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इतिहास पर जंग और चुनाव जीतने की रणनीति

इतिहास पर जंग और चुनाव जीतने की रणनीति

उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले नेहरू जैसी शख्सियतों पर हमला क्यों किया जा रहा है और क्यों धर्म निरपेक्ष नज़रिए को छोड़ हिंदू नज़रिए से इतिहास को समझने की कोशिश हो रही है? बीजेपी के कई प्रमुख नेता कांग्रेस राज में वामपंथियों द्वारा लिखे इतिहास पर सवाल उठाते रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया और भाषणों के आगे नए सिरे से इतिहास लिखने की कोई ठोस कोशिश अब तक दिखाई नहीं पड़ी है। इसलिए लगता है कि ये सिर्फ़ चुनावी मुद्दा है।

सोशल मीडिया पर इन दिनों इतिहास को लेकर जंग फिर तेज़ हो रही है। एक के बाद एक पोस्ट के ज़रिए ये बताने की कोशिश की जा रही है कि अब तक जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है वो ग़लत है। यह भी कहा जा रहा है कि अब तक सारा इतिहास वामपंथियों ने लिखा है। और जान बूझ कर असलियत को छिपाया जाता रहा है। धर्म निरपेक्ष वामपंथी इतिहास को नकार कर हिंदू नज़रिए से इतिहास को समझने की कोशिश भी हो रही है।

इन पोस्टों को देख कर आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन्हें प्रसारित करने का काम बीजेपी और आरएसएस के अंध भक्त कर रहे हैं। वैसे तो वामपंथी इतिहासकारों को निशाने पर रखा जा रहा है लेकिन ग़ौर करने पर आसानी से यह बात सामने आती है असली निशाने पर नेहरु और उनका परिवार है। 2017 के लोकसभा चुनावों के बाद कुछ समय तक इस तरह की पोस्ट बहुत कम हो गई थीं लेकिन उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड जैसे कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव जैसे जैसे क़रीब आते जा रहे हैं वैसे वैसे इतिहास पर जंग भी तेज़ होती जा रही है।

क्यों हो रहा है नेहरू पर हमला?

नेहरू परिवार को लेकर कई पोस्ट लगातार चल रही हैं। इनमें से एक पोस्ट में बताया जा रहा है कि नेहरू परिवार असल में हिंदू था ही नहीं। वो मुसलमान थे और भारत पर राज करने के लिए हिंदू होने का दिखावा कर रहे थे। आज़ाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कोई प्राचीन इतिहास के पात्र नहीं हैं जिनके खानदान को लेकर सवाल उठाया जा सके। वो हमारे समय के हैं और उनके धर्म पर संदेह के लिए कोई जगह नहीं है फिर भी सवाल उठा कर भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है तो उसका एक सीधा राजनीतिक मतलब भी है। कांग्रेस और राहुल गांधी के नेतृत्व को संदेह के घेरे में लाने के अलावा उसका कोई और मक़सद नहीं हो सकता है।

एक पोस्ट के ज़रिए ये अफ़वाह फैलाने की कोशिश की जा रही है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पति और राहुल गांधी के दादा फ़िरोज़ गांधी मुसलमान थे। यह भी कोई प्राचीन इतिहास की बात नहीं है जिसपर संदेह किया जा सके। सबको अच्छी तरह से मालूम है कि फ़िरोज़ गांधी पारसी थे।

पारसियों का इसलाम से दूर-दूर का भी संबंध नहीं है। वास्तविकता ये है कि पारसी मूल तौर पर फ़ारस या पर्सिया के रहने वाले थे। आजकल ये क्षेत्र ईरान कहलाता है। मुसलमानों के शासन के दौरान पारसी ख़त्म कर दिए गए या फिर बेवतन होकर कई देशों में चले गए। कुछ भारत भी आए। 

मशहूर टाटा परिवार भी पारसी है। लेकिन बीजेपी और आरएसएस के अंध भक्तों ने राहुल गांधी को अपना जनेऊ दिखाने और ख़ुद को ब्राह्मण घोषित करने पर मजबूर कर दिया। तब भी ये विवाद ख़त्म नहीं हुआ।

मुग़ल वंश है निशाने पर

इनमें से कुछ पोस्ट ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत की दुर्दशा के लिए अंग्रेज़ी शासन नहीं, बल्कि मुग़ल वंश ज़िम्मेदार है। मुग़लों में भी बाबर और औरंगज़ेब पर सबसे ज़्यादा हमले होते हैं। निश्चित तौर पर बाबर का हमला और भारत की हार एक दुखद घटना है। लेकिन आज ये सोचना ज़रूरी है कि बाहर से आने वाले ज़्यादातर हमलावरों ने बार बार भारतीय राजाओं को पराजित क्यों कर दिया। बाबर ने इब्राहिम लोदी को हरा कर दिल्ली पर क़ब्ज़ा किया। इब्राहिम लोदी भी मुसलमान था।

सच ये भी है कि मुग़ल कुछ लूट कर भारत से बाहर नहीं ले गए जैसा कि अंग्रेज़ों ने किया। लेकिन अंध भक्तों के निशाने पर मुग़ल ज़्यादा होते हैं। इस क्रम में आख़री मुग़ल बहादुर शाह ज़फ़र की आज़ादी की पहली लड़ाई में दी गयी क़ुरबानी को भी नकारने की कोशिश होती है। इसका मूल मक़सद हिंदू बनाम मुसलमान की राजनीति को ज़िंदा रखना है जो बीजेपी की जीत का प्रमुख आधार है। 

सड़क के नाम पर राजनीति

यह भी बताया जा रहा है कि कांग्रेस ने नयी दिल्ली की सड़कों का नाम मुग़ल बादशाहों के नाम पर रख दिया और हिंदू विजेताओं की उपेक्षा की गयी। बीजेपी के एक प्रमुख नेता सुधांशु मित्तल का एक भाषण वायरल किया जा रहा है जिसमें वो बता रहे हैं कि नयी दिल्ली में सड़कों का नाम मुग़ल बादशाहों से लेकर राजा मानसिंह तक पर रखा गया लेकिन राणा प्रताप रोड नहीं है। सड़कों का नाम रखने का काम नगर निगम का है। नयी दिल्ली नगर निगम पर बीजेपी का क़ब्ज़ा है। वो चाहे तो नाम बदल दे। औरंगजेब रोड का नाम पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के नाम कर दिया गया। तो बाक़ी नामों को बदलने में क्या हिचक है? दरअसल ये सिर्फ़ एक राजनीतिक मुद्दा है। इसका मक़सद भी कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों को कठघरे में खड़ा रखना है। सिर्फ़ नाम की बात होती तो बीजेपी अपने एजेंडे पर आगे बढ़ती। 

उत्तर प्रदेश चुनाव पर नज़र

बीजेपी के कई प्रमुख नेता कांग्रेस राज में वामपंथियों द्वारा लिखे इतिहास पर सवाल उठाते रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया और भाषणों के आगे नए सिरे से इतिहास लिखने की कोई ठोस कोशिश अब तक दिखाई नहीं पड़ी है। इसलिए लगता है कि ये सिर्फ़ चुनावी मुद्दा है। 

अपने बहुत बुरे दिनों में भी कुछ क्षेत्रीय दलों के अलावा कांग्रेस अब भी बीजेपी के लिए चुनौती बनी हुई है। 2022 के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस पंजाब, उत्तराखंड और गोवा में बीजेपी को चुनौती देने की स्थिति में है। सबसे बड़ी लड़ाई उत्तर प्रदेश में है। यहाँ समाजवादी पार्टी मुक़ाबले में खड़ी है। बीजेपी के रणनीतिकार अच्छी तरह समझते हैं कि महँगाई और आम आदमी के मुद्दों पर बुरी तरह घिरे हुए हैं। ऐसे में बहस इतिहास पर हो और उसकी धारा हिंदू - मुसलिम विवाद की तरफ़ मोड़ दी जाय तो फ़ायदा बीजेपी को ही होगा।

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