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केरल के राज्यपाल विधेयकों पर 2 साल तक क्या कर रहे थे: सुप्रीम कोर्ट

केरल के राज्यपाल विधेयकों पर 2 साल तक क्या कर रहे थे: सुप्रीम कोर्ट

विपक्ष शासित राज्यों में आख़िर राज्यपालों द्वारा विधेयकों को वर्षों तक रोके जाने के मामले क्यों सामने आ रहे हैं? जानिए, सुप्रीम कोर्ट एक के बाद एक राज्यपालों को फटकार क्यों लगा रहा है।

तमिलनाडु और पंजाब के बाद अब केरल के राज्यपाल की बारी है। केरल विधानमंडल से पारित विधेयकों पर दो साल तक राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के बैठे रहने पर नाराजगी जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह अब यह दिशा-निर्देश तय करने पर विचार कर रहा है कि राज्यपाल सहमति के लिए विधेयकों को भारत के राष्ट्रपति के पास कब भेज सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ऐसे ही सवाल तमिलनाडु के राज्यपाल से भी पूछे थे। तमिलनाडु सरकार ने यह आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया कि राज्यपाल ने खुद को राज्य सरकार के लिए राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश किया है। कोर्ट से नोटिस के बाद तमिलनाडु राज्यपाल के सक्रिय होने पर सवाल उठाते हुए पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश 10 नवंबर का था और राज्यपाल ने 13 नवंबर को विधेयकों का निपटारा कर दिया। इसने कहा कि इसका मतलब है कि कोर्ट के आदेश के बाद कार्रवाई हुई, विधेयक 2020 से लंबित थे, राज्यपाल तीन साल से क्या कर रहे थे?

पंजाब के मामले में भी शीर्ष अदालत ने सख़्त टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित को 19 और 20 जून को आयोजित सत्र के दौरान विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। इसने कहा था कि राज्यपाल की शक्ति का उपयोग कानून बनाने के सामान्य रास्ते को बाधित करने के लिए नहीं किया जा सकता है।

बहरहाल, अब केरल के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ऐसी ही सख्त टिप्पणी की है। यह देखते हुए कि केरल के राज्यपाल ने आठ विधेयकों के संबंध में निर्णय ले लिए हैं, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कानूनों पर चर्चा करने के लिए मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और संबंधित मंत्री से मिलने के लिए कहा।

मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्यपाल कार्यालय की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी की दलीलों को सुना जिसमें कहा गया कि आठ विधेयकों में से सात को राष्ट्रपति द्वारा विचार के लिए आरक्षित किया गया है, जबकि एक को राज्यपाल ने सहमति दे दी है। इस पर पीठ ने पूछा, 'राज्यपाल दो साल तक बिल दबाकर क्या कर रहे थे?'

अटॉर्नी जनरल ने कहा कि वह विस्तार में नहीं जाना चाहते क्योंकि ऐसा करने से कई सवाल खुल जाएंगे। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार पीठ ने कहा, 'हम इस पर गहराई से विचार करेंगे। यह संविधान के प्रति हमारी जवाबदेही के बारे में है और लोग हमसे इसके बारे में पूछते हैं।'

पीठ ने कहा कि हम रिकॉर्ड करेंगे कि राज्यपाल, मुख्यमंत्री और प्रभारी मंत्री दोनों के साथ विधेयक से संबंधित मामले पर चर्चा करेंगे। सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा, 'आइए हम उम्मीद करें कि कुछ राजनीतिक दूरदर्शिता राज्य पर हावी हो जाए और हमें उम्मीद है कि कुछ दूरदर्शिता कायम रहेगी। अन्यथा, हम यहां कानून बनाने और संविधान के तहत अपना कर्तव्य निभाने के लिए हैं।'

पीठ केरल सरकार द्वारा राज्य विधानसभा द्वारा पारित कई विधेयकों पर राज्यपाल द्वारा सहमति नहीं देने को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

बता दें कि तमिलनाडु के राज्यपाल के मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 200 के तहत किसी भी राज्य के राज्यपाल के पास तीन विकल्प होते हैं - उनके समक्ष प्रस्तुत विधेयकों पर सहमति देना, उस सहमति को रोकना या उसे भारत के राष्ट्रपति के पास भेजना। हाल ही में तमिलनाडु सरकार ने राज्यपाल द्वारा लौटाए गए 10 विधेयकों को दोबारा से पास कर दिया है। इसी संदर्भ में मुख्य न्यायाधीश ने पिछली सुनवाई के दौरान पूछा था कि क्या बिल दोबारा पारित होकर आने के बाद राज्यपाल उन्हें राष्ट्रपति को भेज सकते हैं? इस पर बताया गया कि अब राज्यपाल के लिए यह रास्ता नहीं खुला है और वह अपने विकल्प का इस्तेमाल कर चुके हैं।

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