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गुजरातः मुस्लिमों की सरे बाजार पिटाई में 4 पुलिसकर्मी दोषी, सजा सुनाई

गुजरातः मुस्लिमों की सरे बाजार पिटाई में 4 पुलिसकर्मी दोषी, सजा सुनाई

गुजरात हाईकोर्ट ने खेड़ा में कुछ मुस्लिमों को मामूली आरोप में चौराहे पर पोल से बांधकर पिटाई करने के मामले में चार पुलिस वालों को सजा सुनाई है। गुजरात ने 2002 में भयानक दंगे देखे हैं। उसके बाद से वहां मुस्लिमों को लेकर तमाम खबरें आती रहती है। खेड़ा का मामला वायरल हुआ था। इस मामले में सजा से ज्यादा महत्वपूर्ण अदालत की टिप्पणियां हैं।

गुजरात हाईकोर्ट ने गुजरात पुलिस के 4 अधिकारियों को अदालत की अवमानना ​​(सुप्रीम कोर्ट के डीके बसु दिशानिर्देशों का उल्लंघन) का दोषी पाया है। हाईकोर्ट ने उन्हें गुरुवार 19 अक्टूबर को 14 दिनों की साधारण कैद की सजा सुनाई है। दोषी पुलिसकर्मियों को फौरन गिरफ्तार नहीं किया जा सकेगा। क्योंकि अदालत ने फिलहाल अपने फैसले को 3 महीने के लिए रोक दिया है, ताकि आरोपियों को इस फैसले के खिलाफ अपील का मौका मिल सके। लाइव लॉ के मुताबिक पिछले साल अक्टूबर में खेड़ा जिले में मुस्लिम पुरुषों को सार्वजनिक रूप से पीटा गया था। लेकिन इस संबंध में जस्टिस ए.एस. सुपेहिया और जस्टिस गीता गोपी की टिप्पणी महत्वपूर्ण है। 

अदालत इस बात से खुश नहीं है कि यह दिन आ गया है जब वह ऐसे आदेश पारित कर रही है जिसमें अधिकारियों को साधारण कारावास से गुजरने के लिए कहा जा रहा है।


-जस्टिस ए.एस. सुपेहिया, जस्टिस गीता गोपी, गुजरात हाईकोर्ट 19 अक्टूबर 2023 सोर्सः लाइव लॉ

खेड़ा सार्वजनिक पिटाई मामले में जहीरमिया मलिक (62), मक्सुदाबनु मलिक (45), सहादमिया मलिक (23), सकील्मिया मलिक (24) और शाहिदराजा मलिक (25) ने 13 पुलिस कर्मियों के खिलाफ गुजरात हाईकोर्ट में अवमानना ​​याचिका दायर की थी, जिसमें उन पर कोड़े मारने और अवैध तरीके से कैद में रखने और हमला करने का आरोप लगाया गया था। 

पुलिस द्वारा सार्वजनिक रूप से पिटाई के कृत्य को "अमानवीय" और "मानवता के खिलाफ कृत्य" करार देते हुए बेंच ने यह भी कहा कि यातना या अपमान के कृत्यों से शारीरिक और भावनात्मक नुकसान हो सकता है। गिरफ्तार किए गए लोगों को जीवन का अधिकार है। जिसमें सम्मान के साथ जीवन का अधिकार भी शामिल है और किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी पर इसे स्थगित नहीं किया जा सकता है। अदालत ने मदर टेरेसा को कोट करते हुए कहा- 

मानवाधिकार सरकार द्वारा दिए गए विशेषाधिकार नहीं हैं, वे मानवता के आधार पर हर इंसान का अधिकार हैं। जीवन का अधिकार किसी अन्य की खुशी पर निर्भर नहीं होना चाहिए और न ही यह आकस्मिक होना चाहिए, यहां तक ​​कि माता-पिता की खुशी पर भी नहीं।


-मदर टेरेसा (गुजरात हाईकोर्ट ने उन्हें कोट किया) 19 अक्टूबर 2023 सोर्सः लाइव लॉ

मदर टेरेसा को कोट करने के बाद अदालत ने कहा-  "इस मामले में, आरोपी पुलिसकर्मियों ने "शिकायतकर्ताओं के मानवाधिकारों और गरिमा को अपवित्र किया है जैसे कि उन्हें ऐसा करने का विशेषाधिकार दिया गया हो।"

अदालत ने यह भी माना कि कानून और व्यवस्था के रखवालों को "नागरिक आजादी का हनन नहीं करना चाहिए क्योंकि उनका कर्तव्य रक्षा करना है न कि त्याग करना" और एक बार जब व्यक्ति पुलिस हिरासत में हो तो उसकी "गरिमा को ठेस पहुंचाने  की अनुमति नहीं दी जा सकती।" .

इस मामले में पुलिस की कहानी थी कि 3 अक्टूबर, 2022 को लगभग आधी रात को, 150-200 लोगों की भीड़ ने कथित तौर पर स्वामीनारायण मंदिर के अंदर पथराव करके और कथित तौर पर “धार्मिक भावनाओं को आहत” करके उंधेला गांव में एक गरबा कार्यक्रम पर हमला किया। घटना के बाद अगले दिन, 4 अक्टूबर, 2022 को सार्वजनिक जय जयकार के साथ चौराहे पर पुलिस ने कई लोगों को सार्वजनिक रूप से पीटने के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद इस घटना ने लोगों का ध्यान खींचा। जिन्हें पीटा गया वे समुदाय विशेष के लोग थे।

हाईकोर्ट ने नडियाद के मजिस्ट्रेट से जांच रिपोर्ट मांगी। अदालत ने चार आरोपी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अदालत की अवमानना ​​अधिनियम की धारा 12 (अवमानना ​​के लिए सजा) के साथ धारा 2 (बी) (सिविल अवमानना) के तहत अवमानना ​​कार्यवाही शुरू की। इन आरोपी पुलिस वालों के नाम ए वी परमार, डी बी कुमावत, लक्ष्मण सिंह कनकसिंह डाभी और राजूभाई डाभी हैं।

अदालत ने गुरुवार को उन्हें आरोपों के तहत दोषी करार देते हुए 14 दिन की कैद और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई, जिसका भुगतान न करने पर तीन दिन की अतिरिक्त कैद होगी। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि आदेश प्राप्त होने के 10 दिनों के भीतर दोषी गुजरात हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार न्यायिक के समक्ष उपस्थित हों, जिसके बाद रजिस्ट्रार न्यायिक उन्हें उचित न्यायिक प्राधिकरण के पास भेजेंगे। लेकिन अदालत ने सजा के क्रियान्वयन पर तीन महीने की रोक लगा दी है, ताकि दोषी मुजरिम फैसले के खिलाफ अपील कर सकें।

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