+
अहमदाबाद अस्पताल: सीनियर डॉक्टर आते नहीं, जूनियर डॉक्टरों को किट्स नहीं?’ 

अहमदाबाद अस्पताल: सीनियर डॉक्टर आते नहीं, जूनियर डॉक्टरों को किट्स नहीं?’ 

गुजरात की विजय रुपाणी सरकार पर आरोप लगा है कि यह अपने डॉक्टरों को पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट, एन 65 मास्क और सामान्य कारगर ग्लव्स तक नहीं दे रही है। 

कोरोना के इलाज में लापरवाही बरतने, सामान्य प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने और डॉक्टरों को सामान्य सुविधाएँ तक नहीं देने के आरोप तो गुजरात सरकार पर लगते रहे हैं। ताज़ा मामले में विजय रुपाणी सरकार पर आरोप लगा है कि यह अपने डॉक्टरों को पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट, एन 65 मास्क और सामान्य कारगर ग्लव्स तक नहीं दे रही है। 

इंडियन एक्सप्रेस ने एक ख़बर में कहा है कि अहमदाबाद सिविल अस्पताल के एक युवा रेज़ीडेन्ट डॉक्टर ने एक गुप्त चिट्ठी लिख कर पूरी बदइंतजामी के मामले को लीक कर दिया है। उस चिट्ठी में बेहद गंभीर आरोप लगाए गए हैं। 

सीनियर डॉक्टरों को परवाह नहीं

उस चिट्ठी में आरोप लगाया गया है कि ‘अस्पताल प्रशासन ने पूरा बोझ जूनियर डॉक्टरों और रेज़ीडेन्ट डॉक्टरों पर डाल रखा है। सीनियर डॉक्टर गायब हैं, वे न तो इलाज करते हैं न ही राउंड पर जाते हैं। सारा काम करने के बावजूद रेज़ीडेंट डॉक्टरों को सामान्य सुविधाएँ भी नहीं दी जा रही हैं।’ गुजरात हाईकोर्ट ने इस चिठ्ठी की स्वत: संज्ञान लिया और सरकार को तगड़ी फटकार लगायी।

ख़त में आरोप लगाया गया है, ‘हमें न तो पीपीई किट दिया जाता है न ही एन 95 मास्क। प्रसूति विभाग में सामान्य डेलीवरी के दौरान डॉक्टरो को ग्लव्स तक नहीं दिया जाता है। इसके लिए बहाने बनाए जाते हैं।’

क्या है उस गोपनीय चिट्ठी में

यह चिट्ठी जिसने लिखी है, उसका नाम गोपनीय है, पर यह साफ़ है कि वह महिला रोग विभाग यानी गायनोकोलॉजी में काम करता है या करती है। वह रेज़ीडेन्ट डॉक्टर है। उसे ग़ैर-कोरोना रोगियों के इलाज के काम में लगाया गया और वह कोरोना से संक्रमित हो गया। 

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, इस युवा डॉक्टर ने आरोप लगाया है कि अस्पताल में अमानवीय स्थितियाँ हैं, वॉर्ड की स्थिति इतनी बुरी है कि उससे रोगियों को कोरोना होने का ख़तरा है, इलाज की तो बात ही दूर है।

हाल यह है कि जो लोग यहाँ किसी दूसरे रोग के इलाज़ के लिए भी आते हैं, उनके उस रोग के ठीक होने के बजाय कोरोना से संक्रमित होने का ख़तरा है। 

आपराधिक लापरवाही

जिन्हें कोरोना हो जाए, उनके यहाँ ठीक होने की संभावना बहुत ही कम है। चिट्ठी में कहा गया है, ‘अस्पताल प्रशासन को बस इतनी ही चिंता है कि यदि रेज़ीडेन्ट डॉक्टर बीमार पड़ गए तो क्या होगा, क्योंकि सीनियर डॉक्टर तो आ ही नहीं रहे हैं।’

चिट्ठी के मुताबिक़, अस्पताल प्रशासन रेज़ीडेन्ट डॉक्टरों को प्रताड़ित करता है, उस पर पूरा बोझ डालता है और उन्हें ‘डरपोक’ और ‘कामचोर’ कहता है। 

30 डॉक्टर संक्रमित

चिट्ठी लिखने वाले ने जानकारी दी है कि उनके विभाग में 8 और उनकी यूनिट में 5 रेज़ीडेंट डॉक्टरों में कोरोना संक्रमण पाया गया है। कुल 30 रेज़ीडेंट डॉक्टर कोरोना पॉज़िटिव हैं, जिन्हें मैरियट होटल में क्वरेन्टाइन कर दिया गया है। पर अस्पताल प्रशासन ने क्वरेन्टाइन में पड़े इन डॉक्टरों का हालचाल नहीं पूछा है, किसी ने एक बार फ़ोन तक नहीं किया है। 

इस चिट्ठी में यह भी कहा गया है कि किसी रेज़ीडेंट डॉक्टर के कोरोना प़ॉजिटिव पाए जाने पर उसे तो क्वरेन्टाइन किया जाता है, पर वह जिन लोगों के संपर्क में रहता है या जिनके साथ काम करता है, उनकी जाँच नहीं की जाती है।

रेज़ीडेन्ट डॉक्टरों की भी जाँच नहीं की जाती है, उन्हें जाँच करवाने से रोका जाता है और जो जाँच करवा लेता है उसे डरपोक क़रार दिया जाता है।  यह भी दावा किया गया है कि यदि रेज़ीडेंट डॉक्टरों का कोरोना टेस्ट हो तो कम से कम आधे लोग पॉज़िटिव पाए जाएंगे। इसलिए जाँच नहीं की जाती है।

मैंने ख़ुद 3 महिलाओं की प्रसूति करवायी, 1 का ऑपरेशन किया, दूसरी 20 माताओं और उनके नवजात शिशुओं के संपर्क में आया। लेकिन मुझे कोरोना पॉज़िटिव पाए जाने के बावजूद इन लोगों का कोरोना टेस्ट नहीं किया गया। उन लोगों को ट्रेस नहीं किया गया।


रेज़ीडेंट डॉक्टर की चिट्ठी का अंश

अस्पताल में होंगे बीमार

इस डॉक्टर ने ख़त में लिखा, ‘इतनी ख़तरनाक स्थिति है कि जो लोग अस्पताल इलाज करवाने आते हैं उनके इसके उलट कोरोना से संक्रमित हो जाने की आशंका है।’

बता दें कि कोरोना से जुड़ी कई जनहित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए गुजरात हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस जे. बी. परडीवाला और जस्टिस इलेश वोरा के खंडपीठ ने राज्य सरकार को कई तरह के दिशा निर्देश दिए हैं। 

अदालत : काल कोठरी से बदतर

अदालत ने राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं की तुलना ‘डूबते हुए टाइटनिक जहाज़’ से करते हुए कहा, ‘यह बहुत ही परेशान करने वाला और दुखद है कि आज की स्थिति में अहमदाबाद के सिविल अस्पताल की स्थिति बहुत ही दयनीय है, अस्पताल रोग के इलाज के लिए होता है, पर ऐसा लगता है कि आज की तारीख़ में यह काल कोठरी जैसी है, शायद उससे भी बदतर है।’

अदालत ने इस चिट्ठी का संज्ञान लिया है और सरकार से सवाल किया है। अदालत ने कहा है ख़त का मजमून बेहद परेशान करने वाला है। अदालत ने स्वास्थ्य मंत्री और मुख्य सचिव से पूछा है कि क्या उन्हें कुछ पता है कि इस अस्पताल के रोगी और कर्मचारियों की क्या स्थिति है।

स्वास्थ्य मंत्री नितिन पटेल ने कहा है कि अदालत की कही बातों पर विचार किया गया है और इसका जवाब देने के लिए अगले हफ़्ते एक बैठक रखी गई है।

सत्य हिंदी ऐप डाउनलोड करें