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75% स्थानीय लोगों को रोज़गार का फ़ैसला हरियाणा को पड़ेगा महंगा! 

75% स्थानीय लोगों को रोज़गार का फ़ैसला हरियाणा को पड़ेगा महंगा! 

सरकार ने यह क़ानून बना दिया है कि हरियाणा में प्राइवेट कारोबार में भी 50 हज़ार रुपए महीने से कम तनख्वाह वाली नौकरियों में 75 प्रतिशत पर सिर्फ हरियाणा के ही लोग रखे जा सकेंगे। 28 फरवरी को इस पर राज्यपाल ने दस्तखत कर दिए हैं। 

हरियाणा सरकार के एक फ़ैसले से हंगामा खड़ा हो गया है। फ़ैसला है रोज़गार में आरक्षण का। रोज़गार भी सरकारी नहीं, प्राइवेट। और आरक्षण भी किसी जाति, धर्म या आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि राज्य में रहनेवालों को। राज्य सरकार ने यह फ़ैसला तो किया अपने लोगों की भलाई के लिए या उन्हें खुश करने के लिए। वे खुश हुए या नहीं इसका पता तो चुनाव में लगेगा। और उनकी कितनी भलाई हुई इसका पता लगने में भी अभी काफी वक़्त लग सकता है, लेकिन फिलहाल तो इस फैसले से हंगामा खड़ा हो गया है। खासकर हरियाणा में जिन कंपनियों की फैक्ट्रियाँ या दफ्तर हैं उनमें गंभीर चिंता फैल गई है। 

सरकार ने यह क़ानून बना दिया है कि हरियाणा में प्राइवेट कारोबार में भी 50 हज़ार रुपए महीने से कम तनख्वाह वाली नौकरियों में 75 प्रतिशत पर सिर्फ हरियाणा के ही लोग रखे जा सकेंगे। विधानसभा में तो यह विधेयक पहले ही पास हो चुका था, लेकिन अब 28 फरवरी को इस पर राज्यपाल ने दस्तखत कर दिए हैं।

हरियाणा के उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की पार्टी जेजेपी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में यह वादा किया था कि उनकी सरकार बनी तो वो 75 फ़ीसदी नौकरियाँ हरियाणा के लोगों के लिए रिज़र्व करवाएंगे।

 

बेरोज़गारी की फिक्र

उद्योग और विकास के पैमाने पर हरियाणा देश के सबसे उन्नत राज्यों में रहा है, लेकिन इस वक़्त बेरोज़गारी बहुत बड़ी फिक्र है। सेंटर फ़ॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी यानी सीएमआईई के ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक़, जहाँ पूरे देश में बेरोज़गारी की दर फरवरी के महीने में 6.5 परसेंट थी, वहीं हरियाणा में यह 26.4% पर थी। यानी देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी हरियाणा में ही है।

ज़ाहिर है, राज्य सरकार इससे भी परेशान है और किसान आंदोलन की वजह से लगातार बढ़ता असंतोष भी उसके लिए चिंता का कारण बना हुआ है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार में अहम सहयोगी दुष्यंत चौटाला की पार्टी भी ऐसे में खुद को घिरा हुआ महसूस कर रही है और इस क़ानून के जरिए उन्होंने प्रदेश के लोगों को राहत देने की एक कोशिश की है। 

लेकिन यह कोशिश फ़ायदे की जगह नुक़सान पहुँचा सकती है औऱ यह कितनी ख़तरनाक साबित हो सकती है, इसका हिसाब जोड़ने में शायद उनसे चूक हो गई है। देश के दोनों प्रमुख उद्योग संगठनों फिक्की और सीआईआई ने इस नए क़ानून पर चिंता जताई है।

क्या कहना है उद्यमियों का?

सीआईआई ने सरकार से आग्रह किया है कि इस फ़ैसले पर फिर विचार किया जाए, जबकि फिक्की ने तो कहा है कि यह फ़ैसला प्रदेश में औद्योगिक विकास के लिए तबाही जैसा है।

देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति सुज़ुकी और बीपीओ कंपनी जेनपैक्ट के अलावा सॉफ्टवेयर और टेक्नोलॉजी में देश और  दुनिया की दिग्गज कंपनियों ने गुड़गाँव में बड़े दफ़्तर खोल रखे हैं। इनमें माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, टीसीएस और इनफ़ोसिस जैसे नाम शामिल हैं। सॉफ्टेयर और टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए बंगलूरू और हैदराबाद के बाद गुड़गाँव सबसे पसंदीदा शहर है।

यह नया कानून इन्हीं कंपनियों के लिए सबसे बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है। बीपीओ यानी बीपीएम ( बिजनेस प्रॉसेस मैनेजमेंट) का कारोबार एक तरह से गुड़गाँव की जान कहा जा सकता है। और गुड़गाँव को दुनिया की बीपीएम राजधानी भी कहा जाता है। पूरी दुनिया में इस काम में लगे लोगों का पाँच प्रतिशत हिस्सा गुड़गाँव में है। सिर्फ भारत को देखें तो ऐसे 13 परसेंट लोग गुड़गाँव में हैं।  

 - Satya Hindi

बीपीओ को लगेगा धक्का 

बीपीओ और आईटी कंपनियों के अलावा गुड़गाँव और मनेसर का इलाका एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र भी है। यहाँ मारुति ही नहीं, कई ऑटो कंपनियाँ, उनकी एंसिलियरी कंपनियाँ, इलेक्ट्रॉनिक्स और कंज्यूमर उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की भी छोटी बड़ी फैक्टरियाँ मौजूद हैं। देश की 50 प्रतिशत कारें, 60 प्रतिशत मोटर साइकिलें और 11 फ़ीसद ट्रैक्टर यहीं बनते हैं।

इस इलाके में औद्योगिक विकास के साथ ही यूनियन और मैनेजमेंट के विवाद का भी लंबा इतिहास है। 2012 में मारुति के प्लांट में झगड़ा इतना विकराल हो गया था कि आंदोलनकारियों  ने कंपनी के एक ऊँचे अफ़सर को जलाकर मार डाला था। उसके बाद से ही कंपनी ने अपने नए कारखाने दूसरी जगहों पर लगाने का काम भी तेज़ कर दिया। दूसरी कंपनियां भी इस क्षेत्र में निवेश करने से पहले काफी सोच विचार करने लगी हैं।

इंस्पेक्टर राज की वापसी? 

बेरोज़गारी का आँकड़ा साफ दिखा रहा है कि हरियाणा में रोज़गार की कितनी ज़रूरत है। सरकारी नौकरियाँ कम होती ही जा रही हैं, ऐसे में चुनाव जीतने के लिये यह नारा बुरा तो नहीं है कि हम प्राइवेट नौकरियों में भी आरक्षण दिलवा देंगे। और कंपनियों के तसल्ली के बारे में भी सोचा गया होगा।

इसीलिए शर्त यह रखी कि महीनें में 50 हज़ार रुपए से कम तनख्वाह वाली नौकरियों में ही आरक्षण देना होगा। 

योग्य उम्मीदवार न मिलें तो बाहर के लोगों को रखा जा सकता है। लेकिन ऐसी हर नियुक्ति के लिए सरकार से मंजूरी लेनी होगी। यानी काम में रोड़ा अटकाने का एक औऱ इंतजाम। कारोबारी इसे इंस्पेक्टर राज की वापसी का साफ सबूत मान रहे हैं।

बाहर चली जाएंगी नौकरियाँ?

बीपीओ के तो करीब करीब 80 प्रतिशत कर्मचारी इस आरक्षण के दायरे में आ जाएंगे। शायद वे बहुत से लोगों को नौकरी दे भी सकते हों। लेकिन सॉफ्टवेयर कारोबार के जानकारों से बातचीत के आधार पर जो खबरें आई हैं उनके हिसाब से ऐसी कंपनियों में 70 फीसद से कुछ ही कम स्टाफ पाँच साल से कम अनुभव वाला होता है और इनमें से करीब आधे 50 हजार रुपए से कम तनख्वाह पर काम करते हैं।

राहत की बात यह है कि आरक्षण का नियम सिर्फ नई भर्ती के लिए है। कंपनी के मौजूदा स्टाफ पर इसका असर नहीं पड़ना है। लेकिन ये कंपनियाँ देश भर में कुल मिलाकर साल में लाख- डेढ़ लाख नए लोगों को नौकरियाँ देती हैं।

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हरियाणा स्थित एक कार कारखाना

डर है कि अब वो अपना कारोबार गुड़गाँव या हरियाणा के बजाय देश के दूसरे हिस्सों में ही फैलाने या पूरी तरह शिफ्ट करने की सोचने लगेंगी। कोरोना काल में जब पूरे पूरे दफ्तर बंद करके 'वर्क फ्रॉम होम' का अनुभव हो चुका है, तब कंपनियों में यह हौसला भी बढ़ चुका है कि वे आसानी से यहाँ से वहाँ खिसक सकती हैं।

मध्य प्रदेश का उदाहरण

लेकिन क्या यह समस्या का हल है? याद कीजिए, 2019 में मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एलान किया था कि वो ऐसा कानून लायेंगे जिससे निजी कंपनियों को 70 प्रतिशत नौकरियाँ राज्य के नौजवानों के लिये आरक्षित करनी होंगी। 

उसके एक साल बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एलान किया कि प्रदेश की सारी सरकारी नौकरियाँ स्थानीय लोगों के लिये ही रखने यानी 100 फ़ीसद आरक्षण का कानून बनाएंगे। इसी किस्म के एलान1995 में गुजरात और 2016 में कर्नाटक की सरकारें भी कर चुकी हैं। लेकिन इनमे से कोई भी अमल में नहीं आ सका।

संविधान राज्य सरकारों को यह अधिकार नहीं देता है कि वे इस तरह का आरक्षण लागू करें जिससे बराबरी के अधिकार का उल्लंघन होता हो। सर्वोच्च न्यायालय भी यह साफ कर चुका है कि राज्य इस तरह भेदभाव करने वाले नियम नहीं बना सकते हैं।

लेकिन कानूनी प्रावधानों में कुछ गुंजाइश भी है और संसद ने जब रोजगार में इस तरह के भेदभाव खत्म करने के लिए कानून पास किया तो कुछ राज्यों को रियायत भी दी गई। 

इसलिए यह आशंका बेबुनियाद नहीं है कि आज नहीं तो कल दूसरी सरकारें भी इस तरह के कानून बनाने की सोचेंगी। वोट बटोरने के लिए यह कारगर फॉर्मूला भी हो सकता है। लेकिन अगर इस चक्कर में उद्योग व्यापार ही राज्यों से खिसकने लगे तो फिर इसका फ़ायदा होगा या नुक़सान, यह समझना मुश्किल नहीं है। यह भी क़रीब- क़रीब तय ही है कि ऐसा क़ानून अदालत में टिक नहीं पाएगा। लेकिन बड़ी चिंता यह है कि देश में रोजगार का संकट कैसे ख़त्म किया जाए। जब तक उसका इलाज सामने नहीं आएगा, तब तक ऐसे नीम हकीमों वाले नुस्खे आज़माने वाले नेता और सरकारें इनका सहारा लेती रहेंगी।

(साभार : हिंदुस्तान)

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