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क्या पर्दे के पीछे कोई चाल चल रहे थे शरद पवार?

क्या पर्दे के पीछे कोई चाल चल रहे थे शरद पवार?

महाराष्ट्र में रात के अंधेरे में जो अंधी राजनीति की गई और जिस तरह रातोंरात राज्य का सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन हो गया, क्या शरद पवार उससे बिल्कुल अनजान थे?

रात के अँधेरे में महाराष्ट्र का सत्ता समीकरण बदल गया। सुबह सब की आँख खुली तो लोगों ने देखा कि सत्ता का जो नया समीकरण था, उसका एक बड़ा मोहरा राजभवन में शपथ ले रहा है। 'मैं फिर से मुख्यमंत्री बनूँगा' कहने वाले देवेंद्र फडणवीस ने राजभवन में मुख्य मंत्री  और उनके साथ शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री की शपथ ली। राज्यपाल ने फडणवीस को 30 नवम्बर तक बहुमत बनाने का मौका दे दिया है। 

इससे इस बात की आशंकाएं बढ़ गयी हैं कि अब विधायकों की ख़रीद-फ़रोख्त का खेल भी खेला जाएगा। सुबह-सुबह की यह घटना एक राजनीतिक भूकंप जैसी रही, जिससे राज्य की राजनीति हिल गयी और इसका केंद्र रहा मुंबई। इस घटना के बाद भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ प्रदेश में नए राजनीतिक समीकरण के केंद्रबिंदु एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने अपना बयान ट्वीट किया। उन्होंने कहा कि 'यह निर्णय अजित पवार का निजी निर्णय है, राष्ट्रवादी कांग्रेस का नहीं।' 

सवाल दर सवाल

शरद पवार का यह बयान कई सवाल खड़े करता है। पहला यह कि क्या अजित पवार बिना उन्हें बताये इतना बड़ा निर्णय कर सकते हैं? दूसरा यह कि क्या अजित पवार के पास इतने विधायकों का समर्थन है कि वह एनसीपी से अलग एक स्वतंत्र गुट बनाकर राज्य की सरकार में शामिल हो सकते हैं? दोनों सवालों का जवाब शरद पवार ही दे सकते हैं। 

जो ख़बरें आ रही हैं वह यह कि शुक्रवार रात 9 बजे जब मुंबई के नेहरू सेंटर में तीनों दलों की बैठक ख़त्म हुई, अजित पवार अपना मोबाइल फ़ोन बंद कर संपर्क से बाहर हो गए थे।  

बताया जाता है कि इस पूरे घटनाक्रम की कहानी रात 9 बजे के बाद से ही लिखी गयी। जिन 15 या 18 विधायकों के अजित पवार के साथ जाने की बात कही जा रही है, वह कितना सच है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

राजनीतिक जानकार कह रहे हैं वह यह है कि यदि यह पूर्वनियजित हुआ होता तो इसकी ख़बर कहीं ना कहीं शरद पवार या अन्य दलों के नेताओं को मिल ही जाती। यानी जो कुछ भी हुआ है, वह अजित पवार के कुछ क़रीबी लोगों तक सीमित रहा?

विधायकों का समर्थन?

यदि 15 या 18 विधायक उनके साथ होते थे तो वे राजभवन में कहीं क्यों नहीं दिखाई दिए, यह भी एक सवाल है। अजित पवार का मोबाइल उस दिन भी बंद हो गया था, जब शरद पवार को ईडी का नोटिस आया था और पवार ईडी कार्यालय में जाने के लिए तैयार हुए थे। पूरे महाराष्ट्र के लोगों से उन्हें समर्थन मिला और उनकी लोकप्रियता चरम पर थी, लेकिन शाम होते- होते, अजित पवार के विधायक पद से इस्तीफ़े की खबर ने उस लोकप्रियता को ग्रहण लगा दिया था। कुछ देर बाद फिर अचानक अजित पवार प्रकट हुए थे और यह बोलते हुए सबके सामने आये कि शरद पवार का नाम ईडी में आया इसलिए उन्हें अच्छा नहीं लगा।

अजित पवार ने की ग़लती?

अब अजित पवार ने एक बार और झटका दिया है। यदि उन्होंने यह काम पवार को बिना बताए किया  है, तो यह अजित पवार की एक बड़ी राजनीतिक भूल भी हो सकती है। एक यह कि इससे एनसीपी में नए नेतृत्व की राह आसान हो जाएगी। यानी सुप्रिया सुले को महाराष्ट्र की राजनीति में स्थापित करने में शरद पवार को आसानी होगी। अजित पवार की जिद की वजह से सुप्रिया को आज तक पवार ने राष्ट्रीय राजनीति में ही लगाए रखा था। 

सरकार बनाने के लिए पिछले कई दिनों से चल रही बैठकों में सुप्रिया सुले उपस्थित रहीं हैं। एक दूसरी बड़ी बात है जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तो पवार और सुप्रिया सुले दिल्ली की राजनीति पर ही ज्यादा ध्यान देते थे। लिहाज़ा, महाराष्ट्र में एनसीपी में अजित पवार के समर्थकों का एक गुट बन गया था। 

शह-मात

लेकिन पिछले चुनाव में जिस तरह अजित पवार गुट के लोग या एनसीपी के बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ी, उसने पवार सहित हर बड़े नेता को हिला कर रख दिया था। दल-बदल के उस खेल में अजित पवार के ससुराल पक्ष के नेता भी भाजपा में शामिल हो गए थे। ऐसे में शरद पवार फिर खड़े हुए और उन्होंने अपने दमखम पर फिर से पार्टी को एक सम्मानजनक स्थान दिलाया। 

एनसीपी के जितने लोग इस बार चुनाव जीतकर आये हैं, वे सीधे पवार से जुड़े हुए हैं। अजित पवार गुट जैसा कोई विभाजन नहीं नज़र आता था। ऐसे में यदि शरद पवार चाहेंगे तो अजित पवार के साथ एक कुछ गिनती के विधायक भी नहीं बचेंगे।

राज ठाकरे के साथ क्या हुआ!

राजनीति में महत्वाकांक्षा अच्छी बात है, लेकिन इसका ज़्यादा होना हानिकारक भी होता है, इस बात के अनेक उदाहरण हैं। महाराष्ट्र में इस बात का सबसे बड़ा उदहारण ठाकरे परिवार से ही है। वहाँ बालासाहेब ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे पार्टी की कमान चाहते थे,  नहीं मिलने पर अलग पार्टी बनायी। उनकी पार्टी की क्या स्थिति है, किसी से छुपी नहीं है। यही हाल अजित पवार का भी हो सकता है।  

पवार की नयी ज़िम्मेदारी

अब नए घटनाक्रम में पवार की ज़िम्मेदारी और अधिक बढ़ सकती है। जो आशंकाएँ  स्थिर सरकार की नए गठबंधन को लेकर लगाई जा रही थीं, वे अब भाजपा -अजित पवार गठबंधन को लेकर भी लगाई जा रहीं हैं।  बीजेपी के साथ कितने निर्दलीय विधायक है, यह आँकड़ा अभी तक स्पष्ट नहीं है। शिवसेना भाजपा-एनसीपी और छोटी-छोटी पार्टियाँ जो कांग्रेस -एनसीपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ी हैं, यदि उनके विधायक बीजेपी की तरफ नहीं झुकते हैं तो बहुमत सिद्ध कर पाना मुश्किल है। शिवसेना के नेता संजय राउत ने इस बदले हुए घटनाक्रम को लेकर मीडिया के समक्ष बयान दिया कि यह महाराष्ट्र की जनता के साथ धोखा है। 

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