पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर अपने लंबे पत्रकार जीवन में हल्का दक्षिणपंथी रुझान रखने वाले अपने एक वरिष्ठ साथी ने मध्य प्रांत सरकार का 1938 का एक परिपत्र भेजकर दो सवाल पूछे हैं। मध्य प्रांत और बेरार सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव द्वारा राज्य के बड़े अधिकारियों के नाम भेजे इस परिपत्र में निर्देश दिया गया है कि भविष्य में ‘मिस्टर गांधी’ को महात्मा गांधी कहा जाए। इस परिपत्र के साथ यह निर्णयात्मक वाक्य लिखने कि ‘मोहनदास को महात्मा बनाने का आदेश ही ब्रिटिश सरकार का था’ के बाद वे यह भोला सा सवाल पूछते हैं कि क्या यह कोई षडयन्त्र है या इसके पीछे कोई कहानी है।
अगर दो तीन बातों को नजरअंदाज कर जाएं तो इस सर्कुलर जैसे प्रमाण के बाद बहुत कुछ कहने को नहीं रहता। पहली बात तो यही है कि 1937 से मध्य प्रांत समेत देश के अधिकांश प्रदेशों में चुनी हुई कांग्रेसी सरकारें थीं जिनको काफी अधिकार भी थे। उनका कामकाज काफी अच्छा था और दूसरे विश्वयुद्ध में भारत को उसकी इच्छा के विपरीत शामिल किए जाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ इन सरकारों ने इस्तीफे दिए थे। और यह आदेश अगर कांग्रेस की सरकार ने जारी कराया था तो इसमें अंग्रेजों को श्रेय देने की क्या ज़रूरत है। दूसरी बड़ी बात है कि गांधी को 1915 से ही महात्मा कहा जाना शुरू कर दिया गया था और आज इस बात पर बहस है कि सबसे पहले महात्मा किसने कहा था (टैगोर, राजकुमार शुक्ल या किसी गुजराती रजवाड़े के शासक ने)। ऐसे में बीस-बाईस साल बाद शासन को इसका होश आता है तो श्रेय उसको क्यों दिया जाए?
यू-ट्यूब चैनलों में ज्यादातर मोदी विरोधी हैं, कुछेक मोदी समर्थक भी हैं। वैसे ही एक चैनल पर चले कार्यक्रम का वीडियो भेजकर अपने एक वरिष्ठ जेपीवादी साथी ने कहा कि तुमने गांधी पढ़ा है इसलिए तुमको इसका जबाब देना चाहिए। मैं ऐसे चैनल प्राय: नहीं देखता पर आग्रह के साथ ये वीडियो को देखकर हैरान था कि उसमें तिरंगे के एक कोने में ब्रिटिश यूनियन जैक का निशान दिखाते हुए गांधी को न जाने क्या क्या कहा गया था। यूनियन जैक वाली आज़ादी गांधी ही मांग सकते थे यानी इतना घटिया और हल्का काम करके ही वे गांधी बने थे। गांधी ने यह झंडा डिजाइन किया था लेकिन यह काम भी 1923 का था। आप-हम और सभी जानते हैं कि गांधी तब पूर्ण आज़ादी की जगह डोमिनियन स्टेटस की मांग कर रहे थे। उन्हें पूर्ण आजादी चाहिए थी लेकिन जब तक देश और खुद की तैयारी न हो, यह मांग उठाकर वे पूर्ण स्वतंत्रता का मजाक बनाना नहीं चाहते थे। बात इतनी सीधी है लेकिन साल गोल करते ही इस झंडे के साथ गांधी को अंग्रेजों का पिट्ठू बताना आसान हो जाता है।
एक तीसरा प्रसंग भी देना अपनी बात को ज़्यादा मज़बूती देगा। गांधी पर लंबा अध्ययन करने वाले एक हल्का दक्षिणपंथी या एंटी-मॉडरनिटी रुझान वाले अध्येता पिछले दिनों संघ समर्थक बौद्धिकों की एक सभा में गांधी पर बोलने गए। भाषण से ज्यादा सवाल-जबाब का सत्र दिलचस्प हुआ। लेकिन जब एक वरिष्ठ संघी कार्यकर्ता ने यह सवाल पूछा कि गांधी के भारत लौटने पर क्यों सारे अंग्रेजी अख़बारों ने उसकी सूचना दी, स्वागत के भाव से खबर छापी तो उस विद्वान को यह कहना पड़ा कि उनको इस बात का अंदाजा नहीं है। साथ ही उन्होंने कहा कि तब तक गांधी कम से कम ब्रिटिश दुनिया में पर्याप्त चर्चित और बड़े बन चुके थे। इस सवाल पर आयोजकों का हस्तक्षेप हुआ और कार्यक्रम समाप्त हुआ। तीन प्रसंगों से एक कड़ी बनती है और संभव है ऐसा और भी कुछ चल रहा हो। इसलिए गांधी के बचाव की नहीं, इस तरह के अभियानों की चर्चा ज़रूर करनी चाहिए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई गांधी भक्त नहीं रहा है लेकिन आज गांधी उसके लिए प्रात:स्मरणीय हैं। उस धारा से निकले दो सबसे बड़े राजनेताओं, अटलबिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी गांधी को कितना और कैसा सम्मान देते रहे हैं, यह गिनवाने का कोई मतलब नहीं है। उसे प्रधानमंत्री के सामान्य शिष्टाचार भर की चीज भी नहीं मानना चाहिए। संघ प्रमुख से लेकर ज्यादातर वरिष्ठ लोगों के व्यवहार से भी गांधी के लिए श्रद्धा टपकती है। लेकिन देश में गांधी विरोधी साहित्य की बिक्री हो या उपरोक्त तरीके से गांधी के व्यक्तित्व को ध्वस्त करने की ताजा कोशिशें, उसमें भी यह दक्षिणपंथी जमात ही आज सबसे आगे है। कुछ काम उधर से होता है और बाकी तो ले उड़ाने वाले भक्तों की पूरी फौज खाली ही बैठी है। इसमें सावरकर और गोडसे की पूजा से लेकर गांधी को नीचा दिखाने की हर कोशिश का पूरा अभियान ही दिखेगा।
गांधी ने विभाजन क्यों माना, भगत सिंह की फांसी क्यों नहीं रुकवाई, सुभाष बाबू को क्यों नहीं काम करने दिया, नेहरू की जगह सरदार पटेल को क्यों नहीं प्रधानमंत्री बनवाया, जैसे सवाल दक्षिणपंथियों के उस अभियान का हिस्सा हैं। 77 साल पहले मारे गए इस बुजुर्ग का चरित्रहनन अभियान भी साथ जुड़ा है।
इस पूरे अभियान, उससे जुड़ी चालाकियों और बेइमानियों, उसके पीछे की मंशा, गांधी पर गर्व करने की जगह उनसे घृणा और डर अनुभव करना जैसी चीजों पर बहुत कुछ कहा और लिखा जा सकता है। लेकिन गांधी और उस पर अब तक हुए बौद्धिक/अकादमिक हमलों के नतीजे देखते हुए किसी को ज़्यादा चिंता करने की ज़रूरत नहीं लगती। गांधी को सशरीर तस्वीर से हटाने का काम करके भी यह देख लिया गया है कि वह ‘बुड्ढा’ मरने या गायब होने वाला नहीं है। मरकर वह और बड़ा बनाता गया है। और गांधी पर हमला करने वाली फौज तो उसके राजनैतिक अभियान की शुरुआत से ही सक्रिय है।
दक्षिण अफ्रीका में ही उन पर दो बार शारीरिक हमला हुआ और अपने यहां उनकी मौत के पहले आठ बार गंभीर कोशिश हुई थी। लेकिन कैम्ब्रिज के इतिहासकारों की तो एक धारा ही गांधी विरोध में खड़ी हुई जो नियो-कैम्ब्रिज स्कूल तक आई। हमारी पूरी मार्क्सवादी बिरादरी गांधी को पूंजीवाद से लेकर साम्राज्यवाद का दलाल कहने तक ही नहीं रुकी, सांप्रदायिकता और अवैज्ञानिक नज़रिए के कोसती रही है। सबाल्टर्न इतिहास लेखन तो सिर्फ़ गांधी के व्यक्तित्व को ध्वस्त करने के लिए शुरू हुआ था। खुद राष्ट्रवादी इतिहास लेखकों ने भी गांधी को ज़्यादा मदद नहीं दी है। इसलिए आज अगर हमारी दक्षिणपंथी धारा के कुछ लोग सत्ता की ताक़त के सहारे गांधी के चरित्रहनन और उनको ब्रिटिश एजेंट बताने का अभियान चलाना चाहते हैं तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। इससे उनके मन मस्तिष्क का गर्द-गुबार निकलेगा और गांधी को लेकर जहर कुछ घटेगा। गांधी वैसे भी इसी तरह के विरोध के बीच और मौत के सतहत्तर साल बाद भी दुनिया में फहराते जा रहे हैं। कभी ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज नहीं डूबता था। आज दुनिया का कोई देश नहीं है जहां गांधी बाबा मुस्कुराते और शांत भाव से (मूर्तियों में ही) खड़े नजर नहीं आते। उनके राज में सूरज कभी नहीं डूबेगा।