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आख़िर क्यों नहीं हुआ बीएसपी-कांग्रेस में चुनावी गठबंधन?

आख़िर क्यों नहीं हुआ बीएसपी-कांग्रेस में चुनावी गठबंधन?

कांग्रेस-बीएसपी में गठबंधन होता तो यह भाजपा के लिए मुश्किल हो सकता था। अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव अहम हैं।

मायावती ने दिया झटका

बीएसपी प्रमुख मायावती ने मध्य प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर कांग्रेस को ज़ोरदार झटका दिया है। मायावती के इस एलान के बाद लोकसभा चुनाव के लिए बनने वाला महागठबंधन मुश्किल में पड़ता दिखाई दे रहा था। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उम्मीद जताई है कि मायावती लोकसभा चुनाव में साथ आ सकती हैं। बता दें कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव बेहद अहम हैं।

मायावती हालांकि छत्तीसगढ़ में पुराने कांग्रेसी और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के अध्यक्ष अजीत जोगी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का एलान पहले ही कर चुकी थीं। साथ ही, मध्य प्रदेश में भी बीएसपी ने 22 सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए थे। लेकिन कांग्रेस को यहां गठबंधन होने की उम्मीद थी। कांग्रेस की गणित थी कि मध्य प्रदेश में मायावती के साथ मिलकर चुनाव लड़ने से उसे फ़ायदा होगा लेकिन अब दोनों दल अलग-अलग होकर चुनाव मैदान में उतरेंगे। मध्य प्रदेश में बीएसपी के चार विधायक हैं।

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आम चुनाव में आ सकती हैं साथ

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मध्य प्रदेश में बीएसपी के साथ गठबंधन करना चाहते थे। राहुल ने कहा, 'मैं नहीं मानता कि बीएसपी के मध्य प्रदेश में गठबंधन न करने से हमें बहुत फर्क पड़ेगा।' उन्होंने कहा कि यह बेहतर होता यदि हम गठबंधन बनाने में सफल हो पाते।कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, 'राज्य में गठजोड़ और केंद्र में एक साथ आना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। मायावती जी ने इसका संकेत दिया है। हम मध्य प्रदेश में काफी लचीला रुख अपना रहे थे। यहां तक कि मैं अपने राज्य के कई नेताओं से ज्यादा लचीला रवैया अपना रहा था। हम बातचीत के बीच में थे, लेकिन उन्होंने अपने ही रास्ते पर जाने का फैसला लिया।' इस बारे में मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ ने कहा, ‘सपा से हमारी बातचीत चल रही है और हो सकता है कि कांग्रेस-सपा यहां मिलकर चुनाव लड़ें।

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मोदी लहर में हुआ था नुकसान

बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर ने कांग्रेस और बीएसपी को बहुत पीछे छोड़ दिया था। इस चुनाव में बीजेपी को 54 फ़ीसदी, कांग्रेस को 34.90 फ़ीसदी और बीएसपी को 3.80 फ़ीसदी वोट मिले थे। कांग्रेस और बीएसपी को कुल मिलाकर 38.70 फ़ीसदी वोट मिले थे जो भाजपा को मिले वोट से 15.30 फ़ीसदी कम हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा को दलित, ओबीसी और सामान्य वर्ग ने झोली भरकर वोट दिए थे।

लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में हालात अलग हैं। भाजपा के सामने चुनौती है कि वह 2013 के प्रदर्शन को बरक़रार रखे। लेकिन ऐसा होना आसान नहीं दिखता। इसका कारण यह है कि मोदी सरकार के साढ़े चार साल के कामकाज से लोग बहुत संतुष्ट नहीं हैं। इसके अलावा सत्ता विरोधी रुझान के कारण भी भाजपा को नुकसान हो सकता है। इसलिए 2014 के लोकसभा चुनाव के आधार पर कोई आकलन नहीं किया जा सकता।

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हालांकि 2013 के विधानसभा चुनाव के प्रदर्शन को आधार बनाया जा सकता है। इस चुनाव के आंकड़ों को देखा जाए तो 230 सीटों में से बीजेपी को 165 सीटें मिली थीं और उसका वोट प्रतिशत 44.88 फ़ीसदी था। वहीं, कांग्रेस को 36.38% फ़ीसदी वोट के साथ 58 सीटों पर जीत मिली थी। बीएसपी को महज 4 सीटों पर जीत मिली थी और उसका वोट प्रतिशत 6.29% रहा था। इसके अलावा बीएसपी 11 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी। इस चुनाव में कांग्रेस और बसपा को कुल मिलाकर 42.67 फ़ीसदी वोट मिले थे जो भाजपा से 2.21 फ़ीसदी कम है।कहा जा सकता है कि अगर कांग्रेस और बसपा में गठबंधन होता तो भाजपा के लिए चुनाव जीतना मुश्किल हो सकता था। लेकिन गठबंधन न होने के कारण चुनाव में जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस को कड़ी मेहनत करनी होगी। 

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