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मौके पर चौका स्वामी की पुरानी खासियत है 

मौके पर चौका स्वामी की पुरानी खासियत है 

सुब्रमण्यम स्वामी की राजनीति को समझना आसान नहीं है। अगर कोई बात या कदम उनके मन का नहीं हुआ तो वो उस मामले में पीछे पड़ जाते हैं।  कभी वो जिसके बहुत खिलाफ होते हैं, कई बार उसके पक्ष में भी आ जाते हैं। उनके बयान कब किस तरफ चले जाएं, कोई नहीं जानता। संजय कुमार सिंह ने इसी पर नजर डाली है। 

इंडिया टीवी के अनुसार सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया और राहुल गांधी के लिए जेल जाना तय है। इस मामले में मेरी जानकारी सुब्रमण्यम स्वामी से कम है पर यह तय है कि वो बीजेपी सांसद रहे हैं, केंद्र में बीजेपी की सरकार है और गुजरे कई वर्षों में बहुत सारे फैसले बीजेपी सरकार के पक्ष में हुए हैं। जजों को इनाम मिलने के उदाहरण भी हैं लेकिन चर्चा सुब्रमण्यम स्वामी की हो रही है। लेकिन वह नहीं जो उनके खिलाफ है। पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरमन ने अपनी किताब, माई प्रेसिडेंशियल ईयर्स में स्वामी से संबंधित एक मामले का जिक्र किया है। पेश है उस अंश का हिन्दी अनुवाद, पुस्तक के हिन्दी संस्करण, "जब मैं राष्ट्रपति था" में जैसा है। 

".... अक्टूबर के शुरू में मेरे पास एक और फाइल आई जिसमें रुखसाना सुब्रमण्यम स्वामी को दिल्ली हाईकोर्ट का अतिरिक्त जज बनाने की सिफारिश थी। इस फाइल पर सभी संवैधानिक अधिकारियों की सिफारिश दर्ज थी। श्रीमती स्वामी ने बार में दस साल चार माह पूरे कर लिए थे। यह समय संविधान द्वारा तय न्यूनतम अर्हता से कुछ ही महीने ज्यादा है। 1989-1990 के दौरान उनकी आय 20,000 रुपये प्रतिमाह बताई गई थी। दिल्ली हाईकोर्ट में कई और महिलाएं प्रैक्टिस कर रही थीं जो ज्यादा बेहतर थीं और जिनकी आय भी ज्यादा थी। उन सभी को नजरअंदाज करके श्रीमती स्वामी जैसी महिला की नियुक्ति बार का निरादर करना था। इसलिए मैंने पुनर्विचार के लिए वह फाइल प्रधानमंत्री  को लौटा दी। डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने संसद के केंद्रीय कक्ष में और बाहर मेरे खिलाफ अभियान छेड़ दिया। जिसे मैंने नजरअंदाज किया। मुझे अपनी इच्छा के विरुद्ध काम करने के लिए कभी दबाया या मनाया नहीं गया था।"  काश जांच इसकी भी होती और इतने समय में व्यवस्था दुरुस्त की गई होती। 

इसी तरह, ईवीएम पर अंग्रेजी में स्वामी की एक किताब है, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन : असंवैधानिक और छेड़छाड़ करने योग्य। कहने की जरूरत नहीं है कि वे अब ईवीएम की बात नहीं करते हैं। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी तो स्वामी ने पत्रकार विनीत नारायण के ब्रज फाउंडेशन पर भी आरोप लगाए थे और इसकी भी खबरें खूब छपी थीं। इस पर भड़ास4मीडिया ने विनीत नारायण से इंटरव्यू के वीडियो का शीर्षक लगाया था, "सुब्रमण्यम स्वामी अब अपनी धोती संभालें : विनीत नारायण"। स्वामी के बारे में विनीत नारायण का लिखा 15 अक्टूबर 2018 को पंजाब केसरी में छपा था। 

मीडिया को गुमराह करते हैं सुब्रमण्यम स्वामी शीर्षक से प्रकाशित इस आलेख में विनीत ने लिखा है, इतना ही नहीं दुनियाभर में ऐसे तमाम लोग हैं, जिन्हें डा. स्वामी ने यह झूठ बोलकर कि वे राम जन्मभूमि के लिए सर्वोच्च अदालत में मुकदमा लड़ रहे हैं, उनसे कई तरह की मदद ली है। कितना रुपया ऐंठा है, ये तो वे लोग ही बताएंगे। पर हकीकत ये है कि डा. स्वामी का राम जन्मभूमि विवाद में कोई ‘लोकस’ ही नहीं है। पिछले दिनों सर्वोच्च अदालत ने ये साफ कर दिया है कि राम जन्मभूमि विवाद में वह केवल उन्हीं लोगों की बात सुनेंगी, जो इस मामले में भूमि स्वामित्व के दावेदार हैं। यानि डा. स्वामी जैसे लोग अकारण ही बाहर उछल रहे हैं और तमाम तरह के झूठे दावे कर रहे हैं कि वे राम मंदिर बनवा देंगे। जबकि उनकी इस प्रक्रिया में कोई कानूनी भूमिका नहीं है।

बीबीसी की एक खबर के अनुसार, सोनिया गांधी को मुश्किल में डालने वाले स्वामी ने 1999 में वाजपेयी सरकार को गिराने की कोशिश की थी। इसके लिए उन्होंने सोनिया और जयललिता की अशोक होटल में मुलाक़ात भी कराई। हालांकि ये कोशिश नाकाम हो गई। इसके बाद वे हमेशा गांधी परिवार के ख़िलाफ़ ही नज़र आए। एक समय में स्वामी राजीव गांधी के नजदीकी दोस्तों में भी थे। बोफोर्स कांड के दौरान वे सदन में सार्वजनिक तौर पर ये कह चुके थे कि राजीव गांधी ने कोई पैसा नहीं लिया है। इसी खबर के अनुसार इंदिरा गांधी की नाराजगी के चलते स्वामी को दिसंबर, 1972 में आईआईटी दिल्ली की नौकरी गंवानी पड़ी। बाद में वे मुकदमा जीत गए थे पर इस्तीफा दे दिया। 

नानाजी देशमुख ने स्वामी को जनसंघ की ओर से राज्यसभा में 1974 में भेजा। आपातकाल के 19 महीने के दौर में सरकार उन्हें गिरफ़्तार नहीं कर सकी। इस दौरान उन्होंने अमेरिका से भारत आकर संसद सत्र में हिस्सा भी ले लिया और वहां से फिर ग़ायब भी हो गए। 1977 में जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे। 1990 के बाद वे जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे। 11 अगस्त, 2013 को उन्होंने अपनी पार्टी का विलय भारतीय जनता पार्टी में कर दिया। जुलाई 2019 की एक खबर के अनुसार, बैंकों को तकरीबन 9000 करोड़ रुपए का चूना लगाकर फरार विजय माल्या के मामले में बीजेपी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद ने इस मामले में अरुण जेटली को घेरना शुरू कर दिया है। उन्होंने इस मामले में सीबीआई का बचाव करते हुए कहा कि माल्या मामले में ठीकरा सीबीआई पर फोड़ना गलत है।

सीबीआई के उस समय के ज्वाइंट डायरेक्टर एके शर्मा का बचाव करते हुए स्वामी ने कहा था कि लुक आउट नोटिस को रद्द करने का ठीकरा सीबीआई पर फोड़ना गलत है, शर्मा बेहतर अधिकारी हैं, ऐसे में इस मामले की जांच होनी चाहिए कि आखिर शीर्ष पद पर बैठे किस व्यक्ति ने उन्हें ऐसा करने के लिए कहा था। इससे पहले स्वामी ने कहा था कि विजय माल्या के बयान ने वित्त मंत्री अरुण जेटली पर संदेह पैदा किया है, इसलिए मामले की जांच जरूरी है। स्वामी ने कहा था कि माल्या के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी हुआ था और यह नोटिस 24 अक्टूबर 2015 को जारी किया गया था। अब उनकी दिलचस्पी इन मामलों में नहीं है। और कहने की जरूरत नहीं है कि यही राजनीति है।

(साभार : संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से)

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