हाथरस: क्या योगी आदित्यनाथ अंदरूनी राजनीति के शिकार हो गये? 

10:37 am Oct 04, 2020 | प्रेम कुमार - सत्य हिन्दी

हाथरस गैंगरेप में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जो कुछ किया, उसके बाद यह सवाल हर कोई एक-दूसरे से पूछ रहा है कि आखिर योगी, उनकी सरकार या बीजेपी को इससे फायदा क्या हुआ यह सवाल उठाते हुए इस वक्त 3 अक्टूबर रात 11 बजकर 19 मिनट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह का ट्वीट दिख रहा है। 

वह भी यही पूछ रहे हैं कि उन्हें पहली बात यह समझ में नहीं आयी कि पीड़ित परिवार को लाश क्यों नहीं सौंपी गयी फिर अगले दिन धारा 144 और महामारी एक्ट के तहत राहुलजी और प्रियंकाजी को परिजनों से मिलने क्यों नहीं दिया गया मीडिया को भी इसकी अनुमति क्यों नहीं दी गयी दिग्विजय सिंह ने इसे ‘बेहद मूर्खतापूर्ण’ करार दिया।

चुप क्यों रहा बीजेपी नेतृत्व

एक के बाद एक घटनाओं को ‘मूर्खतापूर्ण’ कह भर देने का मतलब ये होगा कि जो कुछ हुआ उसके लिए सिर्फ और सिर्फ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिम्मेदार हैं। सूबे के सीएम के तौर पर निश्चित रूप से जिम्मेदारी उनकी ही है। मगर, जिन घटनाओं को देश देख रहा हो, जिनसे प्रदेश और केंद्र सरकार के साथ-साथ बीजेपी की देशव्यापी छवि खराब हो रही हो, उस पर आलाकमान या बीजेपी का थिंकटैंक या फिर मोदी-शाह-नड्डा चुप कैसे रह सकते हैं मगर, वे चुप रहे। एसआईटी गठित करने के नाम पर थोड़ी सक्रियता भी दिखलायी तो वह योगी आदित्यनाथ के मुंह से ही दिखलायी। इस घटना को ज्यादा वजन नहीं दिया। आखिर क्यों 

14 सितंबर को हाथरस गैंगरेप हुआ और 29 सितंबर को पीड़िता की मौत। उसके आगे के पांच दिन यानी 3 अक्टूबर तक की घटनाओं पर गौर करने की जरूरत है। हाथरस में पीड़िता की लाश रात के अंधेरे में जबरदस्ती जला देने की घटना ने देश को स्तब्ध कर दिया। इस दौरान मीडिया को कवरेज से रोकने की कोशिश से भी गलत संदेश गया। संक्षेप में घटनाओं के क्रम पर नज़र डालते हैं- 

  • 29-30 सितंबर की दरम्यानी रात ढाई बजे हाथरस में अंतिम संस्कार, पीड़ित के परिवार को कमरे में बंद कर दिया गया, लाश देखने तक नहीं दी गयी।
  • 30 सितंबर की सुबह 10 बजकर 36 मिनट पर योगी आदित्यनाथ एसआईटी की घोषणा करते हैं। रिपोर्ट 7 दिन में देने का निर्देश।
  • 30 सितंबर को ही 10 बजकर 37 मिनट पर योगी आदित्यनाथ बताते हैं कि प्रधानमंत्री ने हाथरस की घटना पर उनसे बात की है और कहा है कि दोषियों के विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई की जाए।
  • 1 अक्टूबर को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे पर हिरासत में लिया गया। उन्हें पीड़ित परिवार के परिजनों से मिलने नहीं दिया गया।
  • 1 अक्टूबर को ही एडीजी प्रशांत कुमार का बयान आया कि एसएफएल रिपोर्ट में शुक्राणु मिलने की पुष्टि नहीं हुई है जिससे स्पष्ट होता है कि बलात्कार नहीं किया गया था। इस बयान पर विशेषज्ञों ने सवाल उठाए।
  • 2 अक्टूबर की शाम 4 बजे एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी। इस आधार पर हाथरस के एसपी, डीएसपी समेत 5 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया। दोनों पक्षों का नार्को टेस्ट कराने का फैसला योगी सरकार ने लिया।
  • मीडिया को काफी मशक्कत के बाद 3 अक्टूबर की सुबह 10 बजे पीड़िता के परिजनों से मिलने की इजाजत मिली।
  • 3 अक्टूबर को राहुल-प्रियंका हाथरस पहुंचे। परिजनों से मुलाकात की।
  • 3 अक्टूबर की रात हाथरस केस सीबीआई को देने का फैसला लिया गया।

बीजेपी की छवि को नुकसान

29 सितंबर से 3 अक्टूबर तक योगी आदित्यनाथ की सरकार अपनी फजीहत करा चुकी थी। ‘प्रधानमंत्री के निर्देश पर’ एसआईटी के गठन से लेकर सीबीआई जांच की सिफारिश तक बीजेपी और योगी सरकार की छवि को बड़ा नुकसान हो चुका था। मगर, इस नुकसान के लिए बीजेपी का थिंकटैंक तैयार था। इसके दो बेहद स्पष्ट कारण हैं- सबसे बड़ा और मजबूत कारण हैं खुद योगी आदित्यनाथ, जिनके नेतृत्व में तत्काल चुनाव का मतलब है बीजेपी की करारी हार। बीजेपी के नेता दबी जुबान में यह सच्चाई खुद बयां करते हैं। ऐसी स्थिति क्यों आयी

हाथरस की घटना को लेकर देखिए, वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह का विश्लेषण। 

योगी आदित्यनाथ सख्त प्रशासन का मॉडल देश को देने के महत्वाकांक्षी रहे हैं। इस कोशिश में उन्होंने जो कदम उठाए उनका इस्तेमाल राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी ने किया, लेकिन खुद योगी अपने ही प्रदेश में अलोकप्रिय होते चले गये। गौर करते हैं उन कदमों पर -

  • योगी आदित्यनाथ की ‘ठोको नीति’ खूब चर्चा में रही। तीन साल में 3 हजार से ज्यादा एनकाउंटर और उनमें 119 लोगों की मौत। मगर, इस नीति के बहाने ब्राह्मणों को निशाना बनाए जाने से पार्टी और संघ में बीजेपी लॉबी समेत समूचा ब्राह्मण समुदाय योगी से नाराज़ हो गया।
  • यूपी गोवध निवारण (संशोधन) अध्यादेश-2020 जिसमें गोकशी की सज़ा 10 साल और 5 लाख जुर्माने का प्रावधान है। इससे लावारिस गायों से खेतों को नुकसान की वजह से किसान और काम छिन जाने की वजह से दलित नाराज़ हुए।
  • सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों से संपत्ति के नुकसान का हर्जाना वसूलने की पहल। खुलेआम होर्डिंग लगाकर चिन्हित लोगों को बदनाम करने की नीति। और, आखिरकार रिकवरी ऑफ़ डैमेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी 2020 के रूप में अध्यादेश। इससे पैदा हुई नाराज़गी की न तो योगी और न ही बीजेपी ने कभी परवाह की।
  • सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान 23 प्रदर्शनकारियों की गोली लगने से मौत जिसकी कभी जांच नहीं हुई। इस पर हो रहे विरोध को कभी तवज्जो नहीं दी गई। 

वास्तव में योगी आदित्यनाथ आरएसएस की पसंद बनकर यूपी के सीएम बने थे अन्यथा मोदी-शाह की पसंद मनोज सिन्हा थे जो अब कश्मीर में उपराज्यपाल हैं। योगी मॉडल के तौर पर सख्त और समानांतर हिन्दुत्व की थ्योरी देने की लगातार हुई कोशिशों ने मोदी-शाह को नाखुश किया।

योगी से नाराज़ है आरएसएस

मगर, योगी मजबूत बने रहे क्योंकि संघ का आशीर्वाद लगातार उनके साथ रहा। मगर, अब ब्राह्मणों के वर्चस्व वाला आरएसएस योगी से बेहद नाराज़ है। स्थिति को समझते हुए योगी के हथियार से ही योगी पर हमला बोला गया है और इसी से जुड़ी रणनीति का नाम है- हाथरस गैंगरेप कांड के बाद की घटनाएं।

पहली बार उठी इस्तीफे की मांग

योगी आदित्यनाथ का ठाकुर प्रेम हाथरस गैंगरेप कांड में खुलकर दिखा। न घटना के बाद गैंगरेप का केस दर्ज हुआ, न ही पीड़िता का बयान दर्ज कराने में कोई चुस्ती दिखी। लापरवाही होती रही, लेकिन योगी सरकार और प्रशासन चुप रहे। मोदी-शाह के नेतृत्व ने अगर चाहा होता तो लगातार होती रही गलती किसी भी स्तर पर रोक ली जाती- चाहे वह रात के अंधेरे में लाश जलाने की बात हो या फिर मीडिया और कांग्रेस नेताओं को पीड़िता के परिजनों तक पहुंचने के लिए रोक का कदम हो। अब पहली बार पूरी गंभीरता के साथ योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे की मांग हुई है और बहुत आसान है यूपी विधानसभा चुनाव 2020 की जंग से पहले योगी आदित्यनाथ से नेतृत्व छीन लेना। 

हाथरस केस का बिहार कनेक्शन

हाथरस केस में बीजेपी नेतृत्व ने जिस दूसरी वजह से योगी आदित्यनाथ के हाथों अनहोनी होने दी वह है बिहार विधानसभा चुनाव। हाथरस की घटना के विरोध में दलित गोलबंद हुए हैं। लेकिन, इससे बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के बजाए नीतीश कुमार की जेडीयू को नुकसान अधिक होगा। गोलबंदी सवर्णों में भी हुई है। 

यूपी में जातिगत पंचायतों का दौर जारी है। इसका फायदा बिहार में बीजेपी को मिलेगा। बीजेपी के लिए ब्राह्मण विरोधी जैसा फैक्टर यूपी की तरह बिहार में नहीं है। बीजेपी की रणनीति सवर्ण वोट और वैश्य वर्ग के 24.2 प्रतिशत वोट बैंक पर है। साथ ही वह एनडीए में नीतीश कुमार की जेडीयू से बड़ा बनकर भी उभरना चाहती है। चिराग पासवान को शह देने के पीछे भी दलितों को नीतीश के ख़िलाफ़ मुखर बनाना है।

हाथरस गैंगरेप के इर्द-गिर्द जो अलोकप्रिय घटनाएं घटी हैं उन्हें समय रहते बीजेपी नेतृत्व की ओर से रोकने की कोशिश नहीं करने के पीछे ‘योगी के हाथों योगी का नुकसान’ कराने की अंदरूनी सियासत है।

हाथरस की घटना में योगी आदित्यनाथ कमजोर साबित हुए हैं। मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं, बीजेपी में अगले मुख्यमंत्री के दावेदार के तौर पर। किसके नेतृत्व में बीजेपी यूपी विधानसभा का चुनाव लड़ेगी, यह सवाल अब तक नहीं पूछा जा रहा था क्योंकि उत्तर योगी आदित्यनाथ थे। मगर, अब हाथरस की घटना के बाद यही सवाल चर्चित होने जा रहा है।