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योगी आदित्यनाथ के इस बयान का अर्थ क्या है- 'अगर हिंदू सेफ तो मुस्लिम भी सुरक्षित हैं'

योगी आदित्यनाथ के इस बयान का अर्थ क्या है- 'अगर हिंदू सेफ तो मुस्लिम भी सुरक्षित हैं'

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का दावा है कि मुस्लिम परिवार हिंदुओं के बीच सुरक्षित हैं, लेकिन मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदुओं की सुरक्षा पर उन्होंने सवाल किया है। योगी के इस बयान को व्यापक संदर्भों में देखने की जरूरत है। अभी तो जानिए कि योगी ने और क्या कहाः

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि राज्य में अल्पसंख्यक सबसे सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि एक मुस्लिम परिवार सौ हिंदू परिवारों के बीच सुरक्षित महसूस करेगा, लेकिन इसका उल्टा संभव नहीं है। एएनआई पॉडकास्ट में आदित्यनाथ ने कहा कि 50 हिंदू 100 मुस्लिम परिवारों के बीच सुरक्षित नहीं रह सकते और इसके लिए उन्होंने बांग्लादेश का उदाहरण दिया, जहाँ हाल के महीनों में अल्पसंख्यकों और मंदिरों पर कई हमले हुए हैं।

भाजपा के इस आक्रामक नेता ने कहा, "एक मुस्लिम परिवार सौ हिंदू परिवारों के बीच सबसे सुरक्षित रहेगा। उन्हें अपने सभी धार्मिक कर्मकांड करने की पूरी आज़ादी होगी। लेकिन क्या 50 हिंदू 100 मुस्लिम परिवारों के बीच सुरक्षित रह सकते हैं? नहीं। बांग्लादेश इसका उदाहरण है। इससे पहले पाकिस्तान उदाहरण था।"

आदित्यनाथ, जिनकी सरकार ने इस सप्ताह आठ साल पूरे किए हैं, ने दावा करते हुए कहा कि 2017 में भाजपा की सरकार बनने के बाद से उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक दंगे बंद हो गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि एक योगी के रूप में वे "सबकी खुशी" चाहते हैं।

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम सबसे सुरक्षित हैं। अगर हिंदू सुरक्षित हैं, तो वे भी सुरक्षित हैं।


-योगी आदित्यनाथ, सीएम यूपी सोर्सः एएनआई पोडकास्ट

योगी ने कहा- अगर 2017 से पहले यूपी में दंगे होते थे, अगर हिंदुओं की दुकानें जलती थीं, तो मुस्लिमों की दुकानें भी जलती थीं। अगर हिंदुओं के घर जलते थे, तो मुस्लिमों के घर भी जलते थे। और 2017 के बाद दंगे बंद हो गए।"

कई राज्यों में मंदिर-मस्जिद विवादों पर बोलते हुए आदित्यनाथ ने "हिंदू स्थलों" पर मस्जिदों के निर्माण पर सवाल उठाया और कहा कि यह इस्लामिक सिद्धांतों के खिलाफ है।

उन्होंने कहा कि सरकार सम्भल में जितने भी मंदिर हैं, उन्हें पुनर्जीवित करेगी। सम्भल में पिछले साल शाही जामा मस्जिद के कोर्ट-आदेशित सर्वे के दौरान भारी हिंसा हुई थी, जिसमें पांच लोगों की मौत हो गई थी।

आदित्यनाथ ने कहा, "सम्भल में 64 तीर्थ स्थल हैं, और हमें 54 मिले हैं... जो भी हो, हम ढूँढ़ लेंगे। हम दुनिया को बताएँगे कि सम्भल में क्या हुआ था?"

योगी ने अपने पोडकास्ट में और भी मुद्दों पर बात की है। उन्होंने नेता विपक्ष राहुल गांधी पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है। उन बयानों को इस रिपोर्ट में शामिल नहीं किया गया है। अब इस पर बात करते हैं कि योगी के दावों के विपरीत उनके कार्यकाल में यूपी में साम्प्रदायिक सौहार्द की क्या स्थिति रही है। क्योंकि योगी के बयान के कई सारे मतलब हैं। उनके कहने का लहजा क्या है। उससे तो लगता है कि वो किसी समुदाय को चेतावनी दे रहे हैं।

कासगंज हिंसा (जनवरी 2018)

गणतंत्र दिवस पर तिरंगा यात्रा के दौरान दो समुदायों के बीच झड़प हुई, जिसमें एक युवक की मौत हो गई और कई घायल हुए। यह घटना योगी के शासन के शुरुआती दिनों में हुई और इसे सांप्रदायिक तनाव का प्रतीक माना गया।

विश्लेषण: स्थानीय प्रशासन पर पक्षपात का आरोप लगा, और विपक्ष ने इसे सरकार की नाकामी बताया। 

कानपुर हिंसा (जून 2022): जुमे की नमाज के बाद दो समुदायों के बीच पथराव और हिंसा हुई, जिसमें 36 लोग गिरफ्तार हुए। यह एक टीवी डिबेट में पैगंबर पर टिप्पणी के विरोध से शुरू हुई थी। यूपी के कई शहरों में तनाव फैल गया था। पैगंबर पर टिप्पणी बीजेपी की महिला नेता नूपुर शर्मा ने की थी।

विश्लेषण: सरकार ने त्वरित कार्रवाई की, लेकिन यह घटना धार्मिक भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता और तनाव की मौजूदगी को दर्शाती है।

बहराइच हिंसा (अक्टूबर 2024):

दुर्गा मूर्ति विसर्जन के दौरान डीजे पर गाना बजाने को लेकर विवाद हुआ, जिसमें एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद पथराव और आगजनी हुई।

विश्लेषण: विपक्ष ने इसे प्रशासनिक विफलता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का परिणाम बताया, जबकि सरकार ने इसे सुनियोजित साजिश करार दिया। योगी ने पीड़ित परिवार को न्याय का भरोसा दिया।

संभल हिंसा (नवंबर 2024): शाही जामा मस्जिद के कोर्ट-आदेशित सर्वे के दौरान हिंसा भड़की, जिसमें 4 लोगों की मौत हुई और कई वाहनों को आग लगा दी गई। हिंदू पक्ष का दावा था कि मस्जिद की जगह पहले मंदिर था। इसमें लोकल कोर्ट ने एक ही दिन में सर्वे का आदेश दिया और कोर्ट कमिश्नर फौरन उसी दिन सर्वे करने भी जा पहुंचा। उसके साथ हिंदू संगठनों की भीड़ थी जो उत्तेजक नारे लगा रही थी। यह भीड़ मस्जिद में घुस गई और नमाजियों को वहां पीटा। उसके बाद हिंसा शुरू हो गई।

विश्लेषण: यह घटना धार्मिक स्थलों पर बढ़ते विवाद और तनाव को उजागर करती है। विपक्ष ने सरकार पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने का आरोप लगाया, जबकि सरकार ने इसे कानून के तहत कार्रवाई बताया। संभल हिंसा में पुलिस पर एकतरफा कार्रवाई का आरोप भी लगा। वहां के डीएसपी अनुज चौधरी आज भी विवादों में हैं। जुमे की नमाज़ पर अनुज चौधरी का बयान अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बना।

 - Satya Hindi

संभल हिंसा का फाइल फोटो

"लव जिहाद" कानून (2020):

उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत अंतरधार्मिक विवाहों पर सख्ती की गई। इसके तहत सैकड़ों मामले दर्ज हुए, ज्यादातर मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ। आलोचकों का कहना है कि इस कानून से हिंदू-मुस्लिम संबंधों को तनावपूर्ण बनाने की कोशिश हुई।

बुलडोजर कार्रवाई: 2024 तक 7,400 से अधिक घरों को तोड़ा गया, जिनमें ज्यादातर गरीब और मुस्लिम बहुल इलाकों के थे। मानवाधिकार समूहों ने इसे "टारगेटेड तोड़फोड़" कहा, जिससे साम्प्रदायिक तनाव बढ़ा।

मंदिर-मस्जिद विवाद

सम्भल, अयोध्या और अन्य स्थानों पर धार्मिक स्थलों को लेकर बढ़ते विवादों ने ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया। योगी ने इसे ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने की कोशिश बताया, लेकिन इसने मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना को बढ़ाया। सरकारी नीतियां, जैसे बुलडोजर कार्रवाई और "लव जिहाद" कानून, अल्पसंख्यकों में भय और अविश्वास पैदा करती हैं, जिससे सामाजिक एकता कमजोर हुई है। हिंदू-मुस्लिम विवाद त्योहारों, जुलूसों और धार्मिक स्थलों पर केंद्रित हो गए हैं।

विपक्ष का आरोप है कि भाजपा सांप्रदायिक मुद्दों को भुनाकर वोटबैंक मजबूत करती है। संभल और बहराइच जैसी घटनाओं को चुनावी ध्रुवीकरण से जोड़ा गया है। योगी के नेतृत्व में बड़े सांप्रदायिक दंगे कम हुए हैं, लेकिन साम्प्रदायिक तनाव और हिंदू-मुस्लिम विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुए। विपक्ष का आरोप है कि योगी के कार्यकाल में तनाव और ध्रुवीकरण के नए रूप उभरे हैं, जो दीर्घकालिक शांति के लिए चिंता का विषय हैं।

रिपोर्ट और संपादनः यूसुफ किरमानी

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