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‘एम्पुरान’ के निर्माता पर ईडी की कार्रवाई अभी क्यों, क्या गुजरात दंगे का जिक्र गुनाह

‘एम्पुरान’ के निर्माता पर ईडी की कार्रवाई अभी क्यों, क्या गुजरात दंगे का जिक्र गुनाह

दक्षिण भारत की सुपरहिट फिल्म एल 2 एम्पुराण के निर्माता पर ईडी के छापे डाले गए हैं। इस फिल्म में गुजरात दंगों को पेश करने पर पहले से ही आपत्तियां जताई जा रही थीं। अब ईडी की कार्रवाई सामने आ गई। उनका सवाल है कि फिल्म के निर्माता के खिलाफ ईडी की कार्रवाई अब क्यों।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने हाल ही में रिलीज हुई मलयालम ब्लॉकबस्टर एल2: एम्पुरान के निर्माता और प्रमुख व्यवसायी गोकुलम गोपालन के कार्यालयों और आवासों पर बड़े पैमाने पर छापेमारी शुरू की है। 4 अप्रैल को शुरू हुई और 5 अप्रैल को समाप्त हुई। यह छापेमारी तमिलनाडु और केरल के कई स्थानों पर की गई, जिसमें चेन्नई के कोडंबक्कम स्थित गोपालन का कार्यालय और कोझिकोड की उनकी संपत्तियाँ शामिल हैं। ईडी ने 1.5 करोड़ रुपये नकद और आपत्तिजनक दस्तावेज जब्त किए, जिसमें विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। जिसमें 1,000 करोड़ रुपये से अधिक के लेनदेन शामिल हैं। लेकिन इन छापों ने एक बड़ा सवाल उठाया है: अगर गोपालन वित्तीय गड़बड़ी में शामिल थे, तो ईडी अब तक क्यों चुप थी? ये छापे अभी क्यों, क्या इसका संबंध फिल्म में गुजरात दंगों की सच्चाई बताने से है।

ये छापे एल2: एम्पुरान की 27 मार्च को रिलीज के ठीक बाद हुई है। यह फिल्म 2002 के गुजरात दंगों के चित्रण और दक्षिणपंथी राजनीति की आलोचना के लिए चर्चा में है। पृथ्वीराज सुकुमारन द्वारा निर्देशित और प्रसिद्ध एक्टर मोहनलाल अभिनीत इस फिल्म के खिलाफ संघ परिवार समूहों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। इसके बाद फिल्म निर्माताओं को 24 कट लगाने पड़े। 

विपक्षी दलों का कहना है कि ईडी की कार्रवाई का समय—फिल्म रिलीज के दो सप्ताह से भी कम समय बाद—इसके राजनीतिक रूप से संवेदनशील कंटेंट से जुड़ा है। हालांकि, ईडी ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि गोपालन और उनकी श्री गोकुलम चिट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड 2023 से फेमा उल्लंघन और वित्तीय कदाचार के आरोपों के लिए जांच के दायरे में हैं।

केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) और संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) दोनों ने छापेमारी को “सस्ता हथकंडा” करार देते हुए इसकी आलोचना की है, जिसका उद्देश्य सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को दबाना है। एलडीएफ संयोजक टी.पी. रामकृष्णन ने मदुरै से कहा कि यह केरल के कलात्मक क्षेत्र में “जबरन हस्तक्षेप” है, जबकि विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन ने टिप्पणी की, “सबको पता है कि छापेमारी इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने एम्पुरान का निर्माण किया।” इन आरोपों ने यह अटकलें तेज कर दी हैं कि ईडी की कार्रवाई प्रतिशोधात्मक हो सकती है।

गोकुलम गोपालन, जो दक्षिण भारत के व्यापार और मनोरंजन क्षेत्र में एक प्रभावशाली व्यक्तित्व हैं, से कोझिकोड और चेन्नई में ईडी अधिकारियों ने पूछताछ की, और जब्त दस्तावेजों के विश्लेषण के बाद आगे की पूछताछ की उम्मीद है। उनकी कंपनी, श्री गोकुलम चिट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड, जो 1968 में स्थापित हुई थी, हजारों ग्राहकों के लिए वित्तीय मददगार रही है, लेकिन इसके संचालन समय-समय पर जांच के दायरे में आए हैं। उदाहरण के लिए, 2017 की आयकर छापेमारी ने संभावित टैक्स चोरी के बारे में चेतावनी दी थी, लेकिन अब तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई थी।

तमाम लोग एम्पुरान के निर्माता पर छापे को रचनात्मक स्वतंत्रता पर हमला मानते हैं। उनका सवाल है कि सालों से गलत काम का संदेह था, तो एजेंसी को अब तक कौन रोक रहा था? गुजरात दंगों का जिक्र भी इस फिल्म में संयमित ढंग से है। इसके बावजूद बीजेपी और आरएसएस के लोग मुखर हैं।

भारत में हाल के वर्षों में ईडी की कार्रवाइयों को लेकर यह आरोप तेजी से सामने आया है कि इसका उपयोग मोदी सरकार के खिलाफ बोलने वाले लोगों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। विपक्षी नेता और कई राजनीतिक विश्लेषक दावा करते हैं कि ईडी, जो मूल रूप से आर्थिक अपराधों और मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के लिए बनाई गई थी, अब एक राजनीतिक हथियार बन गई है। इसका उदाहरण कई हाई-प्रोफाइल मामलों में देखा जा सकता है, जैसे कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी (आप) के नेताओं पर कथित शराब नीति घोटाले में छापेमारी और गिरफ्तारियाँ। इसी तरह, महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के नेताओं और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की ममता बनर्जी सरकार के मंत्रियों पर भी ईडी की कार्रवाई हुई है, जो सरकार की नीतियों की मुखर आलोचना करते रहे हैं। इन मामलों में यह संयोग नहीं माना जाता कि ये नेता केंद्र सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने के बाद ही जांच के दायरे में आए।

इसके अलावा, ईडी की कार्रवाइयों का समय भी सवालों के घेरे में है। उदाहरण के लिए, जब कोई विपक्षी नेता चुनाव से पहले या किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन के दौरान सरकार की आलोचना करता है, तो अक्सर उसके खिलाफ ईडी की जांच शुरू हो जाती है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर कथित भूमि घोटाले में कार्रवाई और उनकी गिरफ्तारी को विपक्ष ने “राजनीतिक प्रतिशोध” करार दिया। खासकर जब वह आदिवासी अधिकारों और केंद्र की नीतियों के खिलाफ बोल रहे थे। 

दूसरी ओर, बीजेपी के सहयोगी दलों या सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल नेताओं के खिलाफ ऐसी कार्रवाइयाँ शायद ही देखने को मिलती हैं, भले ही उन पर भी भ्रष्टाचार के आरोप हों। यह असंतुलन विपक्ष के उस दावे को मजबूती देता है कि ईडी का दुरुपयोग न केवल असहमति को दबाने के लिए, बल्कि विपक्षी दलों को कमजोर करने और उनकी छवि खराब करने के लिए एक सुनियोजित रणनीति के तहत किया जा रहा है।

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