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होली सड़क पर लेकिन नमाज…?

होली सड़क पर लेकिन नमाज…?

क्या होली जैसे पर्व सड़क पर मनाना ठीक है? यदि ऐसा है तो नमाज़ को लेकर सवाल क्यों उठते हैं?

खुमार बाराबंकवी का एक मशहूर शेर है : 

दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिए।

सामने आईना रख लिया कीजिए।।

प्रजातंत्र, जनता का शासन, समतामूलक समाज, जनता जनार्दन, किसान भाइयों, गरीब और मजलूम आदि शब्द मंच के लिए होते हैं। हम अक्सर उन्हें दिल पर ले लेते हैं और समझने लगते हैं कि वाक़ई खरबूजा अब छुरी से नहीं कटेगा या छुरी-खरबूजा शाश्वत रिश्ता अब बदल जाएगा। कभी-कभी इस रिश्ते में कंफ्यूजन पैदा होता है जब छुरी रूपी राज्य की संस्थाएँ आपस में ‘किसकी धार कितनी तेज है’ की होड़ में एक-दूसरे पर चल जाती हैं या खरबूजे पर हाथ आजमाने लगती हैं। एक जज के घर से नोटों के बंडल मिलने पर भी छुरियाँ बाहर निकलीं और सत्ता में बैठे लोग ‘कॉलेजियम हटाओ’ की 32 साल पुरानी मांग दोहराने लगे।

सुप्रीम कोर्ट को एक वायरल वीडियो देख कर ब्रह्मज्ञान आया। बच्ची का बुलडोजर से अपनी झोंपड़ी गिराए जाने की कार्रवाई के दौरान छोटे हाथों में अपनी किताबें ले कर भागती दिखाई दे रही है। इस वीडियो को देखने के बाद जजों को कहना पड़ा ‘इस घटना ने हमारी अंतरात्मा को हिला दिया है’। वैसे तो यह टिप्पणी किसी भी राज्य के मुखिया के गवर्नेंस पर ‘इंडाइटमेंट’ (कलंक) है लेकिन मुख्यमंत्री योगी ने प्रतिक्रिया में दो बातें कहीं। ‘मैं फुल टाइम पॉलिटिशियन नहीं हूँ’ और ‘बुलडोजर का उपयोग ज़रूरत है, उपलब्धि नहीं’। पहले कथन से वह यह बताना चाह रहे थे कि बुलडोजर न्याय की नयी इबारत लिखने में उनका ‘योगी’ स्वरूप चैतन्य था और दूसरे से कोर्ट की समझ को ख़ारिज किया। 

योगी मुख्यमंत्री भूल गए कि अगर सही बुलडोजर चला होता तो यह वास्तव में उपलब्धि होती। लेकिन दुर्भाग्यवश यह ‘हिंसक रथ’ खास क़िस्म के लोगों के ख़िलाफ़ या जो सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहे या पुलिस जुल्म की प्रतिक्रिया में पत्थरबाजी करने लगे उन्हीं के घर गिराने को ‘गवर्नेंस’ का नया आयाम दिया। सत्ता का नशा किसी भी नशे से ज़्यादा गहरा होता है, लिहाज़ा वह भूल जाता है कि लोगों की औसत समझ बेहतर करने के लिए ‘गेरुआधारी योगी होना या प्रातः शाखा में जाना’ कोई पूर्व-शर्त नहीं है। बैक डेट में नोटिस जबरिया चिपका कर बताना कि क़ानून के प्रावधानों का अनुपालन किया गया, सड़क पर चलने वाला बच्चा भी जानता है। फिर योगी जी ने चुनाव मंचों से इस बुलडोजर न्याय का भरपूर प्रचार किया तो क्या ‘उनके सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद कहे कथन ‘बुलडोजर जरूरत है उपलब्धि नहीं’ से मेल खाता है?

फिर उनका ऐलान कि ‘हिन्दू सुरक्षित रहेगा तो मुसलमान भी सुरक्षित रहेगा’ क्या बताता है। इसका दूसरा मतलब तो यही हुआ न कि ‘अगर हिन्दू असुरक्षित हुआ तो …’। राज्य का यह रोल और सुरक्षा की नयी शर्त भारत के संविधान से तो मेल नहीं खाती। 

लेकिन असली छुरी का अहंकार जनता के वोट की भीख पर जीने वाले राजनीतिक कार्यपालिका को होता है।

मुख्यमंत्री योगी का ‘निर्दोष’ तर्क था: सड़क तो चलने के लिए है (यानी नमाज पढ़ने के लिए नहीं)। देखने में भले ही सहज तर्क लगे लेकिन जरा इसकी परिणति कैसे होती है, देखें।

पश्चिमी यूपी के कई जिलों की पुलिस ने मुसलमानों से कहा कि वे अलविदा की नमाज सड़क पर अदा न करें वरना उन्हें न केवल गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया जाएगा बल्कि उनके पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस भी जब्त कर लिए जायेंगे। यह अलग बात है कि संविधान या तज्जनित किसी भी क़ानून ने उन्हें ये अधिकार नहीं दिए हैं कुछ वैसे ही जैसे ‘बुलडोजर न्याय’ दुनिया के किसी भी क्रिमिनल ज्युरिसप्रुडेंस में नहीं पढ़ाया जाता लेकिन यूपी का प्रयोग कई उत्साही मुख्यमंत्रियों ने न केवल अमल में लाना शुरू किया बल्कि उससे एक वर्ग के वोट बटोरे। सड़क पर नमाज न अदा करने को लेकर जब सवाल किया गया तो कई जिला पुलिस प्रमुखों ने बताया कि यह आदेश उनका नहीं, राजधानी से यानी पुलिस प्रमुख यानी सरकार की ओर से आया है। इसके दो दिन पहले राज्य के सीएम “योगी” ने कहा- अगर हिन्दू सुरक्षित रहेगा तो मुसलमान भी सुरक्षित रहेगा। और उसके तत्काल बाद एक विवादास्पद डीएसपी का फिर से कैमरे पर बयान आया ‘सेवई खिलानी है तो गुझिया भी खानी पड़ेगी’।

मेरठ में इफ्तार के लिए सामान लेने गए एक मुसलमान को जबरिया रंग लगाया गया। ऐतराज करने पर मारपीट की गयी और मौत होने पर पुलिस ने कारण हार्ट अटैक दर्ज किया। 

सीएम राज्य का कार्यपालिका प्रमुख होता है और उस संविधान में निष्ठा की शपथ लेता है जो ‘हम भारत के लोगों’ ने बनायी है। राज्य की ओर से एक समुदाय की सुरक्षा की शर्त दूसरे समुदाय की सुरक्षा कब से होने लगी? क्या एक सुरक्षित नहीं रहेगा तो राज्य दूसरे को भी असुरक्षित होते देखता रहेगा? सेवई और गुझिया तो सामाजिक आचार-व्यवहार के क्षेत्र में आते हैं, पुलिस के कार्यों में न गुझिया खिलाना है ना ही सेवई पहुँचना। इसी अधिकारी ने होली-जुमा के दिन कहा था कि जिन्हें रंग से ऐतराज है वे घरों से न निकलें। इस राज्य के मध्य क्षेत्र में एक कहावत है ‘जबरा मारै, रोवै न दे’ (बलशाली मारता भी है और रोने भी नहीं देता)। यहाँ जबरा की भूमिका में राज्य दिखाई दे रहा है जो शांति बनाये रखने की नयी शर्तें रखा रहा है।

(लेखक ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के पूर्व महासचिव भी रह चुके हैं)

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