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तीन जातियों के ही लोग राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड क्यों?

तीन जातियों के ही लोग राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड क्यों?

राष्ट्रपति के बॉडीगार्डों की भर्ती के लिए तीन जातियों को ही प्राथमिकता दी जाती है। इस जातीय भेदभाव के ख़िलाफ़ कोर्ट में याचिका दायर कर इसे ख़त्म करने की माँग की गई है।

अब राष्ट्रपति के बॉडीगार्डों की जाति को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ है। सवाल पूछा जा रहा है कि आख़िर सिर्फ़ तीन जातियों के लोगों को ही राष्ट्रपति का बॉडीगार्ड क्यों बनाया जाता है बाक़ी जातियों में क्या कमी है कि उन्हें राष्ट्रपति की सुरक्षा के लायक़ नहीं समझा जाता

यह मामला अब दिल्ली हाईकोर्ट पहुँच गया है। हरियाणा के गौरव यादव ने यह सवाल लेकर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है कि केवल जाट, जट सिख और राजपूत ही क्यों राष्ट्रपति का बॉडीगार्ड बनने के लिए आवेदन कर सकते हैं गौरव ने सवाल उठाया है कि वह यादव जाति के हैं और राष्ट्रपति का बॉडीगार्ड बनने की बाक़ी सारी योग्यताएँ उनके पास हैं, तो वह क्यों इसके लिए चुने नहीं जा सकते गौरव ने अदालत में दायर याचिका में माँग की है कि पिछले साल सितम्बर में हुई बॉडीगार्डों की भर्ती रद्द की जाए। 

हाई कोर्ट ने अब इस मामले में रक्षा मंत्रालय, सेना प्रमुख, राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड कमांडेंट और सेना के नियुक्ति निदेशक को नोटिस देकर उनसे चार हफ़्ते में जवाब देने को कहा है।

गौरव ने अपनी याचिका में सवाल उठाया है कि पिछले साल राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड की भर्ती के लिए केवल तीन जातियों जाट, राजपूत और जट सिख को ही आवदेन करने को कहा गया था। गौरव ने कहा है कि यह सरकारी सेवा है और कैसे इसे केवल तीन जातियों तक सीमित किया जा सकता है यह संविधान के अनुच्छेद 16 का सीधा-सीधा उल्लंघन है। गौरव ने अपनी याचिका में कहा है कि संविधान का अनुच्छेद 15(1) जाति, धर्म, नस्ल, लिंग आदि के आधार पर किसी क़िस्म के भेदभाव का निषेध करता है, तो बॉडीगार्डों की भर्ती केवल तीन जातियों तक ही सीमित कैसे की जा सकती है

राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड भारतीय सेना की सबसे पुरानी घुड़सवार रेजिमेंट है। इसे 1773 में तब के बनारस शहर में अंग्रेज़ गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने शुरू किया था और तब इसमें मुग़ल घुड़सवार सैनिक रखे गए थे। ये सैनिक अवध प्रांत से आते थे। बाद में इसमें मुग़लों के अलावा जाटों और राजपूतों को भी शामिल किया जाने लगा। आज़ादी के बाद इसमें भर्ती का ख़ाका बदला।

यह मामला पहले भी सुप्रीम कोर्ट में आ चुका है और ख़ारिज हो चुका है। तब सेना ने सुप्रीम कोर्ट को दिए अपने हलफ़नामे में स्वीकार किया था राष्ट्रपति के बॉडीगार्डों में केवल हिन्दू राजपूत, हिन्दू जाट और सिख जाटों को ही भर्ती किया जाता है। सेना ने कहा था कि ऐसा किसी जातीय या धार्मिक भेदभाव की वजह से नहीं किया जाता, बल्कि काम की ज़रूरत के हिसाब से ऐसा किया जाता है। 

सेना ने तब कहा था कि राष्ट्रपति के बॉडीगार्डों में केवल डेढ़ सौ सैनिक शामिल हैं, यह बहुत छोटी-सी इकाई है और यह केवल समारोहों के लिए है। इसके लिए एक ख़ास तरह की क़द-काठी चाहिए, इसीलिए इसमें सीमित जातियों से भर्ती की जाती है।

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