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क्या पश्चिम बंगाल के चुनाव में बीजेपी चौंकाएगी ममता को?

क्या पश्चिम बंगाल के चुनाव में बीजेपी चौंकाएगी ममता को?

पश्चिम बंगाल में इस बार संसदीय चुनाव का अब तक का सबसे जबरदस्त मुक़ाबला चल रहा है। टीएमसी और बीजेपी के बीच नोकझोंक से लगता है कि लड़ाई प्रधानमंत्री मोदी और ममता बनर्जी के बीच हो।

पश्चिम बंगाल में इस बार संसदीय चुनाव का अब तक का सबसे जबरदस्त मुक़ाबला चल रहा है। जैसे-जैसे चुनाव अपने आख़िरी चरण की ओर आगे बढ़ रहा है, तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी और बीजेपी के बीच नोकझोंक इस हद तक बढ़ गयी है जैसे यह लड़ाई अब सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच हो।

राज्य में चुनावी हालात इस ओर इशारा करते हैं कि न तो तृणमूल कांग्रेस और न ही बीजेपी रणनीति और समीकरणों को पूरी तरह अपने पक्ष में मान कर चल सकते हैं। उत्तर बंगाल में कूच बिहार से लेकर दक्षिण में आसनसोल तक टीएमसी गुटबाज़ी की शिकार है और वह पार्टी के अपने नेताओं की ही नाराज़गी से जूझ रही है।

तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी गुटबाज़ी से निपटने के लिए राज्य में इधर-उधर हाथ-पाँव रही हैं। उनका ज़्यादातर तीखे भाषण अपनी पार्टी के ही कार्यकर्ताओं और नेताओं के ख़िलाफ़ हैं जिसमें वह चेतावनी देती हैं कि यदि वे पार्टी के उम्मीदवार के ख़िलाफ़ कार्य करते पाये गये तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।

बाक़ी का उनका भाषण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के ख़िलाफ़ होता है। बीजेपी ने योगी आदित्यनाथ, बिप्लब कुमार देब, रघुबीर दास जैसे नेताओं को राज्य में पार्टी के प्रचार के लिए झोंक दिया है। इसके अलावा अमित शाह, राजनाथ सिंह और शिवराज सिंह चौहान जैसे बड़े नेता, बीजेपी शासित राज्यों के मंत्री और ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई चरणों में राज्य में प्रचार किया है। हालाँकि बड़े नेताओं के इस स्तर पर प्रचार करने के बाद भी बीजेपी के लिए ज़मीनी स्तर पर प्रचार चिंता का विषय है। 

बीजेपी से जुड़ा शायद ही कोई संगठन है जिसने टीएमसी सरकार के एंटी-इन्कंबेंसी का फ़ायदा उठाया हो। हालाँकि उत्तरी बंगाल में मतदान के बाद शुरुआती चुनावी विश्लेषणों में लगता है कि बीजेपी शायद अलीपुरदुआर सीट को टीएमसी से छीन ले।

मतदान के बाद की स्थिति से पता चलता है कि केंद्रीय बलों, पुलिस पर्यवेक्षकों की उपस्थिति और कुछ पुलिस निरीक्षकों के तबादलों के बावजूद बीजेपी उस माहौल को तूल नहीं दे पायी जिसकी इसने शुरुआत की थी।

दार्जिलिंग में भी कड़े मुक़ाबले में बीजेपी

अलीपुरदुआर के अलावा दार्जिलिंग में भी बीजेपी काफ़ी कड़े मुक़ाबले में है। बालुरघाट में भी कड़ी टक्कर की संभावना है, लेकिन मालदा उत्तर व दक्षिण, रायगंज, जलपाईगुड़ी और कूच बिहार में टीएमसी काफ़ी आगे दिख रही है। टीएमसी ने इन सीटों पर अपना कब्ज़ा बरक़रार रखने के लिए आख़िरी क्षणों में मज़बूती दिखाई है।

लेकिन तृणमूल को सबसे बड़ा फ़ायदा मुर्शीदाबाद में हो सकता है जहाँ चुनावी माहौल से लगता है कि टीएमसी जंगीपुर और बहरामपुर, दोनों सीटें कांग्रेस से छीन सकती है। मुर्शीदाबाद लोकसभा सीट पर भी कांग्रेस के साथ तृणमूल का कड़ा मुक़ाबला है और सामान्य रूप से चर्चा है कि यह सीट भी ममता के खाते में जा सकती है।

हालाँकि तृणमूल का ऐसा प्रदर्शन दक्षिण बंगाल में रहने की संभावना नहीं है। नदिया क्षेत्र में दो सीटों और उत्तरी 24 परगना क्षेत्र में पाँच सीटों पर कड़ा मुक़ाबला है। बैरकपोर, बारासात और बशीरहाट में काँटे का मुक़ाबला है। टीएमसी हावड़ा और बिरभूम में बीजेपी को पटखनी दे सकती है, लेकिन हूगली में कड़ा मुक़ाबला होने के आसार हैं।

कोलकाता में एक या दो सीटों पर चौंकाने वाले नतीजे आ सकते हैं। उत्तरी कोलकाता में सुदीप बंदोपाध्याय को राहुल सिन्हा और दक्षिण कोलकाता में टीएमसी के माला रॉय के ख़िलाफ़ नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रिश्तेदार चंद्र बोस के बीच कड़ी टक्कर है।

हालाँकि टीएमसी के पूर्व नेता और फ़िलहाल जादवपुर से बीजेपी के उम्मीदवार अनुपम हाज़रा की जीतने की संभावना नहीं है। तृणमूल को लगता है कि बर्दवान में उसकी राह आसान है, लेकिन दुर्गापुर में कड़ा मुक़ाबला हो सकता है। यहाँ पर बीजेपी के सुरिंदर सिंह अहलुवालिया का मुक़ाबला तृणमूल सांसद ममताज़ संघमिता से है। आसनसोल में केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो का मूनमून सेन के साथ कड़ा मुक़ाबला है और यहाँ से दोनों में से कोई भी उम्मीदवार जीत सकता है।

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