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पीएम फ़सल बीमा पर शिवसेना ने उठाया सवाल, विपक्ष चुप क्यों?

पीएम फ़सल बीमा पर शिवसेना ने उठाया सवाल, विपक्ष चुप क्यों?

महाराष्ट्र और केंद्र सरकार में बीजेपी की सहयोगी शिवसेना ने प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना पर सवाल उठाए हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि राज़्य में विपक्ष की दोनों पार्टियाँ इस पर अभी तक खामोश क्यों हैं?

लोकसभा चुनाव में रफ़ाल घोटाले का आरोप कुछ असर नहीं दिखा पाया, लेकिन जिस घोटाले को रफ़ाल से बड़ा बताकर पत्रकार और किसान कार्यकर्ता पी. साईनाथ ने देश का ध्यान उसकी तरफ़ खींचा था वह क्या आने वाले महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में रंग दिखा पाएगा? उन्होंने प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना को लेकर सवाल उठाए थे। पी. साईनाथ महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में सक्रिय हैं और इस बार के चुनाव में विदर्भ बड़ी भूमिका निभाने वाला है। इसलिए प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना को विपक्ष कितना बड़ा मुद्दा बना पायेगा यह आने वाला वक़्त ही बता पायेगा। लेकिन राज्य और केंद्र सरकार में भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी शिवसेना ने प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना पर जो सवाल विधानसभा सत्र शुरू होने से ठीक दो दिन पहले खड़ा कर दिया है उसने राजनीति के गलियारों में नयी चर्चाएँ छेड़ दी हैं। शिवसेना द्वारा प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना पर जिस तरह से सवाल उठाया गया उसने पी. साईनाथ के उस कथन को भी बल दे दिया है जिसमें उन्होंने फ़सल बीमा योजना को बड़ा घोटाला क़रार दिया था। 

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सेना भवन में अपनी पार्टी के सभी ज़िला प्रमुखों की बैठक में फ़सल बीमा योजना को लेकर बताया कि कैसे बैंक खाता नंबर की ग़लती की वजह से औरंगाबाद ज़िले में ही 10 हज़ार से ज़्यादा किसानों को बीमा की राशि नहीं मिली।

किसानों को फँसाया गया: मंत्री

उद्धव ठाकरे ने सभी ज़िला प्रमुखों को अगले पाँच दिनों में मदद केंद्र (किसान आधार केंद्र) शुरू करने का आदेश दिया है। इन मदद केंद्रों पर किसानों से एक फ़ॉर्म भरवाया जाएगा। इसके बाद जिन किसानों के साथ अन्याय हुआ है उनको न्याय दिलाने का काम बैंकों और बीमा कंपनियों के माध्यम से किया जाएगा। बैठक में शिवेसना नेता व प्रदेश के पर्यावरण मंत्री रामदास कदम ने कहा कि प्रदेश में फ़सल बीमा योजना को लेकर किसानों को बड़े पैमाने पर फँसाया गया है। फ़सल बीमा योजना के लिए ग़लत तरीक़े से फ़सलों के नुक़सान का सर्वे किया जाता है। निजी बीमा कंपनियों द्वारा किसानों को कम पैसे दिए जाते हैं। शिवसेना ने यह दावा औरंगाबाद ज़िला पार्टी द्वारा शुरू किये गए एक मदद केंद्र के आँकड़ों के आधार पर किया है। औरंगाबाद में लगभग 6 लाख 72 हज़ार किसानों ने फ़सल बीमा कराया था। जिसमें से क़रीब 52 हज़ार किसानों को फ़सल बीमा का लाभ नहीं मिला। शिवसेना ने जब इस मदद केन्द्र पर किसानों से फ़ॉर्म भरवाए और सम्बंधित बीमा कंपनी से संपर्क किया तो उसे इस मामले में चौंकाने वाले तथ्य मिले। इनमें से 10 हज़ार किसानों के बैंक का खाता नंबर सही न होने के कारण लाभ नहीं मिल सका। 

शिवसेना ने जब बीमा कंपनी को उनके कॉमन सर्विस सेंटर की चूक बताई तो इसके बाद क़रीब 8500 किसानों को फ़सल बीमा का लाभ दिया गया। औरंगाबाद को सूखा प्रभावित ज़िला घोषित किया गया है फिर भी बीमा कंपनियों की ओर से बीमे की राशि बहुत ही कम दी गई है। जबकि यहाँ के किसानों को 80 से 90 प्रतिशत तक बीमा मिलना चाहिए था। 

मुनाफ़ा कमा रही हैं इंश्योरेंस कंपनियाँ

बता दें कि पत्रकार व किसान कार्यकर्ता पी. साईनाथ ने अहमदाबाद में हुए देश के कृषि क्षेत्र की समस्याओं और समाधान पर आधारित किसान स्वराज सम्मेलन में महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए कहा था, ‘क़रीब 2.80 लाख किसानों ने अपने खेतों में सोया उगाया था। एक ज़िले के किसानों ने 19.2 करोड़ रुपये का प्रीमियम अदा किया। इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकार की ओर से 77-77 करोड़ रुपये यानी कुल 173 करोड़ रुपये बीमा के लिए रिलायंस इंश्योरेंस को दिए जाते हैं।’ उन्होंने कहा, ‘किसानों की पूरी फ़सल बर्बाद हो गई और बीमा कंपनी ने किसानों को पैसे का भुगतान किया। एक ज़िले में रिलायंस ने 30 करोड़ रुपये दिए, जिससे बिना एक पैसा लगाए उसे कुल 143 करोड़ रुपये का लाभ मिला। अब इस हिसाब से हर ज़िले को किए गए भुगतान और कंपनी को हुए लाभ का अनुमान लगाया जा सकता है।’ महाराष्ट्र में क़रीब 37 ज़िलों में फ़सल बीमा का यह बड़ा नेटवर्क चल रहा है। और साईनाथ के इस फ़ॉर्मूले के हिसाब से जोड़ा जाए तो यह घोटाला हज़ारों करोड़ का है। 

क्या विपक्ष उठाएगा मुद्दा?

लेकिन सवाल यह उठता है कि विपक्ष की दोनों पार्टियाँ इस पर अभी तक खामोश क्यों हैं? मुद्दे को उठाया भी तो सरकार की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने। प्रदेश में बड़े पैमाने पर सूखा पड़ा है, ऐसे में इस बीमा घोटाले की वजह से किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार पिछले बीस साल यानी 1995 से 2015 के बीच 3.10 लाख किसानों ने आत्महत्या की। पिछले दो साल से किसान आत्महत्या के आँकड़ों को जारी नहीं किया जा रहा है। अब देखना यह है कि इस मुद्दे को लेकर आने वाले विधानसभा के आख़िरी अधिवेशन में विपक्ष क्या करता है? वह इस मुद्दे को किसानों या जनता के बीच ले जाता है या नहीं?

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