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बंगाल चुनाव के पहले हिंसा का माहौल बनाना चाहती है बीजेपी?

बंगाल चुनाव के पहले हिंसा का माहौल बनाना चाहती है बीजेपी?

पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले तेज़ी से बढ़ रही राजनीतिक कटुता और घात-प्रतिघात के बीच क्या राज्य बीजेपी हिंसा का माहौल बनाना चाहती है? क्या वह पूरे राज्य में चुनाव के पहले आतंक का राज कायम करना चाहती है? 

पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले तेज़ी से बढ़ रही राजनीतिक कटुता और घात-प्रतिघात के बीच क्या राज्य बीजेपी हिंसा का माहौल बनाना चाहती है क्या वह पूरे राज्य में चुनाव के पहले आतंक का राज कायम करना चाहती है बौद्धिकता, राजनीतिक शुचिता और सिद्धान्तवादिता के लिए जाने जाने वाले पश्चिम बंगाल में राजनीतिक विरोधियों को 'हाथ-पैर तोड़ने' या 'अस्पताल पहुँचाने' या 'सीधे श्मशान घाट भेज देने' की धमकी क्यों दी जा रही है

यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि यह राज्य बीजेपी के अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नज़दीक समझे जाने वाले दिलीप घोष ने दी है और वह भी सार्वजनिक रूप से। 

खुली धमकी

महत्वपूर्ण यह भी है कि दिलीप घोष ने यह बात अमित शाह के पश्चिम बंगाल दौरे के ठीक बाद दी है। उन्होंने मेदिनापुर ज़िले के हल्दिया में एक सभा में कहा,

“दीदी के भाई लोग जो तरह-तरह की गड़बड़ियाँ करते रहते हैं, वे अगले छह महीने में सुधर जाएं, वर्ना उनके हाथ-पैर तोड़ दिए जाएंगे, पसलियाँ तोड़ दी जाएंगी और सिर फोड़ दिया जाएगा। हो सकता है आपको अस्पताल जाना पड़ जाए। यदि आपने ज़्यादा कुछ किया तो आपको श्मशान भी जाना पड़ सकता है।”


दिलीप घोष. अध्यक्ष, पश्चिम बंगाल बीजेपी

अमित शाह का दौरा

पूर्व पार्टी अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसके दो दिन पहले ही पश्चिम बंगाल का दौरा किया था। उन्होंने कई सभाएं की, कई लोगों के घर जाकर उनसे मुलाक़ात की, उनके यहां खाना खाया। अमित शाह ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और दावा किया कि उनकी पार्टी 294 में से 200 सीटें जीतेंगी। 

दिलीप घोष ने हल्दिया की सभा में बिहार विधानसभा चुनाव की चर्चा करते हुए दावा किया, “बिहार में पहले लालू यादव के समय जंगलराज था, बीजेपी ने लालू यादव को भगा दिया और वहां लोकतंत्र की स्थापना की और अब इसी तरह पश्चिम बंगाल में दीदी के राज को ख़त्म कर लोकतंत्र स्थापित किया जाएगा।”

उन्होंने इस सभा में कहा,

“मैं यह एलान करना चाहता हूं कि अगला चुनाव दीदी की पुलिस के देखरेख में नहीं, बल्कि दादा की पुलिस की देखरेख में होगा। दीदी की पुलिस के लोग चुनाव बूथ से सौ मीटर दूर आम के पेड़ के नीचे खैनी खाते रहेंगे, बस।”


दिलीप घोष. अध्यक्ष, पश्चिम बंगाल बीजेपी

सच से परे

दिलीप घोष की ये दोनों बातें हास्यास्पद व सच से परे हैं। बीजेपी ने 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में सिर्फ 55 सीटें थीं और उसे सिर्फ 15.65 प्रतिशत वोट मिले थे। सबसे अधिक 139 सीटें जीतने वाला जनता दल युनाइटेड था और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने थे। उस चुनाव में बीजेपी ने जदयू के साथ किसी तरह का कोई समझौता नहीं किया था और वह सरकार में शामिल भी नहीं हुई थी। फिर दिलीप घोष किस आधार पर बिहार से लालू यादव को भगाने और जंगलराज ख़त्म करने का दावा करते हैं 

इसी तरह चुनाव तो राज्य पुलिस की देखरेख में ही होंगे, भले ही वह चुनाव आयोग के नियंत्रण में हों। दिलीप घोष के यह कहने का क्या मतलब है कि दादा यानी अमित शाह की पुलिस चुनाव कराएगी

तृणमूल कांग्रेस ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया जताई है। सांसद व वरिष्ठ तृणमूल नेता सौगत राय ने एनडीटीवी से कहा, 

“इस तरह के बयान से यह स्पष्ट है कि बीजेपी चुनाव के पहले राज्य में आतंक का राज कायम करना चाहती है, वह पूरे राजनीतिक परिवेश में ज़हर घोलना चाहती है।”


सौगत राय, सांसद, तृणमूल

दिलीप घोष के बिगड़े बोल

दिलीप घोष इस तरह की विवादास्पद बातें पहले भी कह चुके हैं। उन्होंने  कुछ दिन पहले नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुंचाने वालों को लेकर कहा था कि असम और उत्तर प्रदेश में उनकी सरकार ने ऐसे लोगों को “कुत्ते की तरह मारा”’है।

'कुत्ते की तरह मारा, ठीक किया'

घोष ने कहा था कि उत्तर प्रदेश, असम और कर्नाटक की सरकारों ने नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में प्रदर्शन करने वालों पर फ़ायरिंग का आदेश देकर बिल्कुल ठीक किया है। इन तीनों ही राज्यों में बीजेपी की सरकार है। 

शाहीन बाग में कोई मरा क्यों नहीं

इसी तरह पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रमुख ने सीएए के ख़िलाफ़ शाहीन बाग में चल रहे आन्दोलन पर आपत्तिजनक बातें कही थीं। उन्होंने इस पर सवाल उठाते हुए पूछा था, “नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ शाहीन बाग़ में चल रहे प्रदर्शन में अभी तक कोई मरा क्यों नहीं।” 

घोष मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान का जवाब दे रहे थे। इस क़ानून के विरोध में पश्चिम बंगाल में प्रदर्शनों की अगुवाई कर रहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया था कि नोटबंदी के दौरान एटीएम से पैसा निकालने के लिए लगी लाइनों में खड़े 100 से ज़्यादा लोग मर गए थे। 

लेकिन दिलीप बाबू ने कहा था,

“मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि 2 से 3 घंटे तक लाइनों में लगे लोग मर रहे थे, लेकिन अब महिलाएं और बच्चे 45 डिग्री तापमान में बैठे हैं लेकिन कोई नहीं मर रहा है। उन्होंने ऐसा कौन सा अमृत पी लिया है। मैं हैरान हूं। उन्हें कितना पैसा मिल रहा है (प्रदर्शन के लिये)।”


दिलीप घोष. अध्यक्ष, पश्चिम बंगाल बीजेपी

'गाय के दूध में सोना'

इसी तरह दिलीप घोष ने एक कार्यक्रम में दावा किया था कि देसी गाय के दूध में सोना होता है और इसीलिये इसका रंग सोने जैसा होता है। देसी और विदेशी गाय की तुलना करते हुए घोष ने यह भी ‘ज्ञान’ दिया था कि कौन सी गाय को माँ कहना चाहिए और कौन सी गाय को आंटी। घोष ने कहा था कि केवल देसी गाय ही हमारी माँ है जबकि विदेशी गाय आंटी जैसी हैं। घोष इससे पहले पुलिसकर्मियों को धमकी देने को लेकर भी विवादों में रहे हैं।

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक संस्कृति इस तरह की नहीं रही है कि विरोधियों पर हमला करते हुए सीमाओं का उल्लंघन कर दिया जाए। वहाँ विरोधियों पर हमले राजनीतिक नीतियों, सिद्धान्तों और फ़ैसलों को लेकर होते हैं।

बंगाली संस्कृति

पश्चिम बंगाल की राजनीति में हिंसा हुई है, पर इस तरह कोई खुले आम हिंसा की वकालत नहीं करता है, कोई अपने विरोधियों को इस तरह हाथ-पैर तोड़ने या श्मशान भेजने की  धमकी नहीं देता है।

लोगों को वह दिन याद है जब ममता बनर्जी पहली बार खेल मंत्री बनाई गई थीं दिल्ली आने से पहले अपने चरम विरोधी और राज्य के मुख्यमंत्री ज्योति बसु के पैर छूकर आशीर्वाद लिया था। बसु ने उन्हें बताया था कि संसद में किस तरह व्यवहार करना है और राज्य से जुड़े सवाल उठाने हैं।

इसी तरह वह बात भी बहुत पुरानी नहीं हुई जब संसद के सत्र के दौरान पश्चिम बंगाल के सभी सांसद एक साथ भोजन करते थे और किसी एक के पास बिल भेज देते थे। 

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तो कांग्रेस के सिद्धार्थ शंकर राय व सीपीएम के ज्योति बसु, ममता बनर्जी और सीपीएम के सुभाष चक्रवर्ती और दूसरे कई लोगों के निजी जिंदगी की दोस्ती सबको पता है। 

पर बीजेपी के साथ ही पश्चिम बंगाल में एक नई राजनीतिक संस्कृति भी आ रही है, जो बंगाली संस्कृति से मेल नहीं खाती है। दिलीप घोष शायद इसी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं।

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