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राजनीति में दबकर रह गया सुशांत की मौत का मामला

राजनीति में दबकर रह गया सुशांत की मौत का मामला

सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या की थी या उनकी हत्या हुई थी, इसकी जाँच में देशी की सबसे बड़ी तीन एजेंसियाँ- सीबीआई, ईडी और एनसीबी लगी रहीं लेकिन अब तक कोई नतीजा नहीं निकला? आख़िर इतना हंगामा क्यों हुआ था?

पिछले साल 14 जून को बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत का शव उनके बांद्रा स्थित फ्लैट में मिला था। अब एक साल से ज़्यादा समय हो चुका है। सुशांत सिंह ने आत्महत्या की या उनकी हत्या हुई, इसकी जाँच में देशी की सबसे बड़ी तीन एजेंसियाँ- सीबीआई, ईडी और एनसीबी लगी रहीं। इससे पहले महाराष्ट्र और बिहार पुलिस भी जुटी रही थी। कई महीने तक कई टीवी चैनल यह दावा करते रहे कि सुशांत की हत्या हुई। लेकिन इसका क्या नताज़ा निकला?

सुशांत सिंह की मौत की ख़बर सामने आते ही बॉलीवुड समेत पूरे देश में सनसनी मच गई थी। उस समय सुशांत के परिवार वालों और मित्रों ने दावा किया था कि सुशांत की मौत महज खुदकुशी नहीं हैं, बल्कि उनकी हत्या की गई है। सुशांत की मौत पर जमकर राजनीति भी हुई थी। महाराष्ट्र में कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना ने बीजेपी पर सुशांत की मौत पर राजनीति करने का आरोप लगाया था। बीजेपी लगातार महाराष्ट्र सरकार पर दबाव बना रही थी कि सुशांत की मौत के मामले को सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया जाए लेकिन महाराष्ट्र की महा विकास आघाडी सरकार इस बात पर अड़ी हुई थी कि इस मामले की जांच मुंबई पुलिस ही करे।

महाराष्ट्र के तत्कालीन गृहमंत्री अनिल देशमुख इस केस को लेकर उस समय बहुत गंभीर थे। सुशांत की मौत के मामले की जांच को लेकर कोई भी जानकारी अनिल देशमुख ही मीडिया के साथ शेयर किया करते थे। अनिल देशमुख ने ‘सत्य हिंदी’ से एक्सक्लूसिव बातचीत में इस मौत से जुड़े हुए कई राज खोले। देशमुख का कहना है सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या की थी, यह मुंबई पुलिस ने 10 दिन में ही अपनी जांच के बाद बता दिया था लेकिन बीजेपी इस मामले को बेवजह तूल दे रही थी। दरअसल, कुछ दिनों बाद ही बिहार में विधानसभा के चुनाव थे और बीजेपी के पास कोई चुनावी मुद्दा नहीं था जिसके ज़रिए वह लोगों के बीच जाएँ। देशमुख ने बताया कि बीजेपी ने कांग्रेस और आरजेडी को सरकार से दूर रखने के लिए सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री से बात की थी, और इसका असर यह हुआ कि नीतीश कुमार ने इस केस की जाँच का ज़िम्मा सीधे बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे को सौंप दिया। गुप्तेश्वर पांडे इस केस को सीधे पटना से मॉनिटर कर रहे थे।

देशमुख ने आगे बताया कि उन्होंने खुद सुशांत सिंह राजपूत के पिता के के सिंह से बात की थी और उन्हें हर संभव मदद का भरोसा दिया था। देशमुख ने आगे कहा कि के के सिंह अगर चाहते तो मुंबई में ही मामला दर्ज करा सकते थे लेकिन पटना में मामला दर्ज कराने के पीछे की वजह बीजेपी के कुछ नेताओं का दबाव रहा। क्योंकि महाराष्ट्र सरकार सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में सीबीआई जाँच से इनकार कर चुकी थी इसलिए महाराष्ट्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए इस केस में दूसरी एफ़आईआर पटना में दर्ज कराई गई ताकि इस केस को सीबीआई को ट्रांसफर कर सके। हुआ भी कुछ ऐसा ही कि सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुँचने के बाद आख़िरकार इस मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया गया।

देशमुख ने कहा कि जिस मामले की जाँच मुंबई पुलिस ने 10 दिन में ही कर दी थी और जिस केस को एम्स की रिपोर्ट भी साबित कर चुकी है कि यह सिर्फ़ आत्महत्या का मामला है उसी केस की जांच सीबीआई एक साल में भी नहीं कर पाई है।

उन्होंने कहा कि इसका सीधा मतलब यह है कि सुशांत केस को बीजेपी ने सिर्फ़ चुनाव के लिए इस्तेमाल किया था।

दरअसल, इस केस में 30 जून से राजनीति शुरू हुई। पॉपुलर एक्टर और कॉमेडियन शेखर सुमन और सुशांत के दोस्त संदीप सिंह 30 जून को सुशांत सिंह राजपूत के परिवार से मिलने पटना पहुँचे थे। घरवालों से मुलाक़ात करने के बाद शेखर सुमन ने उन्हीं के घर के बाहर आरजेडी के नेता और बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। बस यहीं से इस मामले में राजनीति शुरू हुई। लोक जनशक्ति पार्टी के तत्कालीन प्रमुख और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान ने यह कहकर सुशांत मामले को हवा दे दी कि आने वाले बिहार चुनाव में सुशांत की मौत एक मुद्दा बन सकती है। सुशांत का परिवार बीजेपी के क़रीब है और ऐसे में कहा जा रहा था कि उनके नाम को बिहार में भुनाने की तैयारी चल रही है।

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बिहार विधानसभा चुनाव से पहले यह पोस्टर वायरल हुआ था।

बिहार में चुनाव के दौरान रैलियों में सुशांत के इंसाफ के लिए गुहार लगाई जा रही थी और महाराष्ट्र की सरकार पर जमकर हमला बोला जा रहा था। बीजेपी और जेडीयू की रैलियों में न केवल सुशांत के पोस्टर लहराए जाते थे बल्कि उनको इंसाफ देने की भी बात कही जाती थी। लेकिन जैसे ही चुनाव ख़त्म हुआ वैसे ही सुशांत को इंसाफ़ देने का मामला भी ठंडे बस्ते में चला गया। अब कोई भी राजनीतिक दल का नेता सुशांत का नाम तक नहीं ले रहा है।

महाराष्ट्र में भी उद्धव ठाकरे की महा विकास आघाडी सरकार को घेरने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अपने तमाम सिपहसालारों को लगा दिया। उस समय टेलीविजन पर सिर्फ़ एक ही ख़बर चलती थी- ‘सुशांत सिंह राजपूत को इंसाफ दो’।

लेकिन इंसाफ का यह सफर इतना लंबा हो जाएगा यह किसी ने भी नहीं सोचा था।  महाराष्ट्र सरकार ने भी इसे अहम का मुद्दा बना लिया और किसी भी कीमत पर इस केस को सीबीआई को ट्रांसफर नहीं करने का फ़ैसला कर लिया था। मामले ने नाटकीय रूप तब ले लिया जब मुंबई पुलिस पर पटना पुलिस को सहयोग न देने और रिया को मदद करने के आरोप लगे। जाँच के लिए मुंबई पहुँचे पटना सिटी एसपी विनय तिवारी को जबरन 14 दिनों के लिए क्वारंटाइन कर दिया गया। इससे ऐसा लगा कि महाराष्ट्र सरकार इस मामले में कुछ छिपाना चाहती है और महाराष्ट्र में बीजेपी ने यह दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया कि महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार सुशांत के दोषियों को बचाने का प्रयास कर रही है।

महाराष्ट्र में बीजेपी तो सुशांत की मौत के मामले की जाँच सीबीआई से कराने की मांग कर ही रही थी उधर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी इस मामले को सीबीआई के हवाले करने की मांग कर दी। महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे इसके ख़िलाफ़ थे। उद्धव ठाकरे ने नीतीश की इस मांग की निंदा करते हुए मुंबई पुलिस पर सवाल उठाने वालों पर घटिया राजनीति करने का आरोप लगाया।

मामले में जब जुड़ा आदित्य ठाकरे का नाम

सुशांत की मौत के मामले में अचानक ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बेटे और सरकार में मंत्री आदित्य ठाकरे का नाम जोड़ा जाने लगा। बीजेपी नेता और ठाकरे परिवार के धुर विरोधी नारायण राणे ने खुलासा किया था कि 13 जून (सुशांत की मौत से एक रात पहले) एक्टर डिनो मोरिया के घर में सुशांत और कुछ राजनेताओं की पार्टी रखी गई थी। पहले तो यह पार्टी डिनो के घर हुई फिर बाद में सभी सुशांत के घर पहुँच गए। नारायण राणे के अनुसार इस पार्टी में आदित्य ठाकरे भी शामिल थे। नारायण राणे और उनके बेटे नीतेश राणे ने आदित्य ठाकरे पर आरोप लगाते हुए कहा कि इस मामले में आदित्य ठाकरे की भूमिका संदिग्ध है, यही कारण है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इस मामले की जाँच सीबीआई से कराने से बच रहे हैं।

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शिवसेना प्रवक्ता आनंद दुबे का कहना है कि बीजेपी का मक़सद कभी भी सुशांत को न्याय दिलाने के लिए नहीं रहा, बल्कि इस मामले को उसने बिहार चुनाव में भुनाने के लिए इस्तेमाल किया था। आनंद दुबे का कहना है कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई एक साल बाद भी यह पता लगाने में नाकाम है कि सुशांत की मौत की मिस्ट्री आख़िर क्या है। आनंद दुबे ने सीबीआई पर व्यंग करते हुए कहा कि शायद सीबीआई बिहार में 2025 में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव का इंतज़ार कर रही है कि उस समय जाँच में कोई ठोस नतीजा निकल सके और फिर एक बार इस मामले को मुद्दा बनाया जा सके।

ऐसे में सवाल है कि आख़िरकार राजनीतिक पार्टियाँ कब तक ऐसे ही किसी की मौत पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकती रहेंगी और जनता को गुमराह करती रहेंगी।

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