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कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार का कोई विकल्प है?

कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार का कोई विकल्प है?

कांग्रेस संगठन को लेकर पिछले साल असंतुष्टों के समूह जी-23 के नेताओं ने जो सवाल उठाए थे उसकी गूंज अब कपिल सिब्बल के एक बयान से फिर से सुनाई देने लगी है। आख़िर ऐसा क्यों है? क्या कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर कोई विकल्प है?

स्वतंत्र भारत में जिन साम्प्रदायिक व विघटनवादी शक्तियों को कांग्रेस ने लगभग पचास वर्षों तक सत्ता के क़रीब आने का अवसर नहीं दिया वे भले ही ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ की अवधारणा अपने दिल में लिये बैठे हों, परन्तु हक़ीक़त तो यही है कि समयानुसार कांग्रेस पार्टी भी नए कलेवर, नए तेवर व नए नेतृत्व के साथ उभरती नज़र आ रही है। निश्चित रूप से इसी दौरान कांग्रेस कुछ ऐसे स्वार्थी नेताओं की वजह से आंतरिक उथल-पुथल के दौर से भी गुज़र रही है जो सत्ता के भूखे होने के साथ-साथ सिद्धांत व विचार विहीन भी हैं।

इसका अर्थ यह भी नहीं कि कांग्रेस इन चंद सत्ता लोभियों के पार्टी छोड़ने से समाप्त हो जायेगी। ब्रह्मानंद रेड्डी, देवराज अर्स जैसे कई विभाजन देखने व अनेकानेक दिग्गज नेताओं के किसी न किसी कारणवश पार्टी छोड़ने के बावजूद आज भी पार्टी देश के सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में क़ायम है। और इसका श्रेय सिर्फ़ और सिर्फ़ नेहरू-गांधी परिवार को ही जाता है। 2014 में कांग्रेस कैसे सत्ता से बाहर हुई, कैसे पचास वर्षों तक दर्जनों हिंदूवादी संगठनों द्वारा हिंदुत्ववाद के विस्तार व धर्म-जागरण के नाम पर देश में साम्प्रदायिकता का प्रचार-प्रसार कर, देश में ध्रुवीकरण की राजनीति कर तथा झूठ के रथ पर सवार होकर, अन्ना आंदोलन के कंधे पर बैठकर सत्ता हासिल की गयी, यह पूरा देश देख रहा है।

इन परिस्थितियों में कांग्रेस नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता का प्रदर्शन करना चाहिए, अपने नेतृत्व पर विश्वास रखना चाहिये, संगठन का विस्तार करना चाहिए और देश को साम्प्रदायिक ताक़तों के चंगुल से मुक्त कराने के लिये समान विचार वाले संगठनों व नेताओं से तालमेल बनाना चाहिये। बजाय इसके कई राज्यों में सत्ता संघर्ष छिड़ा दिखाई दे रहा है। अनेक सिद्धांत व विचार विहीन तथाकथित कांग्रेसी नेता सत्ता की लालच में उसी दल में जा पहुँचे हैं जहाँ से ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा दिया गया है। ऐसे तमाम दलबदलुओं को कुछ न कुछ 'लॉलीपॉप' दिया भी जा चुका है।

कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से पार्टी में ही कुछ ऐसे नेता अभी भी असंतुष्ट दिखाई दे रहे हैं जिनका अपना न तो कोई जनाधार है और सही मायने में तो ऐसे ही नेता पार्टी को कमज़ोर करने के ज़िम्मेदार भी हैं। इन 'असंतुष्टों' में कोई एक भी ऐसा नेता नहीं, जो वर्तमान सरकार और उसकी जनविरोधी नीतियों का पूरी ताक़त के साथ विरोध करता दिखाई दे रहा हो। 

केवल नेहरू-गाँधी परिवार विशेषकर राहुल गांधी व प्रियंका गांधी ही हैं जो हर उस जगह पहुँचते दिखाई दे रहे हैं जहाँ लोग दुःख-पीड़ा या सरकार के दमनात्मक रवैये से दुखी व परेशान हैं। सत्ता को उसके चुनावी वादों की याद भी केवल राहुल व प्रियंका गांधी करवा रहे हैं।

बड़े आश्चर्य की बात है कि इन बातों का आकलन वामपंथी युवा नेता कन्हैया कुमार व जिग्नेश मेवाणी जैसे युवा नेता तो कर रहे हैं परन्तु कांग्रेस में रहने वाले नेता इस बात को या तो समझ नहीं पा रहे या समझना नहीं चाह रहे।

वामपंथी परिवेश में पला बढ़ा एक युवा नेता तो  महसूस कर रहा है कि संविधान, लोकतंत्र तथा देश की रक्षा के लिये तथा गांधी, आंबेडकर व भगत सिंह के सपनों के भारत के निर्माण के लिये कांग्रेस का शक्तिशाली होना ज़रूरी है परन्तु कांग्रेस में पले-बढ़े व स्वार्थी, पार्टी में आयातित कुछ कांग्रेस नेताओं को उनका अहंकार, स्वार्थ, दंभ व अहम ही खाये जा रहा है।

कांग्रेस के कमज़ोर होने के बावजूद जो लोग राहुल गांधी के एक आक्रामक विपक्षी नेता के तेवरों से प्रभावित होकर तथा यह जानकर कि सत्ता की ऐश परस्ती व सुविधाओं से अभी कांग्रेस काफ़ी दूर है, उसके बावजूद कांग्रेस का दामन थाम रहे हैं वे कांग्रेस के हितैषी हैं या वे लोग जो दशकों तक सत्ता की मलाई खाने के बावजूद कांग्रेस के मात्र सात वर्षों के केंद्रीय सत्ता से बाहर रहने से घबरा कर अपनी सुविधानुसार उस दल में जा रहे हैं या जाने की फ़िराक़ में हैं जो सैद्धांतिक व वैचारिक रूप से कांग्रेस विरोधी है?

रहा सवाल कांग्रेस में 'जी हुज़ूरी' व ख़ुशामद परस्ती संस्कृति का तो यह विडंबना हमारे देश के सभी राजनैतिक दलों, संस्थाओं व संस्थानों की है। इसी संस्कृति को पहचानकर व इसका लाभ उठाकर अंग्रेज़ों ने हम पर हुकूमत की। सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने का साहस हर एक व्यक्ति नहीं कर पाता। वर्तमान सत्ता के शीर्ष को ही देख लीजिये। पूरे मंत्रिमंडल से लेकर प्रशासन तक तथा बड़े-बड़े मीडिया घराने तक एक ही व्यक्ति के समक्ष 'जी हुज़ूरी' या ख़ुशामद परस्ती ही नहीं कर रहा है, बल्कि 'साष्टांग दंडवत' की मुद्रा में हैं। हमारे यहाँ तो पल भर में नेताओं को देवी-देवताओं का रूप तक दे दिया जाता है। उनके मंदिर तक बना दिये जाते हैं। इस मानसिक प्रवृत्ति पर शीघ्र क़ाबू नहीं पाया जा सकता। निश्चित रूप से इस चाटुकार संस्कृति ने कांग्रेस को भी नुक़सान पहुँचाया है।

 - Satya Hindi

याद कीजिये 1987 में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह के विरुद्ध कांग्रेस ने इलाहबाद उपचुनाव में सुनील शास्त्री जैसे कमज़ोर उम्मीदवार को प्रत्याशी बनाया था। उस समय पार्टी की 'वर्तमान असंतुष्ट लॉबी' के इन्हीं नेताओं ने सुनील शास्त्री को प्रत्याशी बनाने की सलाह राजीव गांधी को दी थी। अन्यथा यदि इलाहाबाद की जनता व पार्टी कार्यकर्ताओं की मांग पर अमिताभ बच्चन को ही विश्वनाथ प्रताप सिंह की कथित बोफ़ोर्स रिश्वत कांड के झूठे आरोपों की चुनौती स्वीकार करने के लिये उपचुनाव में उतारा गया होता तो कांग्रेस को आज यह दिन न देखने पड़ते।

बड़ा आश्चर्य है कि नेहरू-गांधी के चित्र व उनके नाम की बैसाखी के सहारे जिन लोगों ने विधायक, सांसद, मंत्री व मुख्यमंत्री पदों तक का सफ़र तय किया वही लोग आज सिर्फ़ इसलिये इस परिवार व इनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं क्योंकि पार्टी सत्ता से दूर है?

कश्मीर से कन्याकुमारी तक कोई ऐसा कांग्रेस नेता नहीं है जो अपने चुनाव क्षेत्र में नेहरू-गाँधी परिवार के सदस्यों के चित्र अपने चुनावी बैनर्स व पोस्टर्स में छपवाये बिना चुनाव लड़ता हो। इस परिवार ने स्वतंत्रता संग्राम के समय व स्वतंत्र भारत में भी देश के लिये जो खोया है उसका मुक़ाबला कोई भी कांग्रेस नेता या उसका घराना नहीं कर सकता।

आज भी देश के किसी भी राज्य में शहर से गांवों तक में जो आकर्षण इस परिवार के नेताओं के प्रति है वह किसी नेता में नहीं। अपनी सुविधापूर्ण ज़िन्दगी को त्याग कर पार्टी को मज़बूत करने के लिये राहुल व प्रियंका गाँधी द्वारा जितनी मेहनत व मशक़्क़त की जा रही है, वह देश देख रहा है। देश को यदि कांग्रेस से कोई उम्मीद दिखाई दे रही है तो वह राहुल व प्रियंका के युवा नेतृत्व में ही नज़र आ रही है। कहना ग़लत नहीं होगा कि कांग्रेस में नेहरू गांधी परिवार का कोई विकल्प मौजूद नहीं है।

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