिकार्जुन खड़गे ने ख़ामोशी और मेहनत के साथ सभी सामाजिक तबकों को साधने में कामयाबी हासिल की, बीजेपी के आपसी टकरावों ने उसका जनाधार बिगाड़ा आदि-आदि।

लेकिन जो सबसे बड़ी राहत इन चुनावों से निकल कर आई है, वह यही संदेश है कि उग्र सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और नकली देशप्रेम के नाम पर हमेशा चुनाव जीते नहीं जा सकते। आने वाले दिनों में क्या होगा- कांग्रेस किसी अंदरूनी संघर्ष की शिकार तो नहीं हो जाएगी, लोकसभा चुनाव के समय बहुत सारे वोटर प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर दूसरी तरफ़ मुड़ तो नहीं जाएंगे- यह सब भविष्य की बातें है, तात्कालिक सच यही है कि कर्नाटक में ठोस स्थानीय मुद्दों की जीत हुई है- छद्म देशप्रेम और ज़हरीली सांप्रदायिकता की हार हुई है। 

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