डोनाल्ड ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत लगाए गए टैरिफ ने ग्लोबल कारोबार संतुलन को हिला कर रख दिया है। अमेरिका द्वारा कई देशों पर लगाए गए भारी आयात शुल्क से यूरोप, चीन, कनाडा, और भारत समेत तमाम देश प्रभावित हुए हैं। भारत की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत नरम रही है, जिससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप के आगे सरेंडर कर दिया है?
ट्रंप प्रशासन ने चीन, यूरोपीय संघ, कनाडा और भारत सहित कई देशों पर भारी शुल्क लगाए। इनमें स्टील और एल्युमिनियम पर उच्च दरें शामिल थीं। चीन ने तत्काल जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ा दिए, जबकि यूरोपीय संघ और कनाडा ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 2 अप्रैल 2025 को व्हाइट हाउस के रोज़ गार्डन में एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए भारत सहित कई देशों पर रेसीप्रोकल टैरिफ की घोषणा की। भारत पर 26% का "रेसीप्रोकल टैरिफ" लगाया गया है, जो 5 अप्रैल से सभी आयात पर 10% और 10 अप्रैल से अतिरिक्त 16% के रूप में लागू होगा। इस कदम को ट्रम्प ने "लिबरेशन डे" करार दिया और कहा कि यह अमेरिकी उद्योग को पुनर्जनन देगा।
भारत के वाणिज्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस टैरिफ को "मिश्रित प्रभाव" (mixed bag) वाला करार दिया और इसे भारत के लिए "झटका" (setback) नहीं माना। अधिकारी ने कहा- "एक मिलाजुला प्रभाव हमारी आर्थिक स्थित पर पड़ेगा। लेकिन यह भारत के लिए झटका नहीं है।" मंत्रालय इस टैरिफ के प्रभाव का विश्लेषण कर रहा है और संभावित प्रतिक्रियाओं पर विचार कर रहा है।
अधिकारी ने कहा कि भारत और अमेरिका एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर बातचीत कर रहे हैं, जिसका पहला चरण सितंबर-अक्टूबर 2025 तक पूरा करने का लक्ष्य है। यदि भारत अमेरिका की व्यापारिक चिंताओं को संबोधित करता है, तो टैरिफ में कमी की संभावना है।
अधिकारी ने बताया कि भारत को कुछ क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है। एक अधिकारी ने बताया कि 26% प्रभावी टैरिफ के बावजूद, भारत को चीन (54-79% टैरिफ की तुलना में) और वियतनाम, बांग्लादेश जैसे देशों पर श्रम-आधारित क्षेत्रों (जैसे टेक्सटाइल) में बढ़त मिल सकती है।
- शुरुआती आकलन के अनुसार, भारत के ऑटो कंपोनेंट्स, रसायन, झींगा, और स्टील क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होंगे।
भारत और अमेरिका ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 190 बिलियन डॉलर से बढ़ाकर 500 बिलियन डॉलर करने का लक्ष्य रखा है।
ट्रंप ने भारत पर टैरिफ लगाने की घोषणा काफी पहले की थी। जवाब में भारत ने इस पर हल्का विरोध जताया, लेकिन न तो कड़े आर्थिक कदम उठाए और न ही अमेरिका को प्रत्यक्ष रूप से चुनौती दी। भारत ने कुछ अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाने की योजना बनाई थी, लेकिन उसे बार-बार टाला गया। प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की मुलाकातों के दौरान भारत ने कूटनीतिक रुख अपनाया और टकराव से बचने की कोशिश की।
क्या पीएम मोदी ने ट्रंप के आगे सरेंडर कर दियाः इस सवाल का जवाब सीधा नहीं है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत ने अमेरिका के दबाव में आकर अपना व्यापारिक रुख नरम किया। GSP लाभ खत्म होने और टैरिफ बढ़ाए जाने के बावजूद भारत ने बड़े आर्थिक प्रतिरोध की जगह बातचीत का रास्ता अपनाया। हालांकि फरवरी में पीएम मोदी जब ट्रंप से मिलने यूएस गए थे तो इस संबंध में दो टूक बात कर सकते थे। ट्रंप ने उनके सामने ही बार-बार अपने टैरिफ का जिक्र किया था। लेकिन मोदी ने अमेरिका में रहते हुए न तो ट्रंप से दो टूक बात की और न ही वहां कोई ऐसा बयान दिया जिससे लगता कि भारत आसानी से झुकना स्वीकार नहीं करेगा।
मोदी की मजबूरियां
- भारत के कई बड़े उद्योगपतियों से संबंधित तमाम मुद्दे अमेरिका के साथ हैं। अमेरिका भारत के लिए एक बड़ा निर्यात बाजार है, और भारत व्यापारिक विवाद को बढ़ाकर अपने आर्थिक हितों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता।
- राजनीतिक समीकरण ने भी मोदी को ट्रंप के आगे झुकने को मजबूर किया है मोदी सरकार अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध बनाए रखना चाहती है। ताकि भारत के विपक्षी दलों को यह संदेश न जाए कि ट्रंप अब मोदी और भारत की परवाह नहीं कर रहे हैं।
- अर्थव्यवस्था की स्थिति के लिए भी भारत के लिए अमेरिकी बाजार का खोना आर्थिक रूप से नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए भारत ने ऐसी नीति अपनाई।
ट्रंप के टैरिफ कदम की कई देशों ने आलोचना की है और जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। यहाँ कुछ प्रमुख देशों की प्रतिक्रियाएँ हैं:
चीन: चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने टैरिफ को "एकतरफा धमकी" करार देते हुए तत्काल रद्द करने की मांग की। मंत्रालय ने कहा, "यह वैश्विक आर्थिक विकास को खतरे में डालता है और अमेरिकी हितों व अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं को नुकसान पहुँचाएगा।" चीन ने "बराबरी के संवाद" के माध्यम से मतभेद सुलझाने की अपील की और चेतावनी दी कि "ट्रेड वॉर में कोई विजेता नहीं होता।"
यूरोपीय संघ (EU): यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा कि ट्रंप का कदम विश्व अर्थव्यवस्था के लिए "बड़ा झटका" है। EU ने बातचीत विफल होने पर जवाबी उपायों की तैयारी शुरू कर दी है।
ऑस्ट्रेलिया: ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ ने कहा, "अमेरिका का यह कदम मित्र देश का व्यवहार नहीं है।" हालांकि, उन्होंने अमेरिका के खिलाफ जवाबी टैरिफ लगाने से इनकार कर दिया।
दक्षिण कोरिया: दक्षिण कोरिया के कार्यवाहक राष्ट्रपति हान डक-सू ने टैरिफ से प्रभावित व्यवसायों (विशेष रूप से ऑटोमोबाइल क्षेत्र) के लिए आपातकालीन सहायता उपायों का आदेश दिया। उन्होंने अमेरिका के साथ बातचीत कर प्रभाव को कम करने की बात कही।
कनाडा: कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा कि कनाडा ट्रंप के टैरिफ का जवाबी उपायों के साथ "लड़ेगा"। कनाडा ने गुरुवार को अपनी प्रतिक्रिया देने की योजना बनाई। यानी भारत में इसकी जानकारी गुरुवार देर रात या शुक्रवार को मिलेगी।
मेक्सिको: मैक्सिकन राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम ने कहा कि वह गुरुवार तक टैरिफ के प्रभाव का आकलन करेंगी। उन्होंने कहा, "यह सवाल नहीं है कि आप मुझ पर टैरिफ लगाएँ, तो मैं आप पर टैरिफ लगाऊँ। हमारी प्राथमिकता अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है।"
न्यूज़ीलैंड: न्यूज़ीलैंड के व्यापार मंत्री टॉड मैकक्ले ने ट्रम्प के दावे को चुनौती दी कि न्यूज़ीलैंड 20% टैरिफ लगाता है। उन्होंने कहा कि वास्तविक दर 10% से कम है और जवाबी कार्रवाई से इनकार किया, क्योंकि इससे न्यूज़ीलैंड के उपभोक्ताओं पर कीमतें बढ़ेंगी।
नॉर्वे: नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोरे ने कहा कि वे अमेरिका के साथ टैरिफ को लेकर बातचीत करेंगे।
बहरहाल, ट्रंप ने अपनी घोषणा में भारत पर निशाना साधते हुए कहा, "भारत बहुत सख्त है। प्रधानमंत्री मेरे अच्छे दोस्त हैं, लेकिन मैंने उनसे कहा, 'आप मेरे दोस्त हैं, लेकिन आप हमारे साथ सही व्यवहार नहीं कर रहे। वे हमसे 52% वसूलते हैं।'" ट्रम्प ने इसे "लिबरेशन डे" करार देते हुए कहा, "2 अप्रैल 2025 को हमेशा उस दिन के रूप में याद किया जाएगा जब अमेरिकी उद्योग का पुनर्जन्म हुआ और हमने अमेरिका को फिर से समृद्ध बनाना शुरू किया।"
विश्व भर के देशों ने ट्रंप के कदम की आलोचना की है। इससे ग्लोबल ट्रेड में तनाव बढ़ सकता है। चीन की धमकी स्पष्ट है। आशंका है कि चीन की ओर से ही अमेरिका के खिलाफ पहल होगी। चीन पूरी दुनिया में एक मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश है। उसकी आबादी भी सबसे ज्यादा है। अपनी आर्थिक स्थिति को बनाए रखने के लिए चीन कुछ न कुछ जवाब तो जरूर देगा। यूरोपियन यूनियन के देश अभी भी पसोपेश में हैं। उनकी एकजुटता भी अमेरिका के लिए तमाम बाधाएं पैदा कर सकती है। यूएस के ठीक पड़ोसी देश कनाडा की प्रतिक्रिया भी सकारात्मक नहीं है। चीन के बाद कनाडा ज्यादा मुखर विरोध कर रहा है।
रिपोर्ट और संपादनः यूसुफ किरमानी