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क्या तोगड़िया बिगाड़ेंगे गुजरात के चुनावी समीकरण?

क्या तोगड़िया बिगाड़ेंगे गुजरात के चुनावी समीकरण?

प्रवीण तोगड़िया राम मंदिर आन्दोलन के नेता थे और एक दौर में नरेंद्र मोदी के मित्र भी। लेकिन इस बार वह अपना राजनीतिक दल बनाकर बीजेपी के ख़िलाफ़ ताल ठोकने जा रहे हैं। 

साल 2006 में राज ठाकरे ने अपने चाचा बाल ठाकरे और भाई उद्धव ठाकरे के ख़िलाफ़ बग़ावत करते हुए महाराष्ट्र नव निर्माण सेना नामक नई पार्टी का गठन किया था। राज ठाकरे ने साल 2009 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना के परम्परागत वोटरों में बड़ी सेंध लगाते हुए 13 विधानसभा सीटें जीती थीं। कुछ इसी तरह का राजनीतिक नुक़सान करते हुए नज़र आ रहे हैं विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया। तोगड़िया ने हिन्दुस्थान निर्माण दल नामक पार्टी का गठन किया है और 100 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। तोगड़िया की पार्टी गुजरात की 15 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है। 

एक दौर था जब प्रवीण तोगड़िया ना सिर्फ़ हिंदुत्व के ध्वजवाहक थे, बल्कि हिंदुत्व के जनक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में भी उनकी आवाज़ बड़ी गम्भीरता से सुनी जाती थी।

वर्ष 2003 में अशोक सिंघल द्वारा रिटायरमेंट की घोषणा के बाद अनौपचारिक रूप से तोगड़िया विहिप के मुखिया बन गए, लेकिन 2011 में वे अधिकृत तौर पर विहिप के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बने।

तोगड़िया राम जन्मभूमि आन्दोलन के कद्दावर नेता थे और एक दौर में अहमदाबाद की सड़कों पर अपने स्कूटर की पिछली सीट पर नरेंद्र मोदी को बिठाकर घूमा करते थे। तब मोदी संघ में प्रचारक के रूप में कार्य करते थे लेकिन जैसे ही वह गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तोगड़िया और मोदी के रिश्तों में टकराव का जो दौर शुरू हुआ वह आज तक दिखाई दे रहा है। 

तोगड़िया को विहिप से बाहर निकाला जा चुका है और यह कहानी गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान लिखी गयी थी।

  • बताया जाता है कि मोदी ने दिसंबर 2017 में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान संघ के नेताओं से इस बात का जिक्र किया था कि कैसे तोगड़िया पटेल आन्दोलन में हार्दिक पटेल की मदद कर रहे हैं। लेकिन जब तोगड़िया ने नरेंद्र मोदी और बीजेपी को राम मंदिर निर्माण नहीं करने के लिए कठघरे में खड़ा किया तो संघ के कान खड़े हो गए।

सरकार को बचाता रहा है संघ

जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार आयी है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रास्ते में आने वाली हर अड़चन दूर करने को तत्पर दिखा है। संघ को भी इसकी सीख वाजपेयी सरकार के वक़्त के कटु अनुभवों से मिली है। क्योंकि तब संघ न सिर्फ़ एक सुपर पावर की तरह बल्कि असली आलाकमान की तरह सरकार को नियंत्रित करता हुआ दिखता था। और उसकी वजह से न तो वह संघ की छवि के लिए ठीक रहा और न ही वाजपेयी सरकार के लिए। 

वाजपेयी सरकार के कामकाज़ को लेकर संघ के अनुषांगिक संगठनों जैसे स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ आदि ने जो अड़ंगे लगाए थे, उससे वाजपेयी सरकार की छवि धूमिल हुई थी।

  • संघ चाहता है कि मोदी लंबे समय तक शासन संभालें ताकि भारत को विश्व गुरु बनाने की संघ की महत्वाकांक्षा को आगे बढ़ाया जा सके। शायद यही वजह है कि संघ, सरकार के कामकाज में रोड़े अटकाता नहीं दिखना चाहता बल्कि वह उसका रास्ता सुगम करना चाहता है।

इसी रणनीति के तहत तोगड़िया जैसे कांटों को 14 अप्रैल 2018 को विहिप में चुनाव कराकर रास्ते से हटा दिया गया। 53 साल के इतिहास में पहली बार विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के लिए वोट डाले गए थे।

लेकिन अब तोगड़िया मोदी को घेरने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं। तोगड़िया इसमें कितने सफल होंगे यह कहने के बजाय यह बात करनी चाहिए कि तोगड़िया क्या बीजेपी या नरेंद्र मोदी का कोई नुकसान कर पायेंगे अब देखना है कि तोगड़िया कहाँ-कहाँ से अपनी पार्टी के प्रत्याशी उतारते हैं। 

गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणामों को देखें तो यह कहना मुश्किल नहीं कि यदि गुजरात में हिंदुत्व के नाम पर किसी दूसरी पार्टी ने बीजेपी के वोट बैंक में थोड़ी भी सेंध लगा दी तो तसवीर बदल सकती है।

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को प्रदेश की सभी 26 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पर बीजेपी के वोटों की बढ़त गिरकर 20.64 लाख पहुँच गई  थी जो साल 2012 के विधानसभा चुनावों में 24.45 लाख थी। 2017 में कांग्रेस की तुलना में बीजेपी को 7 प्रतिशत ही ज़्यादा वोट मिले। इस वजह से बीजेपी की 16 सीटें कम हुईं जबकि कांग्रेस की 18 सीटें बढ़ गयीं। बीजेपी ने ग्रामीण इलाकों की जिन 51 सीटों पर कब्जा किया है, उसमें पार्टी की बढ़त सिर्फ़ 28 प्रतिशत (8.41 लाख वोट) है। अब यदि तोगड़िया इस लीड में अपना हिस्सा निकालने में सफल हुए तो इसका असर चुनाव परिणामों पर पड़ेगा। 

तोगड़िया उत्तर प्रदेश पर भी विशेष ध्यान दे रहे हैं और यह एलान भी कर दिया है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ वाराणसी से चुनाव लड़ेंगे या मथुरा व अयोध्या से भी मैदान में उतर सकते हैं।

तोगड़िया ने लोकसभा चुनाव के लिए 41 उम्मीदवारों के नामों का एलान भी कर दिया है। गुजरात में गाँधीनगर से तोगड़िया ने अम्बरीश पटेल, अहमदाबाद पूर्व से रुसी बेकरिया, अहमदाबाद पश्चिम से आरके चौहान, कच्छ से प्रवीण चावड़ा, साबरकांठा से हंसमुख पटेल, सुरेन्द्र नगर से दारजी भाई, जूनागढ़ से गोपाल भाई, पंच महल से विजय सिंह राठौड़, दाहोद से रामसंग भाई को टिकट दिया है।

इसमें यदि 2014 के चुनावों को छोड़ दें जो कि ‘गुजराती को प्रधानमंत्री बनाना है’ के नारे के साथ लड़ा गया था तो यह कहा जा सकता है कि तोगड़िया की उपस्थिति चुनाव परिणामों को प्रभावित करेगी। 

2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अहमदाबाद पूर्व और पश्चिम की सीट क्रमशः 95 व 85 हज़ार वोटों के अंतर से जीती थी। कच्छ 70 हज़ार, साबरकांठा 17 हज़ार और पंचमहल मात्र 3 हज़ार मतों के अंतर से जीती थी। तब लोकसभा चुनाव में सुरेन्द्र नगर, जूनागढ़ और दाहोद लोकसभा सीट कांग्रेस पार्टी ने जीती थी। 

तोगड़िया ने जिन प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है, वे उनसे सामाजिक कार्य या विहिप के कार्यक्रमों के द्वारा काफ़ी लम्बे अरसे से जुड़े रहे हैं। तोगड़िया पटेल जाति से आते हैं जो कि गुजरात में बीजेपी का वोट बैंक माने जाते हैं। हार्दिक पटेल के आन्दोलन के कारण पटेल वोट बैंक में कुछ सेंध लगी है और यदि तोगड़िया उसमें और टूट करेंगे तो बीजेपी के लिए चुनावी राह आसान नहीं रहेगी। 

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