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म्‍यांमार में सैन्‍य तख्‍तापलट, आंग सान सू ची हिरासत में

म्‍यांमार में सैन्‍य तख्‍तापलट, आंग सान सू ची हिरासत में

म्‍यांमार में फिर से तब सैन्य तख्तापलट की आशंकाएँ छा गईं जब देश की नेता आंग सान सू ची और सत्ताधारी पार्टी के दूसरे नेताओं को हिरासत में ले लिया गया। कई दिनों से सरकार और शक्तिशाली सेना के बीच तनाव चला आ रहा है।

म्‍यांमार में फिर से तब सैन्य तख्तापलट हो गया जब देश की नेता आंग सान सू ची और सत्ताधारी पार्टी के दूसरे नेताओं को हिरासत में ले लिया गया। सेना ने एक साल के लिए देश का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया है और आपातकाल लगा दिया है। सेना ने अपने टेलीविज़न चैनल पर एक साल के आपातकाल की घोषणा की है। कई दिनों से सरकार और शक्तिशाली सेना के बीच तनाव चला आ रहा है। सेना हाल में हुए चुनावों में धांधली का आरोप लगा रही है और इसके बाद से ही तनाव नये स्तर तक बढ़ गया था। 

सेना द्वारा आपातकाल की घोषणा से पहले स्थानीय मीडिया ने नेताओं के हिरासत में लिए जाने की ख़बर दी थी और इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि सड़कों पर सेना तैनात है और फ़ोन लाइनों को बंद कर दिया गया है। सोमवार सुबह से ही नेपीडॉ में फोन लाइन काम नहीं कर रही हैं। सरकारी टीवी ने फ़ेसबुक पोस्ट कर कहा है कि वह तकनीकी कारणों से प्रसारण करने में अक्षम है। इसी कारण देश में तख्तापलट की आशंकाएँ जताई जा रही थीं। 

हालाँकि, इससे पहले रविवार को म्यांमार में तख्तापलट की साज़िश रचे जाने की ख़बरों के बीच देश की सेना ने एक दिन पहले दावा किया था कि वह संविधान की रक्षा और पालन करेगी और क़ानून के मुताबिक़ ही काम करेगी। म्यांमार में 1962 में तख्तापलट किया गया था जिसके बाद 49 साल तक सेना का शासन रहा।

नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित आंग सान सू ची 2015 में ज़बर्दस्त जीत के बाद ही सत्ता में आई थीं। इससे पहले उन्हें घर में दशकों तक नज़रबंद रखा गया। वह लोकतंत्र की लड़ाई लड़ती रहीं और इसी वजह से वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहीं। उन्हें नागरिकों के अधिकार की पैरवी करने वाली नेता के तौर पर जाना जाता रहा है। हालाँकि हाल में रोहिंग्या मामले में उनकी तीखी आलोचना की गई है। 

जब म्यांमार के रखिने प्रांत में 2017 में सेना की कार्रवाई के बाद हज़ारों रोहिंग्या ने शरणार्थी के तौर पर पलायन किया तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी आलोचना की गई। यह इसलिए कि वह नागरिक अधिकारों और लोकतंत्र की बात करती रही हैं और जिस तरह से रोहिंग्या के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई उसको लेकर उन्होंने न तो कुछ बोला और न ही इस मामले में हस्तक्षेप किया था।

रोहिंग्या के ख़िलाफ़ कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाओं के बावजूद उनके देश में उनकी प्रसिद्धि शायद कम नहीं हुई है।

ताज़ा घटनाक्रमों पर नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी यानी एनएलडी के प्रवक्ता म्यो निंट ने रायटर्स से कहा कि सेना ने देश की नेता आंग सान सू ची और राष्‍ट्रपति यू विन म्यिंट को हिरासत में लिया है। उन्होंने कहा, 'हम अपने लोगों से कहना चाहते हैं कि वे जल्दबाजी में जवाब न दें और मैं चाहता हूँ कि वे क़ानून के मुताबिक़ काम करें।' 

यह सब सोमवार सुबह ही तब हुआ है जब म्यांमार की संसद की कार्यवाही आज से ही शुरू होने वाली थी। नवंबर में चुनाव के बाद यह संसद की पहली कार्यवाही थी। चुनाव में एनएलडी ने ज़बर्दस्त जीत दर्ज की। सेना चुनाव में फर्जीवाड़ा का आरोप लगा रही है। हालाँकि म्यांमार के चुनाव आयोग ने सेना के वोटिंग में फर्जीवाड़ा के आरोपों को खारिज कर दिया है।

संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत ही संसद में भी सेना की थोड़ी बहुत पकड़ रहती है। संविधान में संसद में सेना के लिए 25% सीटों के आरक्षण की व्यवस्था है और सू की के प्रशासन में तीन प्रमुख मंत्रालय सैन्य नियंत्रण में हैं।

हालाँकि, हिरासत में लिए जाने की ख़बरों के बीच सेना की घोषणा से पहले स्‍थानीय मीडिया रिपोर्ट में कहा गया था कि सेना ने एक साल के लिए आपातकाल लगा दिया है और पूर्व जनरल तथा उपराष्‍ट्रपति मिंट स्‍वे को कार्यकारी राष्‍ट्रपति बनाया गया है। उन्‍हें सेना प्रमुख का भी दर्जा दिया गया है।

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