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रामलला, अब वे नई स्मृति बना रहे हैं!

रामलला, अब वे नई स्मृति बना रहे हैं!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि राम विवाद नहीं, समाधान का नाम है। क्या अपने इस कथन पर अमल करते हुए वे अपनी राजनीति भी बदलेंगे या उनकी पार्टी और उनके परिवार के लिए अयोध्या की झांकी के बाद मथुरा-काशी बाक़ी है?

पाकिस्तान के निर्माण के बाद मोहम्मद अली जिन्ना का पहला भाषण देखिए। वह पाकिस्तान को ऐसा मुल्क बनाना चाहते थे जिसमें धर्म के आधार पर किसी नागरिक से भेदभाव न हो, वे अतीत की कटुता को छोड़ कर समानता और सहिष्णुता के आधार पर आगे बढ़ने की वकालत कर रहे थे।

लेकिन क्या हुआ? पाकिस्तान ने सबसे पहले अपने क़ायदे आज़म के क़ायदों से पीछा छुड़ाया। इसलिए कि पाकिस्तान की मांग करते हुए, भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता की राजनीति को हवा देते हुए जिन्ना ने जिन शक्तियों का आह्वान किया था, उनका किसी प्रेम और सहिष्णुता से लेना-देना नहीं था। वे शक्तियां एक मुस्लिम राष्ट्र बना लेने की अपनी कामयाबी पर ख़ुश थीं और पाकिस्तान के लिए अलग तरह के सपने देख रही थीं।

बरसों बाद पाकिस्तान गए बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी ने इसी सेक्युलर जिन्ना की तारीफ़ की तो उनकी ही खड़ी की हुई पार्टी इस तरह बिदकी कि उनसे अध्यक्ष पद छीन लिया गया। जबकि जिस राम मंदिर का राजनीतिक ब्याज आज बीजेपी खा रही है, उसका मूल दरअसल लालकृष्ण आडवाणी ने ही जमा किया था।

ये दो उदाहरण रखने का मक़सद बस यह याद दिलाना है कि नीयत और नीति में अगर फ़ासला हो तो नीयत पीछे छूट जाती है। राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का अनुष्ठान करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने उचित ही कहा कि यह विजय का नहीं, विनय का क्षण है। लेकिन क्या उनके समर्थक और भक्त यह सुन रहे हैं? गली-मुहल्लों और सड़कों पर उनका उन्मादी रवैया तो इसकी पुष्टि नहीं करता। राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया से असहमत लोगों के विरुद्ध सोशल मीडिया पर उनकी लगभग खूंखार और हिंसक प्रतिक्रिया इसकी तस्दीक नहीं करती। और तो और, बहुत सभ्य और शालीन भाषा में जो नई स्मृति बनाई जा रही है, वह भी बताती है कि यह मुंह में राम और बगल में कुछ और है।

यह सच है कि जब तूफ़ान बहुत तेज़ हो तो उसके ख़िलाफ़ पौधे रोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। लेकिन स्मृति के उन बीजों को बचाना भी ज़रूरी है जिनसे किसी वास्तविक परिप्रेक्ष्य का निर्माण हो सके और यह याद रखा जा सके कि आज विजय और न्याय की रास थामे जो चक्रवर्ती दिख रहे हैं, वे कैसे एक नया इतिहास, एक नई स्मृति गढ़ने में लगे हैं।

मसलन, यह बात मुहावरे की तरह दुहराई जा रही है कि पांच सौ वर्ष के संघर्ष और पांच सदी की पीड़ा के बाद राम मंदिर बन पाया है। क्या यह बात वाक़ई ऐतिहासिक तौर पर सच है?

अगर हाँ तो तुलसी के मानस में बाबरी मस्जिद के विरुद्ध कोई पीड़ा क्यों नहीं दीखती, किसी संघर्ष का आह्वान क्यों नज़र नहीं आता? उनके उत्तरवर्ती वर्षों में जो संत और विचारक हुए, उनके यहाँ रामकथा तो मिलती है, राम के विस्थापित होने का कोई प्रसंग नहीं मिलता है। बेशक राम जन्मस्थान को लेकर एक मुकदमा ब्रिटिश काल से चलता रहा और वहाँ अधिकार को लेकर छिटपुट संघर्ष भी हुए, लेकिन उस संघर्ष में न पूरी हिंदू चेतना शरीक थी न मुस्लिम चेतना। बल्कि वह हिंदू-मुस्लिम संघर्ष भी नहीं था। याद कर सकते हैं कि रामजन्मभूमि को लेकर जो विवाद था उसमें एक तीसरा पक्ष निर्मोही अखाड़े का भी था और सुप्रीम कोर्ट के न्याय से पहले इलाहाबाद हाइकोर्ट ने जो न्याय किया था, उसमें ज़मीन का एक हिस्सा निर्मोही अखाड़े के नाम भी किया था। 

आज़ादी की लड़ाई के सबसे बड़े नायक गांधी ने भी राम की बात की और रामराज्य की भी बात की। लेकिन उनके यहां भी दूर-दूर तक यह पीड़ा नहीं दीखती कि राम का मंदिर किन्हीं विधर्मियों ने हथिया लिया है। और तो और, 1980 में बनी बीजेपी अपने प्रारंभिक आठ वर्षों तक राम मंदिर को याद नहीं करती और फिर गठबंधन की राजनीति के दौर में अपनी राजनीतिक ज़रूरतों के हिसाब से इसे अपनी कार्य सूची से स्थगित कर देती है। फिर यह पांच सौ साल की पीड़ा और पांच सौ साल का इतिहास अचानक कहां से चले आए? जाहिर है, यह नई स्मृति का निर्माण करने की कोशिश है।

बल्कि इस कृत्रिम पीड़ा के निर्माण में उस वास्तविक पीड़ा की स्मृति को दफ़न भी किया जा रहा है जो इन पांच सौ वर्षों में तमाम लेखकों-बुद्धिजीवियों और आंदोलनों में दिखती रही- वह छुआछूत और भेदभाव की पीड़ा है जिसके विरुद्ध कबीर ने भी लिखा, रैदास ने भी लिखा, तमाम समाज-सुधारकों ने लिखा, विवेकानंद, आंबेडकर और गांधी और सावरकर तक ने अपने-अपने ढंग से जिससे मुक़ाबले की कोशिश की। यह वास्तविक पीड़ा है जिसके कोई वैध समाधान को हिंदू समाज अब भी तैयार नहीं है। वह जातियों में शादी करता है, जाति देखकर संबंध बनाता है, दफ़्तरों में नियुक्ति और तरक़्की तक में जाति का खयाल रखता है और अपनी इस अपराध-भावना से मुक्ति के लिए शबरी और केवट की याद दिलाता है। 500 साल की हिंदू पीड़ा का निर्माण भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

इसी तरह एक और पीड़ा इन्हीं वर्षों में उभरी है। सब याद कर रहे हैं कि दशकों तक रामलला टेंट में रहे। लेकिन कोई यह नहीं बता रहा कि उनको टेंट में पहुंचाया किसने? 6 दिसंबर 1992 से पहले राम की मूर्तियां कहां थीं? जाहिर है, वे एक परिसर में थीं जिन्हें तब भी बहुत सारे आस्थावान हिंदू राम मंदिर ही मानते थे और वहां पूजा-पाठ और दर्शन के लिए जाते थे। बाबरी मस्जिद या राम मंदिर तोड़ कर उन्हें राम मंदिर आंदोलन वालों ने ही टेंट में पहुंचाया था।

 - Satya Hindi

और यह पूरी प्रक्रिया किस तरह घटित हुई थी? आज सब सुप्रीम कोर्ट में आस्था जता रहे हैं, उसके न्याय की प्रशंसा कर रहे हैं, लेकिन तब इसी सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफ़नामों का मज़ाक बनाते हुए, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की खिल्ली उड़ाते हुए, बाबरी मस्जिद गिराई गई। उन दिनों यह लोकप्रिय तर्क था कि आस्था का मामला अदालतों से परे है। 

यह सच है कि इस देश में हिंदू-मुस्लिम झगड़े भी हुए और मंदिरों को तोड़ कर मस्जिदें भी बनीं। लेकिन उनको उनके ऐतिहासिक और समग्र परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। अयोध्या में मीर बाक़ी ने एक मंदिर तोड़ा लेकिन वहाँ सैकड़ों मंदिर बने रहे और बनते रहे। रामकथा और रामलीलाओं की परंपरा इसी मध्यकाल में शुरू हुई और किसी ने राम की स्मृति को मिटाने की कोशिश नहीं की। बल्कि इस समूचे दौर में राम के कई रूप और विचार निखर-निखर कर सामने आते रहे जिनके आगे मूर्तियाँ बेमानी थीं, मंदिर गैरज़रूरी थे। 

1947 में जब देश आज़ाद हुआ और उसने लोकतांत्रिक प्रतिज्ञाओं को अंगीकार किया, तभी यह तय किया गया था कि पुराने झगड़े, पुराने विवाद भूले जाएं, राजाओं या उनके सेनापतियों की मर्ज़ी से जो कुछ होता रहा, वह अब नहीं होना चाहिए। लेकिन यह सब फिर हुआ और अब उसके मुताबिक नई स्मृतियां बनाई जा रही हैं।

एक ईश्वर या एक मिथकीय व्यक्तित्व या एक साहित्यिक चरित्र के रूप राम की मान्यता या कल्पना से किसी का झगड़ा नहीं हो सकता। इस रूप में वे वरेण्य भी हो सकते हैं और अनुकरणीय भी- बेशक, उन अपवादों और बहसों के साथ जिनमें शंबूक वध भी शामिल है और सीता का निष्कासन भी- रावण के साथ संग्राम से पहले कई असुरों का वध भी इसमें कुछ लोग जोड़ना चाहेंगे।

लेकिन राम के नाम की आड़ में अगर किसी तरह की कुत्सित राजनीति को बढ़ावा मिल रहा हो, भारत के बहुलतावादी चरित्र को बदलने की कोशिश की जा रही हो, लोकतंत्र को चुपचाप बहुसंख्यकवाद में बदलने के लिए एक नई संहिता लिखी जा रही हो तो इसका विरोध ज़रूरी है- अपने अतीत को ही ठीक से समझने के लिए नहीं, अपने भविष्य की बेहतर कल्पना और कामना के लिए भी। 

बेशक, यह आगे बढ़ने का समय है। इतिहास की चुनौती बहुत बड़ी है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि राम विवाद नहीं, समाधान का नाम है। देखें कि अपने इस कथन पर अमल करते हुए वे अपनी राजनीति भी बदलते हैं या उनकी पार्टी और उनके परिवार के लिए अयोध्या की झांकी के बाद मथुरा-काशी बाक़ी है।

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