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धार्मिक प्रताड़ना के शिकार क्या सिर्फ़ तीन पड़ोसी देशों के हिन्दू हैं?

धार्मिक प्रताड़ना के शिकार क्या सिर्फ़ तीन पड़ोसी देशों के हिन्दू हैं?

गृहमंत्री अमित शाह का कहना है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के ग़ैर-हिन्दुओं का दमन किया जाता है, लिहाज़ा उन्हें भारत की नागरिकता दी जानी चाहिए। सवाल यह है कि क्या इन देशों में मुसलमानों के साथ अन्याय नहीं होता है?

नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019, पर पूरे देश में ज़ोरदार चर्चा चल रही है। यह तो सभी समझ रहे हैं कि यह विधेयक सीधे संविधान की धारा 14 के ख़िलाफ़ है और अगर यह क़ानून बन भी जाता है तो सर्वोच्च न्यायालय में इसके निरस्त होने की पूरी सम्भावना है। इस विधेयक के समर्थन में बीजेपी और उनके गृह मंत्री अमित शाह जो तर्क दे रहें हैं, उस पर ग़ौर करने की ज़रूरत है।

पहला तर्क यह है कि इस विधेयक की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि कांग्रेस ने आज़ादी के समय धर्म के आधार पर देश के बँटवारे को मंज़ूरी दी थी। देश के बँटवारे का क़ानून ब्रिटेन की संसद ने बनाया था न कि भारतीय संसद ने। उस समय भारत का संविधान और उसके अंदर धारा 14 में दिए गए बराबरी का अधिकार इत्यादि अस्तित्व में ही नहीं था। इसलिए दोनो स्थितियों की तुलना नहीं की जा सकती है।

उस वक्त कांग्रेस के ना चाहने पर भी भारत का बँटवारा हो कर ही रहता। दो राष्ट्र के सिद्धांतों का प्रचार मुसलिम लीग और हिंदू महासभा दोनों के नेता कर रहे थे। यह एक ग़ुलाम देश की मजबूरी थी। उसे स्वाधीनता चाहिए थी, जिसकी एक बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी। अब जो हम करने जा रहे हैं, वह हमारे हिंदू बहुलतावादी दंभ और मानसिक संकीर्णता को प्रदर्शित करता है।

दूसरा तर्क यह है कि भारत में रह रहे मुसलिम आबादी को इस विधेयक से कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता और उनके सारे संवैधानिक अधिकार सही सलामत रहेंगे। फ़र्क़ पड़ता है। आप मुसलमानों को यह बताने जा रहें हैं कि भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के अंदर मुसलिम अगर किसी दूसरे देश में प्रताड़ित है तो भारत में उसे नागरिकता लेने के लिए उन्हें छूट नहीं मिलेगी, जितनी नागरिकता संशोधन विधेयक के मार्फ़त ग़ैर-मुसलमानों को दी जाएगी।

धार्मिक प्रताड़ना

क्या मुसलिम पड़ोसी देशों में धार्मिक प्रताड़ना के शिकार नहीं हैं भारत में ही शिया वक़्फ़ बोर्ड ने इस विधेयक में शिया समुदाय को जोड़ने की माँग की है। क्या शिया, अहमदिया, अफ़रीदी पाकिस्तान में तथा रोहिंग्या मुसलिम म्यांमार और तमिल मुसलिम श्रीलंका में प्रताड़ित नहीं है सिर्फ़ तीन मुसलिम देशों यानी पाकिस्तान बंगलादेश और अफ़ग़ानिस्तान में ही धार्मिक प्रताड़ना हो रही है बाक़ी देश क्या दूध के धुले हैं। इस विधेयक से हम यह बतलाना चाहतें हैं कि सिर्फ़ मुसलिम देशों में ही धार्मिक प्रताड़ना हो रही है ।

शिया वक़्फ़ बोर्ड ने इस विधेयक में शिया समुदाय को जोड़ने की माँग की है। क्या नेपाल में हिंदू मधेशी प्रताड़ित नहीं है क्या बौद्ध देशों, जैसे म्यांमार, श्रीलंका, में दूसरे धर्म के लोगों की प्रताड़ना नहीं हुई है

वसुंधैव कुटुंबकम

अगर भारत जैसा बड़ा देश, वसुंधैव कुटुंब की अवधारणा का देश, धार्मिक प्रताड़ना से भागे हुए लोगों को अपने देश में नागरिकता देने की बात करे तो उसकी पूरे विश्व में प्रशंसा होगी। वह मानवता के आधार पर एक बड़ा काम होगा। पर यहाँ हम अपनी संकीर्ण सोच दिखा रहें हैं, वह भी कुछ कट्टरवादी हिंदू वर्ग को ख़ुश कर के एक स्थायी वोट बैंक का निर्माण करने के उद्देश्य से।

एक और तर्क दिया जा रहा है कि अन्य देशों के मुसलिम भारत में पुराने क़ानून की मदद से अभी भी भारत की नागरिकता ले सकते हैं। मौजूदा क़ानून के अनुसार, किसी व्यक्ति को नागरिकता पाने के लिए आवेदन की तिथि से बारह महीने पहले की अवधि के लिए भारत में निवास करना आवश्यक है और उसके पहले 14 वर्षों में 11 वर्ष तक उसे भारत में रहना चाहिए।

संशोधन विधेयक के माध्यम से नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 3(1 ) में एक नया (डी) प्रवाइज़ो लगा कर 11 वर्ष की अवधि को घटा कर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़निस्तान के ग़ैर-मुसलिम शरणार्थियों के लिए 6 वर्ष करने का प्रस्ताव है।

अगर भारत में दो अलग-अलग धर्मों के शरणार्थी आते हैं तो उनके लिए दो अलग-अलग तरह के क़ानून होंगे। मुसलिमों के लिए 11 वर्ष और ग़ैर- मुसलिमों के लिए 6 वर्ष रहना आवश्यक होगा।

अलग लोग, अलग क़ानून

भारत में नागरिकता पाने के लिए शरणार्थी को सार्वभौमिक मानवाधिकार के आधार पर नागरिकता दी जाती है। इसको धर्म के आधार पर बाँटा नहीं जा सकता है। अगर ऐसा करना है तो हमें धर्मनिरपेक्ष शब्द ही भारत के संविधान से हटा देना चाहिए ।

‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द संविधान के 1976 में हुए 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया। यह सभी धर्मों की समानता और धार्मिक सहिष्णुता सुनिश्चित करता है। भारत का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है। यह ना तो किसी धर्म को बढावा देता है, ना ही किसी से भेदभाव करता है। यह सभी धर्मों का सम्मान करता है व एक समान व्यवहार करता है।

हर व्यक्ति को अपने पसन्द के किसी भी धर्म की उपासना, पालन और प्रचार का अधिकार है। सभी नागरिकों, चाहे उनकी धार्मिक मान्यता कुछ भी हो क़ानून की नज़र में बराबर है। लेकिन धर्मनिरपेक्ष शब्द हमारे संविधान का मूल सिद्धांत है, जिसे हटाया नहीं जा  सकता। इस मामूली क़ानून के ज़रिए संविधान का ढाँचा नहीं बदल सकते। इस विधेयक को चुनौती देने वालों को यह बात न्यायालय में साबित करनी होगी कि किस तरह यह क़ानून संविधान के मूलभूत ढांचे को बदल सकता है। न्यायालय की भी एक परीक्षा होगी कि वे जो मूलभूत ढाँचे को परिभाषित करते आएँ हैं, इस विधेयक पर कैसे लागू करते हैं।

कुल मिलाकर नागरिक संशोधन विधेयक हमारे धर्मनिरपेक्ष छवि पर एक कालिख की तरह है। जिसका ज़िक्र सारे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर होगा और हमें हर जगह शर्मिंदगी झेलनी पड़ेगी। जितने भारत विरोधी देश हैं, वे इसका उदाहरण देकर हमें अपमानित करते रहेंगे। अगर भारत का नागरिक समाज और न्यायपालिका इसको रोकने में नाकाम रहा तो आने वाली नस्लें हमें शायद माफ़ न करें।

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