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‘स्वास्थ्य का अधिकार’ कानून राजस्थान ही नहीं पूरे भारत की जरूरत!

‘स्वास्थ्य का अधिकार’ कानून राजस्थान ही नहीं पूरे भारत की जरूरत!

स्वास्थ्य का अधिकार कानून राजस्थान में लागू करने पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) को मिर्च लग रही है। आम जनता की सेहत पर प्राइवेट अस्पतालों का एकाधिकार खत्म होने का डर सता रहा है। ऐसे कानून को देशभर में लागू करने की जरूरत है। आईएमए और प्राइवेट अस्पतालों के एकाधिकार के खिलाफ कब आवाज उठेगी। वंदिता मिश्रा ने जो मुद्दा इस लेख में उठाया है, राजनीतिक दलों को भी उसे अपना मुद्दा बनाना चाहिए। 

2018 में लैन्सेट जर्नल में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 24 लाख भारतीय प्रतिवर्ष सिर्फ इसलिए मर जाते हैं क्योंकि उन्हे खराब स्वास्थ्य सेवाएं मिलती हैं! जबकि प्रतिवर्ष 8 लाख से अधिक भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं की अपर्याप्तता की वजह से मर जाते हैं। खराब और अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं आर्थिक असमानता का पैमाना हैं। इसीलिए राजस्थान सरकार द्वारा लाया गया ‘स्वास्थ्य का अधिकार’ कानून एक युगांतरकारी कदम हैताकि बेहतर स्वास्थ्य के रास्ते में आने वाली आर्थिक असमानता को कम से कम किया जा सके। 

इस कानून की मूल भावना है कि- न सरकारी और न ही प्राइवेट अस्पतालों को यह अधिकार होगा कि वे किसी ऐसे व्यक्ति जिसे आपातकालीन चिकित्सा की जरूरत है, उसे इस संबंध में धन की कमी या किसी अन्य वजह से इंकार कर दें या लौटा दें! ऐसी किसी भी चिकित्सा में आए खर्च की भरपाई राज्य सरकार करेगी।– मोटे तौर पर यह वह घोषणा है जिसे ‘स्वास्थ्य के अधिकार’ बिल के माध्यम से राजस्थान सरकार अपनी राज्य की जनता को आश्वस्त कर रही है। कानून का पूरी तरह से नागरिकों के प्रति झुकाव प्राइवेट अस्पतालों और उसमें कार्य करने वाले डॉक्टरों के समूहों को परेशान कर रहा है। जिसे लेकर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन समेत तमाम अन्य संगठनों ने इस बिल के खिलाफ धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है, मार्च निकाले जा रहे हैं और लगभग सारी स्वास्थ्य सेवाओं को बंद कर दिया गया है।

अब तक अस्पतालों और डॉक्टरों के ‘रहम’ पर आश्रित रहा नागरिक, स्वास्थ्य के अधिकार के कानून के माध्यम से सशक्त होने को है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अपने तरह के इस अनोखे और आवश्यक कानून को राजस्थान का डॉक्टर समुदाय ‘काले कानून’ की संज्ञा दे रहा है। आज भारत में नागरिकों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं का 78% हिस्सा प्राइवेट अस्पतालों और डॉक्टरों के माध्यम से आ रहा है शायद यही वजह है कि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन अपने इस कानून के खिलाफ अपने प्रदर्शन को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की धमकी दे रहा है। 

एक कानून जो गरीबों और वंचितों के कंधे पर हाथ रखकर कहता है कि- वह राज्य के सभी नागरिकों को उनकी जेब पर बिना किसी भयावह खर्च के गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य की गारंटी प्रदान करेगा। ऐसे में उसे डॉक्टरों द्वारा काला कानून कहना कहाँ तक तर्क संगत है?


स्वास्थ्य के संबंध में यदि कुछ ‘काला’ खोजना है तो वह तो पहले से ही भारतीय स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र में पसरा पड़ा है। भारत एक ऐसा देश है जहां हर वर्ष लगातार ‘असमानताओं’ के कीर्तिमान स्थापित किए जा रहे हैं। ऐसे में जिन लोगों के पास प्राइवेट अस्पतालों की शोषणकारी प्रवृत्ति से निपटने के लिए पर्याप्त धन नहीं हैं और सरकारी अस्पतालों में अपनी बारी का इंतजार करने के लिए जीवन के दिन कम पड़ रहे हैं उनकी लड़ाई को कानून के द्वारा स्थापित राज के द्वारा ही लड़ा जा सकता है। 2020 के एक सरकारी आँकड़े के अनुसार जितनी मौतें जो सरकारी रजिस्टर में दर्ज की गईं उसका 45% सिर्फ इसलिए घटित हुई क्योंकि मरने वालों को मेडिकल केयर ही नहीं मिल पाया था। 

ऑक्सफैम इंटरनेशनल द्वारा असमानता को लेकर जारी किए जाने वाले सूचकांक में भारत 161 देशों के मुकाबले 123वें स्थान पर है(सीआरआईआई-2022)। इस सूचकांक के अनुसार भारत अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर खर्च(कुछ व्यय का 3.64%) करने के मामले में 161 देशों के मुकाबले 157वें स्थान पर है। स्वास्थ्य पर किए जाने वाले व्यय के मामले में स्थिति यह है कि भारत ब्रिक्स देशों और अपने पड़ोसियों जैसे-पाकिस्तान(4.3%), बांग्लादेश(5.19%), श्रीलंका(5.88%), नेपाल(7.8%) आदि सभी से बहुत पीछे है। भारत में बच्चों में वेस्टिंग(ऊंचाई के अनुसार कम वजन) की वर्तमान स्थिति 19.3% पर है जोकि सन 2000 के 17.15% से भी बुरी अवस्था में है। आज भी देश के एक चौथाई बच्चे टीकाकरण कार्यक्रम से वंचित हैं।

‘उपचार’ नामक डॉक्टरों की संस्था का कहना है कि स्वास्थ्य के अधिकार कानून की वजह से प्राइवेट अस्पतालों की व्यवस्था ढह जाएगी क्योंकि उन्हे इस बात का भरोसा नहीं कि सरकार आपातकालीन चिकित्सा करवाने वाले राज्य के नागरिकों के इलाज के पैसे अस्पतालों को समय पर देंगे भी कि नहीं! एक प्राइवेट अस्पताल जो सस्ते दामों पर मिलने वाली जमीन के ऊपर बना हुआ है, एक अस्पताल जो अपने आईसीयू के संचालन में मनमानी से पैसे कमाता रहा, एक अस्पताल जो इलाज के बिल में लगभग हर सेवा को उच्चतम मूल्यों पर वसूलता है उसे अब उस सरकार पर भरोसा नहीं जिसे जनता ने जनता के लिए चुना है! 

भारत उन देशों में से हैं जहां आम नागरिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अपनी जेब से सबसे ज्यादा पैसा खर्च करते हैं, लगभग 63%। इसमें भी सबसे ज्यादा पैसा दवा खरीदने पर खर्च होता है। युवाओं से भरे देश में जहां बेशुमार बेरोजगारी है, वहाँ इतना पैसा सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने के बाद बाकि घर कैसे चलेगा, यह न सोच पाना ‘सोच का कालापन’ है।


जिन डॉक्टरों ने कभी इस बात पर प्रश्न नहीं उठाया कि मरीजों को लिखने वाली दवाओं को कंपनी के नाम पर क्यों लिखा जाता है दवा के कॉम्पोजीशन के नाम पर क्यों नहीं? जिन्होंने यह प्रश्न कभी नहीं उठाया कि प्राइवेट अस्पतालों की फार्मेसी में सभी दवाएं और इन्जेक्शन अपने उच्चतम मूल्य पर(MRP) पर ही क्यों मिलते हैं? जिन डॉक्टरों ने कभी भी खुलकर बाजार में उपलब्ध सस्ती दवाओं को अपना समर्थन कभी नहीं दिया उन्हे आज यह कानून, जो थोड़ा सा नागरिकों की ओर झुका है उन्हे ‘काला कानून’ नजर आ रहा है! ऐसा क्यों?

ऐतिहासिक बेरोजगारी से जूझ रहा भारत का नागरिक तब तक अस्पताल का मुँह नहीं देखना चाहता जबतक की उसे यह न लगने लगे कि अब बीमारी उसकी जान ले लेगी। कारण बिल्कुल साफ है कि उसके पास प्राइवेट अस्पतालों के बिल चुकाने के लिए न ही कोई निश्चित मासिक आय है और न ही कोई स्वास्थ्य बीमा!


 भारत के 80% नागरिकों के पास कोई भी स्वास्थ्य बीमा नहीं है। वित्तीय वर्ष 2020 में भारत में प्रति व्यक्ति आय लगभग 11,200 रुपये ही थी, ऐसे में अगर किसी नागरिक को मेदांता, अपोलो या फोर्टिस जैसे अस्पतालों का मुँह देखना पड़ जाए तो उसे मात्र इमरजेन्सी में भर्ती भर होने के लिए 50 हजार रुपये प्रतिदिन तक की जरूरत पड़ेगी। यह खर्च भी निश्चित नहीं है क्योंकि उच्चतम दामों पर होने वाली बेहिसाब जाँचे और नियमित ‘कन्सल्टेन्सी’ की आड़ में हजारों रुपयों का खर्च मरीज के परिवार का रक्त मज्जा से भी बाहर निकालने के लिए पर्याप्त है।

2018-19 आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, 60% प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों(PHCs) में मात्र एक डॉक्टर ही उपलब्ध है जबकि 5%PHCs में तो कोई डॉक्टर ही उपलब्ध नहीं है साथ ही लगभग 32% ग्रामीणों को किसी पास की OPD में जाने के लिए कम से कम 5 किमी चलना पड़ता है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में 28 गाँव के बीच मात्र एक PHC है। एक तिहाई PHCs में तो लैब तकनीशियन भी नहीं है। मानव विकास रिपोर्ट 2020 के अनुसार, बेड उपलब्धता के मामले में भारत 167 देशों के मुकाबले 155वें स्थान पर है। रिपोर्ट के अनुसार प्रति 10 हजार जनसंख्या के लिए भारत में मात्र 5 अस्पताल बेड ही उपलब्ध हैं।कहने को तो भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रति 1000 जनसंख्या पर आवश्यक डॉक्टरों की संख्या के आँकड़े को पार कर लिया है लेकिन जो सबसे बड़ी समस्या है वह यह कि भारत के 78% डॉक्टर शहरी क्षेत्रों के स्वास्थ्य देखभाल में लगे हुए हैं अर्थात 78 प्रतिशत डॉक्टर देश की मात्र 30% आबादी के लिए हैं और बचे हुए 22% डॉक्टरों पर भारत की 70% आबादी आश्रित है। और इन सबके बीच प्राइवेट अस्पतालों के पास भारत के स्वास्थ्य देखभाल का 78% हिस्सा है।

जिस तत्परता से डॉक्टरों के समूह/संगठन स्वास्थ्य के अधिकार कानून को काला कानून कह रहे हैं लगभग उसी ऊर्जा और तत्परता से राजस्थान सरकार को राज्य के प्राइवेट अस्पतालों का ऑडिट करवाना चाहिए। लगभग सभी प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों के परिजनों का सर्वे किया जाना चाहिए ताकि सरकार तक अस्पतालों में होने वाली अनैतिक प्रक्रियाओं का खुलासा हो सके।


 एक अस्पताल किस दवा पर और किस इन्जेक्शन पर कितना कमा सकता है इसके लिए कानून में जगह होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रति आईसीयू बेड पर वसूले जाने वाले खर्च पर लिमिट लगाने के बाद भी आईसीयू का खर्च कम नहीं होना यह बताता है कि अस्पतालों ने मरीजों का आर्थिक शोषण करने के लिए कई अन्य रास्ते भी खोज निकाले हैं। ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रैक्टिस’ के नाम पर गरीबों से बेजा धन का शोषण सरकारी स्क्रूटिनी के दायरे में आना चाहिए।सेंट्रल ड्रग्स स्टैन्डर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) को इस बात से पर्दा हटाना चाहिए कि कैसे एक ही कॉम्पोजीशन की दो दवाओं के बीच, जो भारत में ही बनती और बिकती हैं, उनके मूल्य में 1000 गुनेका अंतर कैसे हो सकता है? जबकि दोनो ही दवाएँ सरकारी मानक को पूरा करती हैं और भारत में बिकने के लिए रजिस्टर्ड हैं। अब यदि कोई अस्पताल या डॉक्टर 1000 गुना अधिक मूल्य की दवा को प्रिसक्रिप्शन में चुनता है तो इसे डॉक्टरी समझ मानी जाए या इन डॉक्टरों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला ‘बिसनेस मॉडल’ जो अंततः सिर्फ और सिर्फ मरीजों को होने वाले आर्थिक नुकसान की ओर ही जाता है? 

मेदांता अस्पताल की वेबसाइट पर इस अस्पताल के मालिक, नरेश त्रेहान का एक वीडियो देखा जा सकता है। इसमें वह बता रहे हैं कि उन्होंने मेदांता अस्पताल क्यों खोले? परंतु वह यह बताने में असमर्थ रहे हैं कि उनका अस्पताल ऑपरेशनल कॉस्ट के नाम पर धन की उगाही करने वाले अस्पतालों मे से एक है। वह यह भी बताने में असमर्थ रहे कि क्यों उनके अस्पताल पारदर्शिता के अभाव का जीता जागता स्तम्भ बन चुके हैं साथ ही यह भी कि इन अस्पतालों में मरीज और उसके घरवालों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार पर कोई रोकटोक नहीं! सबसे अमानवीय तो यह कि लाखों रुपये अस्पताल को देने के बाद भी जब मरीज जीवित नहीं बच पाता तो अस्पताल नैतिकता और मर्यादा को ताक में रखकर शव को घर तक पहुंचाने के लिए भी पैसे मरीज के घरवालों से ही वसूलता है।

शायद यही है ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रैक्टिस’, शायद यही है उनके अस्पतालों का मूलभूत तत्व!वित्तीय वर्ष 2022 के 9 महीनों के आँकड़ों के अनुसार मेदांता की कुल आय 2000 करोड़ रुपए से अधिक थी। जो बात सबसे ज्यादा विचलित करने वाली है वह यह है कि OPDफार्मेसी से होने वाली आय में वित्तीय वर्ष 2022 की अपेक्षा 58% की बढ़ोत्तरी हुई है। जहां FY22 के 9 महीनों में अस्पताल की फार्मेसी से आय लगभग 40 करोड़ रुपए थी, वहीं यही आंकड़ा FY23 के लिए बढ़कर लगभग 62 करोड़ रुपये हो गया। MRPपर मिलने वाली दवाओं से जहां मरीजों की कमर टूट रही है वहीं अस्पताल की बिल्डिंग और रीढ़ लगातार परत दर परत मजबूत होती जा रही है। 

राजस्थान सरकार के द्वारा लाए गए कानून के विरोध में प्राइवेट अस्पतालों के मालिक अगर सड़क पर उतरते तो बात समझी जा सकती थी। लेकिन जिस तत्परता से प्राइवेट डॉक्टर सड़कों पर उतर रहे हैं और आम नागरिकों के जीवन के अधिकार को संकट में डाल रहे हैं उससे यह लग रहा है कि डॉक्टरों में जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत थी अर्थात संवेदनशीलता, वह पूरी तरह से विलुप्त होती जा रही है। 

अपने आर्थिक हितों को नागरिकों के स्वास्थ्य हितों से टकराना न सिर्फ अनैतिक है बल्कि आपराधिक भी।


राजस्थान मानवाधिकार आयोग ने राज्य के प्रधान सचिव (मेडिकल एवं स्वास्थ्य) को राजस्थान मेडिकल ऐक्ट-1952 और राजस्थान मेडिकल नियमावली-1957 के तहत नोटिस भेजते हुए कहा है कि आयोग “मानवाधिकारों के इस दुरुपयोग पर मूक दर्शक बन खड़ा नहीं रह सकता”।

आँकड़े यह दर्शा रहे हैं कि ‘स्वास्थ्य का अधिकार’ कानून सिर्फ राजस्थान ही नहीं पूरे देश की आवश्यकता है। प्राइवेट अस्पतालों को फलने-फूलने की छूट दी  जा सकती है न कि नागरिकों को लूटने की! सरकारी अस्पतालों की अवसंरचना में सुधार के साथ साथ प्राइवेट अस्पतालों के प्रशासन का धनोन्मुखी रवैया ठीक किया जाना चाहिए। संविधान का अनुच्छेद-21 जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, 78% स्वास्थ्य सेवाओं के कब्जे वाले प्राइवेट क्षेत्र को नियमित किए बिना नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य देखभाल से या तो वंचित बना रहेगा या फिर प्राइवेट अस्पतालों, डॉक्टरों और फार्मा कंपनियों की मिली भगत से शोषित होता रहेगा। 

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