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सबरीमला : सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लागू क्यों नहीं कर रही सरकार?

सबरीमला : सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लागू क्यों नहीं कर रही सरकार?

भगवान अयप्पा के दर्शन के लिए केरल के सबरीमला पहुँची 10 महिलाओं को मंदिर के पास से लौटा दिया गया है। पुलिस ने साफ़ कहा है कि वह इन महिलाओं को सुरक्षा नहीं दे सकती।

क्या केरल सरकार अपनी नीतियों, सिद्धांतों और विचारधारा से पीछे हट रही है? क्या मार्क्सवादियों की यह सरकार भगवान अयप्पा का भक्त बन गई है या वह स्थानीय राजनीति के दबाव में समझौतावादी नीति अख़्तियार कर रही है। राज्य के सबरीमला स्थित अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सरकार ने जो रवैया अपनाया है, उससे तो यही लगता है कि ये सवाल बेजा नहीं हैं। 

केरल के सबरीमला स्थित भगवान अयप्पा का मंदिर भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच शनिवार शाम खोल दिया गया। पुजारियों ने इसके गर्भगृह का दरवाजा भी खोल दिया। दो महीने तक चलने वाला मंडल पूजा उत्सव शुरू हो गया। आम जनता रविवार के पारंपरिक पूजा-अर्चना के बाद ही भगवान अयप्पा के दर्शन कर सकेगी। 

पर इस भीड़ में ख़ास निशाना बनाया जा रहा है 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को, जिन्हें मंदिर के अंदर नहीं घुसने दिया जाएगा। इसके लिए बहाना बनाया जा रहा है जैसा कि कल कुछ महिलाओं के साथ सबरीमला में किया गया। दक्षिण भारत के मंदिरों के दर्शन करने निकली महिलाओं की टोली जब सबरीमला पहुँची तो उन्हें कहा समझाया गया कि वे लौट जाएँ क्योंकि उनका प्रवेश वर्जित है। 

महिलाएँ मंदिर नहीं जा सकीं

सबरीमला जिस मथनमथिट्टा ज़िले स्थित है, उसके ज़िला कलेक्टर पी. बी. नूह ने पत्रकारों से बात करते हुए महिलाओं के एक जत्थे को वापस भेज देने की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि उस समय मंदिर में पारंपरिक विधि-विधान चल रहे थे, लिहाज़ा महिलाओं को मंदिर में जाने नहीं दिया गया, उन्हें लौट जाने को कहा गया। ये महिलाएं दक्षिण भारत की तीर्थयात्रा करते हुए यहाँ पहुँची थीं। 

इसके पहले सबरीमला मंदिर से 6 किलोमीटर दूर जिस पम्बा बेस से श्रद्धालु अपनी तीर्थयात्रा शुरू करते हैं, वहीं 10 महिलाओं को रोक  दिया गया, क्योंकि उनके पास इस तीर्थयात्रा का पारंपरिक बैग इरुमुदी नहीं था। उन्होंने आगे की यात्रा करने पर ज़ोर नहीं दिया और वहीं से लौट गईं। ये सभी महिलाएँ आंध्र प्रदेश से आई हुई थीं। 

मंदिर में 10 से 50 साल के उम्र की महिलाओं के प्रवेश से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से राज्य में खलबली मची हुई है। एक ओर जहाँ 36 महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करा रखा है, सरकार ने साफ़ तौर पर कह दिया कि वह महिलाओं को मंदिर दर्शन के लिए विशेष सुरक्षा मुहैया नहीं कराएगी। सरकार ने यह भी कहा है कि मंदिर किसी तरह के आन्दोलन की जगह नहीं है और ऐसे लोग न आएं जो सिर्फ़ आन्दोलन की नीयत से आते हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के 5 सदस्यों के खंडपीठ ने मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश से जुड़ी याचिका की सुनवाई के लिए 7 सदस्यों का बड़ा खंडपीठ बनाने को कहा है। इसका मतलब यह हुआ कि प्रस्तावित खंडपीठ के फ़ैसले तक मंदिर में किसी को जाने से नहीं रोका जा सकता है। इसके बाद सरकार ने कहा कि वह अदालत के आदेश का पालन करेगी। इस खंडपीठ में जस्टिस एफ़. आर. नरीमन, ए. एम खानविलकर, डी. वाई. चंद्रचूड़ और इन्दु मलहोत्रा भी शामिल थीं।

राज्य के देवासम मंत्री कडकमपल्ली सुरेंद्रन ने साफ़ तौर पर कह दिया है कि सरकार ऐसी महिलाओं को प्रोत्साहित नहीं करेगी जो महज प्रचार पाने और आन्दोलन के मक़सद से सबरीमला मंदिर जाएंगी।

उन्होंने यह भी कहा है कि जो महिलाएं मंदिर के अंदर जाना चाहती हैं, वे मंदिर में दाखिल होने की अनुमति अदालत से लेकर आएँ। 

पिछले साल इस मुद्दे पर ज़बरदस्त हंगामा हुआ था, हिंसा हुई थी। 

सीपीआईएम ने क्यों बदला रवैया?

सवाल यह उठता है कि सरकार यह क्यों कह रही है कि जो महिलाएँ मंदिर के अंदर जाना चाहती हैं, वे अदालत से आदेश ले कर आएं। सुरेंद्रन यह क्यों भूल रहे हैं कि सर्वोच्च अदालत ने अपने पहले के फै़सले में सभी महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी थी।

पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए पहले के आदेश को निरस्त नहीं किया गया है, बड़ी बेंच में इस पर फिर सुनवाई करने की बात कही गई है। यानी जब तक इस फ़ैसले को उलटा नहीं जाता, महिलाएं मंदिर में प्रवेश कर सकती है। फिर अदालत के आदेश की क्या जरूरत है?

इसी तरह सुरेंद्रन से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि इसका क्या मतलब कि मंदिर एक्टिविज़म यानी आन्दोलन की जगह नहीं है। यदि कोई महिला मंदिर जाना चाहती है तो यह उसका हक़ है और सुप्रीम कोर्ट ने इसकी पुष्टि कर दी है, इसे एक्टिविज़म या आन्दोलन क्यों कहा जा रहा है।

यह भी आश्चर्य की बात है कि आन्दोलन के बल पर जनता को लामबंद करने वाली सीपीआईएम के नेता आन्दोलन से परेशान हैं। इस मुद्दे पर तो ख़ुद सीपीआईएम के कार्यकर्ताओं ने महिलाओं को लामबंद किया था। फिर आज इस तरह की बातें क्यों कही जा रही हैं?

इसका उत्तर केरल की राजनीति और लोकसभा चुनावों में है। इस बार के लोकसभा चुनाव में केरल में सीपीआईएम ने 14 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, पर सिर्फ़ एक उम्मीदवार ही जीत पाया। पिछले लोकसभा चुनाव में इसके 8 सांसद वहां से थे। इस बार कांग्रेस ने 16 उम्मीदवार उतारे, 15 जीतने में कामयाब रहे। 

पर्यवेक्षकों के अनुसार पार्टी इस नतीजे से अंदर ही अंदर घबराई हुई है। उसे ऐसा लगता है कि सबरीमला मंदिर के मुद्दे पर उसका रवैया आम जनता नहीं स्वीकार कर सकी, वह उसके ख़िलाफ़ हो गई और तमाम लोगों ने कांग्रेस को वोट दिया। सेक्युलर कहे जाने वाले और ग़ैर-बीजेपी वोट भी कांग्रेस की ही झोली में जा गिरे। केरल की राजनीति में सीपीआईएम के सामने बीजेपी नहीं, कांग्रेस है। उसे वहाँ हर हाल में कांग्रेस को रोकना है। कांग्रेस की कामयाबी से तिलमिलाई पार्टी ने अपना रवैया बदल दिया। इसे वोट बैंक राजनीति की मजबूरी कहें, राजनीतिक चालाकी, मौकापरसती या समझौतावादी, पर पार्टी ने अपना स्टैंड बदल लिया है। इसी वजह से सरकार महिलाओं को लौटा रही है।

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