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फ़िलिस्तीनियों के कत्लेआम की छूट अमेरिका ने दे रखी है?

फ़िलिस्तीनियों के कत्लेआम की छूट अमेरिका ने दे रखी है?

फिलिस्तीन की नस्लकुशी में अमेरिका को क्यों न शामिल माना जाए...ये सवाल पश्चिम के तमाम साम्राज्यवादी स्वनामधन्य चिन्तक नहीं कर रहे हैं। लेकिन यह सवाल भारत का ही कोई चिन्तक कर सकता है। सत्य हिन्दी के स्तंभकार अपूर्वानंद को पढ़िए और जानिए कि उन्होंने फिलिस्तीनियों की नस्लकुशी के लिए अमेरिका को क्यों जिम्मेदार ठहराया है?

“कुछ ज़्यादा ही फ़िलिस्तीनी मारे जा चुके हैं।” अमेरिका के विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकेन ने ग़ाज़ा पर कोई एक महीने की इज़राइली बमबारी के बाद अपनी चिंता जाहिर की। दुनिया के सामने उन्होंने अपना चेहरे का मानवीय हिस्सा तब घुमाया जब इज़राइली हमले में मारे गए फ़िलिस्तीनियों की तादाद 11000 पार कर गई थी। इनमें तक़रीबन आधे बच्चे थे।  ब्लिंकेन  के मुताबिक़ शायद यह कुछ ज़्यादा हो गया। तो उनके लिए मारे जाने वाले फ़िलिस्तीनियों की एक स्वीकार्य संख्या भी रही होगी जहाँ आकर इज़राइल को रुक जाना था। लेकिन इज़राइल के लिए ऐसी कोई हद नहीं है। उसे ब्लिंकेन की इस चिंता की भी कोई फ़िक्र नहीं है। वह ऐसा बिगड़ा बच्चा है जिसे मालूम है कि उसका सरपरस्त अमेरिका उसकी हर ज़िद मानने को बाध्य है। 

जब ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं, इज़राइल की फ़ौज ग़ज़ा के अस्पतालों को घेरकर उन पर गोले दाग रही है। ग़ज़ा के 35 में 18 अस्पतालों ने काम करना बंद कर दिया है। जो हो रहा है, उसकी क्रूरता को बयान करने में शब्द की हर शक्ति असहाय है क्योंकि भाषा भी एक हद तक ही क्रूरता बर्दाश्त कर सकती है। फिर भी एक पत्रकार का वर्णन पढ़कर हम शायद उसका कुछ अन्दाज़ कर पाएँ जो इज़राइल अभी ग़ज़ा में कर रहा है। क्रिस हेजेस लिखते हैं, “ मैं ‘अल जज़ीरा’ के अरबी सेवा के स्टूडियो में बैठा हूँ।  सामने ग़ज़ा से लाइव फीड आ रहा है। इज़राइल की ज़बरदस्त गोलीबारी के चलते अल जज़ीरा के रिपोर्टर ने उत्तरी ग़ज़ा छोड़कर दक्षिणी ग़ज़ा में शरण ली है। लेकिन उसने अपना कैमरा पीछे छोड़ दिया है। उसने उसका रुख़ ग़ज़ा के सबसे  बड़े स्वास्थ्य  केंद्र ‘अल शिफ़ा’  की तरफ़ क़रके छोड़ दिया है। रात का वक्त है। इज़राइली टैंक सीधे हस्पताल के अहाते पर गोले दाग रहे हैं। लाल लाल क्षैतिज कौंध। एक अस्पताल पर सोचा समझा हमला। जान बूझ कर किया गया युद्ध अपराध। सबसे असहाय असैनिकों का सोचा समझा क़त्लेआम, जिनमें बहुत बीमार और बच्चे शामिल हैं। और तब फीड आना बंद हो जाता है।

हम सब मॉनिटरों के सामने बैठे हैं। हम सब ख़ामोश हैं। हम जानते हैं कि इसका मतलब क्या है। बिजली नहीं। पानी नहीं। इंटरनेट नहीं। दवा की कोई सप्लाई नहीं। इंक्युबेटर में हर नवजात की मौत निश्चित है। हर डायलिसिस के मरीज़ का मरना तय है। हर कोई जिसे इमरजेंसी सर्जरी चाहिए, उसका मरना तय है। जिसे ऑक्सीजन चाहिए, हर वैसे मरीज़ का मरना तय है। और लगातार होने वाली बमबारी ने जिन 50000 लोगों को  अनेक घरों से भागने को मजबूर कर दिया है, और जिन्होंने अस्पताल के अहाते और मैदान में पनाह ली है, उनका क्या होगा? इसका जवाब भी हमें मालूम है। उनमें से भी ज़्यादातर मारे जाएँगे।

हम जो देख रहे हैं, उसे व्यक्त करने को शब्द नहीं हैं। इन 5 हफ़्तों की वहशत में यह वहशत का चरमबिंदु है। यूरोप की बेहिसी अपने आप में काफ़ी बुरी है। अमेरिका की सक्रिय मिलीभगत नाकाबिले तसव्वुर है।  कुछ भी इसे जायज़ नहीं बना सकता। कुछ भी। जो बाइडेन को इतिहास इस नस्लकुशी में शरीक के तौर पर याद रखेगा। ख़ुदा करे कि जिन हज़ारों बच्चों के क़त्ल में उसने हिस्सेदारी की है, उनके प्रेत उसे उसकी बाक़ी ज़िंदगी सताते रहें।


इज़राइल और अमेरिका इस दुनिया को एक भयानक पैग़ाम  दे रहे हैं। …हम तुम्हारे मोहल्लों और शहरों को बम से तबाह कर देंगे। हम जैसे चाहें, तुम्हारे बच्चों, औरतों, बूढ़ो और लाचार लोगों का क़त्ल करेंगे। हम तुम्हारी नाकेबंदी करेंगे कि तुम भूख से या बीमारियों से मर जाओ। तुम इस ज़मीन  की कमतर नस्ल हो, कुछ भी नहीं। तुम कीड़े हो जिन्हें कुचल दियाजाना चाहिए। हमारे पास सब कुछ है।अगर इसमें तुमने कुछ भी लेने की कोशिश की, हमतुम्हें मार डालेंगे। और हम इसके लिए कभी ज़िम्मेवार नहीं ठहराए जाएँगे।”

इज़राइल अपना इरादा छिपा नहीं रहा। उसका इरादा ग़ज़ा को फ़िलिस्तीनियों से ख़ाली करके उस पर पूरा क़ब्ज़ा करने का है। उसके कृषि मंत्री ने साफ़ कहा है कि इज़राइल दूसरा नक़बा शुरू कर रहा है। 1948 के बचे काम को अब हमास के विनाश के नाम पर पूरा किया जाना है। इज़राइल के सरकार के मंत्रियों ने बार बार कहा है कि वे हरेक फ़िलिस्तीनी को दहशतगर्दी में शरीक मानते हैं, इसलिए हर कोई मार डाले जाने लायक़ है।


बच्चों को मारे जाने पर जो दुनिया भर से हाहाकार उठ रहा है, उसका जवाब देने के लिये इज़राइल के राष्ट्रपति ने टेलीविज़न पर एक भयानक और हास्यास्पद तर्क पेश किया। उन्होंने अरबी में हिटलर की आत्मकथा की प्रति दिखलाकर दावा किया कि यह बच्चों के कमरे से बरामद हुई है। इसका क्या मतलब? उनके मुताबिक़ ग़ज़ा में हिटलर के शागिर्द छिपे हुए हैं इसलिए इज़राइल की मजबूरी है कि वह उन्हें ख़त्म करे। अगर इसमें बच्चे मारे जाते हैं तोउनका क्या क़सूर?

लेकिन इसके काफ़ी आगे जाकर यह कहने वाले ज़ियानवादी इस्राइली मौजूद हैं कि ग़ज़ा में बचपन से ही यहूदी घृणा की शिक्षा दी जाती है, इसलिए बच्चों को भी दुश्मन माना जानाचाहिए और उसने भी दुश्मन जैसा बर्ताव होना चाहिए।

ज़ियानवादियों ने अभी से ग़ज़ा का नया नक़्शा बनाना शुरू कर दिया है। अमेरिका और यूरोप में रहने वाले ज़ियानवादी चीख चीख कर धमकी दे रहे हैं कि वे सारे अरब लोगों को मार डालना चाहते हैं और ग़ज़ा से पश्चिमी तट तक के इलाक़ों को इज़राइल में मिला लेना चाहते हैं।


ब्लिंकेन हों या फ़्रांस के प्रधानमंत्री, इज़राइल की 1 महीने की अंधाधुंध बमबारी और क़त्लेआम के बाद अगर अब यह कह रहे हैं कि यह कुछ ज़्यादा हो रहा है तो इसकी एक वजह यह है कि ग़ज़ा में इज़राइल के क़त्लेआम के ख़िलाफ़  इन मुल्कों की जनता लाखों की तादाद में सड़कों पर उतरकर अपनी सरकारों पर क़ातिलों का साथ देने के लिए लानत भेज रही है। अरब मुल्कों की भीतर जनता का ग़ुस्सा उबल रहा है। इन मुल्कों के तानाशाहों के लिए भी, जिन्होंने अमेरिका और इज़राइल से गलबहियाँ कर रखी है, इस जनता के इस क्रोध को नज़रअन्दाज़ करना मुश्किल है। लेकिन हाल की बैठक में इज़राइल को इस जंगबाजी से रोकने केलिए  हाल की बैठक में इन मुल्कों के नेता कोई प्रभावी कदम नहीं उठा सके। तो अमेरिका या इंग्लैंड की तरह ये मुल्क भी फ़िलिस्तीनियों के क़त्लेआम में शरीक माने जाएँगे।

जब इस टिप्पणी का आख़िरी हिस्सा लिखा जा रहा है, ‘अल शिफ़ा’ हस्पताल के प्रमुख का बयान ‘अल जज़ीरा’ प्रसारित कर रहा है। उनके मुताबिक़ अस्पताल के ऊपर ड्रोन चक्कर लगा रहे हैं जो हर किसी को निशाना बना रहे हैं।

लेकिन अगर इज़राइल का तर्क यह है कि ग़ज़ा में हमास छिपा हुआ जिसे वह खोज रहा है तो पश्चिमी तट में वह क्यों फ़िलिस्तीनियों पर ज़ुल्म ढा रहा है? क्यों उनके घरों पर क़ब्ज़ा किया जा रहा है, क्यों उन्हें गिरफ़्तार किया जा रहा है, क्यों उनका क़त्ल किया जा रहा है? इरादा साफ़ है। अमेरिका भी इसे जानता है लेकिन मध्यपूर्व में एक लठैत उसे चाहिए और वह इज़राइल ही है । उसके ‘हितों’ की हिफ़ाज़त करने के बदले इज़राइल को फ़िलिस्तीनियों का क़त्लेआम करने की छूट अमेरिका ने दे रखी है। लेकिन अमेरिका को क्या इस जुर्म की क़ीमत कभी न देनी होगी?

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