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जमानत को बढ़ावा देना चाहिए, न कि जेल में कैद को: सुप्रीम कोर्ट

जमानत को बढ़ावा देना चाहिए, न कि जेल में कैद को: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट आख़िर इससे क्यों चिंतित है कि जहाँ निचली अदालतों में जमानत को बढ़ावा मिलना चाहिए वहाँ जेल की कैद को बढ़ावा मिल रहा है? आख़िर ऐसे मामले क्यों बढ़ रहे हैं?

न्याय का एक मूल सिद्धांत यह भी होता है कि भले ही गुनहगार बच जाए, लेकिन बेगुनाह को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ इसी आधार पर जमानत और कैद को लेकर फ़ैसला दिया है। इसने कहा है कि जमानत को बढ़ावा देना चाहिए न कि जेल में कैद को। इसके साथ ही इसने इस पर चिंता जताई कि कई निर्देश देने के बावजूद निचली अदालतों द्वारा जमानत को प्रोत्साहित करने में अनिच्छा दिखी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी अदालतों की मानसिकता बदलने की ज़रूरत है।

शीर्ष अदालत ने कहा है कि यह देखते हुए कि अगर ज़मानत देने से इनकार करने के सैकड़ों कारण होते हैं तो जमानत देने के भी सैकड़ों कारण होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला काफ़ी अहम इसलिए है कि मौजूदा वक़्त में ऐसा देखने में आता रहा है कि छोटे मामलों में भी आरोपियों की गिरफ़्तारी आम बात हो गई है। ख़ासकर उन मामलों में जिनमें बदले की भावना से कार्रवाई की गई हो। पत्रकारों की रिपोर्टिंग जैसे मामले हों या राजनीतिक बदले की कार्रवाई के। हाल ही में तो सुप्रीम कोर्ट ने ही ईडी द्वारा छोटे-छोटे मामलों में भी ऐसी कार्रवाई पर चेतावनी दी है। 

सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को मनी लॉन्ड्रिंग को नियंत्रित करने के लिए क़ानून के अंधाधुंध उपयोग के ख़िलाफ़ चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसे तो क़ानून अपनी धार खो देगा। मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा था, 'आप धन शोधन निवारण अधिनियम को कमजोर कर रहे हैं। केवल इस मामले में नहीं। यदि आप इसे 10,000 रुपये के मामले और 100 रुपये के मामले में हथियार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू करते हैं, तो क्या होगा?' सीजेआई ने कहा, 'आप सभी लोगों को सलाखों के पीछे नहीं डाल सकते। आपको इसका उचित उपयोग करना होगा'।

सुप्रीम कोर्ट ने कई आदेशों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में माना है। टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार इसने गुरुवार को अपने फ़ैसले में कहा है कि उन मामलों में गिरफ्तारी नियमित तरीक़े से नहीं की जानी चाहिए जब आरोपी जांच में सहयोग कर रहा हो और यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि वह व्यक्ति फरार हो जाएगा या जांच को प्रभावित करेगा। 

अदालत ने अक्टूबर में अपने निर्देश में कहा था कि यदि किसी आरोपी ने जांच में सहयोग किया और जांच के दौरान उसे गिरफ्तार नहीं किया गया था तो उसे चार्जशीट दाखिल करते समय हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि एक ट्रायल कोर्ट भी चार्जशीट को स्वीकार करने से इनकार नहीं कर सकता क्योंकि आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया और अदालत के सामने पेश नहीं किया गया।

अपने इस आदेश को यह देखते हुए कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया गया, जस्टिस संजय किशन कौल और एमएम सुंदरेश की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट जो संकेत देना चाहता था वह नहीं पहुंचा है और निचली अदालतें जमानत देने में आशंकित हैं।

पीठ ने कहा, 'विचार जमानत को प्रोत्साहित करने का था, इसका उल्टा नहीं, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। यह सब मानसिकता के बारे में है। लेकिन मानसिकता जमानत से इनकार करने का तरीका खोजने की है। इसे बदलना होगा।'

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह परेशान करने वाला तथ्य है कि अदालतें मुख्य मुद्दों के बजाय केवल जमानत के मामलों को तय करने में काफी समय बिता रही हैं और जिन मामलों का फ़ैसला उच्च न्यायालयों को करना चाहिए था, वे सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचते हैं। पीठ ने कहा कि नतीजा यह है कि शीर्ष अदालत जमानत याचिकाओं से भर गई है। इसने कहा कि जमानत आवेदन को कम करने का प्रयास किया गया था, लेकिन वास्तव में इसमें वृद्धि हुई है।

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