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36 मंत्रियों के दल को जम्मू-कश्मीर क्यों भेज रही है सरकार?

36 मंत्रियों के दल को जम्मू-कश्मीर क्यों भेज रही है सरकार?

अनुच्छेद 370 में फेरबदल और जम्मू-कश्मीर में पाबंदी लगाए जाने के पाँच महीने बाद अब पहली बार केंद्र सरकार के मंत्री राज्य का दौरा करेंगे।

अनुच्छेद 370 में फेरबदल और जम्मू-कश्मीर में पाबंदी लगाए जाने के पाँच महीने बाद अब पहली बार केंद्र सरकार के मंत्री राज्य का दौरा करेंगे। कहा जा रहा है कि इनका दौरा लोगों तक पहुँच बनाने, उन्हें राज्य को तोड़कर बनाए गए दो केंद्र शासित प्रदेश में विकास की पहल और केंद्र सरकार की योजनाओं की जानकारी देने के लिए तैयार किया गया है। यह पहली बार है कि केंद्र सरकार की ओर से इस स्तर पर विश्वास बहाली के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन क्या सच में इसका मक़सद यही है या कुछ और है कहीं इसका मक़सद यह दिखाना तो नहीं है कि राज्य में सबकुछ सामान्य है राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल कई बार जम्मू-कश्मीर की यात्रा कर चुके हैं, विदेशी राजनयिकों की भी यात्रा कराई गई है, लेकिन अभी तक स्थिति ऐसी नहीं हो पाई है कि इंटरनेट पूरी तरह बहाल हो गया हो। नेताओं को भी हिरासत में रखा गया है और भारी तादाद में सुरक्षा बल तैनात हैं और पाबंदियाँ लगी हुई हैं। 

रिपोर्ट है कि जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर जाने वाले केंद्रीय मंत्रियों के दल में क़ानून मंत्री रविशंकार प्रसाद, रेलवे मंत्री पीयूष गोयल भी शामिल होंगे। इस दल में स्मृति ईरानी, रमेश पोखरियाल, जितेंद्र सिंह, किरेन रिजिजू, हरदीप सिंह पुरी, अनुराग ठाकुर, साध्वी निरंदन ज्योति सहित 36 लोग होंगे। वे श्रीनगर, जम्मू और घाटी के दूसरे क्षेत्रों की यात्रा करेंगे। हालाँकि इस दल की यात्रा की तारीख तय नहीं है।

इनकी यह यात्रा अनुच्छेद 370 में पिछले साल पाँच अगस्त को बदलाव के बाद हो रही है। अभी भी राज्य में पाबंदी लगी है। हालाँकि मोदी और अमित शाह कई बार कह चुके हैं कि जम्मू-कश्मीर में यह इसलिए किया गया है ताकि देश के बाक़ी हिस्से के साथ राज्य को एकीकृत किया जा सके ताकि घाटी में पूरा विकास हो सके। लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि इंटरनेट और सूचना के दूसरे संसाधनों पर लंबे समय से पाबंदी लगी होने और परिवहन व्यवस्था के ठप होने से जम्मू-कश्मीर में पूरा जीवन ही अस्त-व्यस्त हो गया है। विकास की तो बात ही दूर है। 

वैसे, बीजेपी सरकार शुरुआत से ही पूरी तरह से यह पेश करने की कोशिश करती रही है कि राज्य में सबकुछ सामान्य है। जम्मू-कश्मीर प्रशासन के हवाले से यह कहा जाता रहा है कि पाँच अगस्त के बाद से सुरक्षा बलों को एक गोली तक नहीं चलानी पड़ी है। लेकिन इस बीच अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक में ऐसी रिपोर्टें आई हैं कि ज़बरदस्त पाबंदी के बावजूद कई जगहों पर प्रदर्शन हुए। एक रिपोर्ट में तो यह दावा किया गया था कि सुरक्षा बलों ने गोलियाँ चलाईं। हालाँकि इंटरनेट पर पाबंदी लगी होने के कारण वहाँ से ख़बरें कम ही आईं और जो भी रिपोर्टें आईं वह छन-छन कर दिल्ली या फिर विश्व के दूसरे हिस्से तक पहुँचीं। 

राज्य में सामान्य स्थिति की बात को साबित करने के लिए कई बार सरकारी तौर पर प्रयास हुए। लेकिन हर बार उस पर सवाल उठे। पाबंदी क्यों है, राजनेता सहित हज़ारों लोग हिरासत में क्यों हैं

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की घाटी की यात्रा भी सामान्य स्थिति की बात को साबित करने की रणनीति का हिस्सा थी। उस यात्रा का वीडियो डोभाल ने जारी किया था जिसमें वह कश्मीर के कुछ लोगों के साथ सड़क पर खड़े होकर बातचीत करते हुए और खाना खाते दिखे थे। लेकिन बाद में सामान्य स्थिति होने के उनके दावे पर सवाल खड़े हुए थे। इसके बाद भी उन्होंने कई बार राज्य के दौरे किए। 

पिछले हफ़्ते ही भारत सरकार ने 15 देशों के राजनयिकों को जम्मू-कश्मीर की यात्रा कराई थी। हालाँकि स्वतंत्र रूप से यात्रा करने की अनुमति नहीं दिए जाने के कारण कुछ यूरोपीय देशों और अन्य ने वहाँ जाने से इनकार कर दिया था। 

बता दें कि पिछले साल अक्टूबर महीने में भी कुछ यूरोपीय सांसदों ने जम्मू-कश्मीर का दौरा किया था, लेकिन वे राजनयिक नहीं थे। उनका दौरा विवादों में रहा था। उस दौरे पर सवाल उठे थे कि क्या यूरोपीय संसद के 27 सदस्यों का कश्मीर दौरा प्रायोजित था ये सवाल इसलिए उठे थे क्योंकि इन 27 में से 22 सांसद अपने-अपने देश की धुर दक्षिणपंथी पार्टियों के थे। वे प्रवासी विरोधी, इसलाम विरोधी, कट्टरपंथी, फ़ासिस्ट और नात्सी समर्थक विचारों के लिए जाने जाते हैं। महत्वपूर्ण बात यह भी थी कि ये सभी सांसद निजी दौरे पर थे, वे यूरोपीय संघ या यूरोपीय संसद की ओर से नहीं भेजे गए थे। तब यह भी आरोप लगाया गया था कि सरकार जम्मू-कश्मीर में बेहद ख़राब स्थिति के बावजूद दुनिया में अच्छी तसवीर भेजने के लिए कथित तौर पर इस दौरे को प्रयोजित किया था।

इतना सब होने के बावजूद केंद्र सरकार के मंत्री जम्मू-कश्मीर नहीं जा सके थे। लेकिन अब वे जा रहे हैं। इसका नतीजा क्या होगा, यह समझना ज़्यादा मुश्किल नहीं है। जब तक लोगों को पाबंदी से राहत नहीं मिलेगी, इंटरनेट बहाल नहीं होगा, नेताओं को हिरासत से रिहा नहीं किया जाएगा, परिवहन व्यवस्था को सुचारू नहीं किया जाएगा, जन-जीवन सामान्य नहीं किया जाएगा, तब तक इसका क्या मतलब है!

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