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मोदी की ‘सुनामी’ में ‘डूबी’ मध्य प्रदेश कांग्रेस की नाव!

मोदी की ‘सुनामी’ में ‘डूबी’ मध्य प्रदेश कांग्रेस की नाव!

छह महीने पहले राज्य विधानसभा के चुनावों में मध्य प्रदेश में सरकार बनाने वाली कांग्रेस की नैया देशव्यापी ‘मोदी लहर’ और ‘मोदी सुनामी’ के बीच हुए लोकसभा चुनाव में पूरी तरह से डूब गई। 

छह महीने पहले राज्य विधानसभा के चुनावों में मालवा और निमाड़ क्षेत्र की आधे से अधिक सीटें जीतकर मध्य प्रदेश में सरकार बनाने वाली कांग्रेस की नैया देशव्यापी ‘मोदी लहर’ और ‘मोदी सुनामी’ के बीच हुए लोकसभा चुनाव में पूरी तरह से डूब गई। 2014 के चुनाव में कांग्रेस ने राज्य की 29 में से 27 लोकसभा सीटें गँवाई थीं। इस बार कांग्रेस पिछले चुनाव में जीत दर्ज करने वाली गुना-शिवपुरी की उस सीट को भी गँवा बैठी जो सिंधिया राजपरिवार के अभेद क़िले के तौर पर विख्यात रही है। कांग्रेस इस बार कुल 28 सीटें हारीं। इनमें 26 सीटें कांग्रेस एक लाख से लेकर साढ़े पाँच लाख से कुछ ज़्यादा के विशाल अंतर से हारी।

मध्य प्रदेश विधानसभा के 2018 के चुनाव जिताने में बेहद अहम रोल अदा करने वाले मालवा और निमाड़ से मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सबसे ज़्यादा आठ चेहरों को अपने कैबिनेट में जगह दी। छह महीने बाद ही ये चेहरे (सभी आठ मंत्री) अपने-अपने क्षेत्रों में (मालवा-निमाड़ में) बुरी तरह से फ्लॉप हो गए। मालवा-निमाड़ की सभी आठ लोकसभा सीटें कांग्रेस बुरी तरह हार गई। हार का आलम यह रहा कि कमलनाथ सरकार में मंत्री अपने-अपने गढ़ भी नहीं बचा पाये।

मालवा में सबसे बड़ी जीत इंदौर में बीजेपी उम्मीदवार शंकर ललवानी ने दर्ज की। ललवानी ने आठ बार की सांसद और लोकसभा की निवर्तमान अध्यक्ष सुमित्रा महाजन द्वारा इंदौर सीट को साल 2014 में 4,66,901 वोट से जीतने के रिकॉर्ड को भी ध्वस्त कर दिया। ललवानी 5,47,754 वोट से चुनाव जीते। राज्य में सबसे ज़्यादा वोटों से जीतने का रेकॉर्ड होशंगाबाद में बीजेपी प्रत्याशी और दो बार के सांसद राव उदय प्रताप सिंह ने बनाया। उदय प्रताप ने कांग्रेस प्रत्याशी शैलेन्द्र दीवान को 5,53,682 मतों के भारी अंतर से मात दी।

साध्वी प्रज्ञा बनाम दिग्विजय सिंह

मध्य प्रदेश की हाई प्रोफ़ाइल सीट भोपाल पर पूरे देश की निगाह थी। पिछले 30 सालों से कांग्रेस भोपाल सीट को लगातार हार रही थी। इस बार प्रज्ञा सिंह ने उम्मीदवार बनने के बाद कुछ ऐसे बयान दिये, जिससे बीजेपी मुश्किल में नज़र आयी। इसके बाद भी मोदी की ‘सुनामी’ ने दिग्विजय सिंह को भोपाल में तिनके की तरह उड़ा दिया। 

दिग्विजय सिंह ने बहुत चतुराई के साथ चुनाव लड़ा। पूरे चुनाव में वह हिन्दुत्व का राग अलापते रहे। अपने पुराने ट्रैक रिकॉर्ड को दरकिनार कर पूरे चुनाव में कहीं भी उन्होंने और कांग्रेस ने ‘मुसलिम प्रेम’ वाला रिकॉर्ड नहीं बजाया। हालाँकि साध्वी प्रज्ञा सिंह ने तमाम अंतर्विरोधों और विवादास्पद बयानबाज़ी के बावजूद बीजेपी के अभेद क़िले भोपाल को 3.64 लाख से ज़्यादा वोटों के बड़े अंतर से फ़तह किया। 

गुना-शिवपुरी का नतीजा अप्रत्याशित

गुना-शिवपुरी सीट पर ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार ने कांग्रेस को सिर धुनने पर मजबूर कर दिया। यह सीट कांग्रेस के अभेद गढ़ में शुमार है। ग्वालियर राजघराने का हिस्सा रहे इस क्षेत्र में सिंधिया राजघराने का कोई भी सदस्य अब के पहले चुनाव नहीं हारा था।माधवराव सिंधिया की एक दुर्घटना में मृत्यु के बाद 2002 में ज्योतिरादित्य चुनावी राजनीति में उतरे थे। वह पहली बार 2002 के उप-चुनाव में लोकसभा के चुने गये थे। तब से वह लगातार जीतते रहे लेकिन जीतने के इस सिलसिले को गुना-शिवपुरी के वोटरों ने इस बार विराम दे दिया।

सिंधिया कैसै हार गये?

सांसद रहने के अलावा यूपीए सरकार में मंत्री रहने के दौरान भी गुना-शिवपुरी के विकास का सिंधिया ने काफ़ी काम किया। अच्छी सड़कों से लेकर मेडिकल कॉलेज तक वह इस क्षेत्र में लेकर आये। क्षेत्र का विकराल पेयजल संकट उन्होंने समाप्त करने का प्रयास किया। इसके बावजूद मोदी मैजिक ने सिंधिया को चुनावी रण में बुरी तरह धूल चटा दी। 

एक दिलचस्प बात यह भी रही कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को उस चेले (सिंधिया के सांसद प्रतिनिधि रहे) ने मात दी जो पिछले लोकसभा चुनाव तक सिंधिया खेमे के प्रचार तंत्र का हिस्सा हुआ करता था। विधानसभा के चुनाव में यादव कांग्रेस से मुंगावली का टिकट चाहते थे। सिंधिया ने टिकट नहीं दिलाया तो वह बीजेपी में चले गये। बीजेपी ने मुंगावली से टिकट दिया, लेकिन वे चुनाव हार गये। लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव में उन्होंने सिंधिया को हरा दिया। यादव ने सिंधिया को 1.25 लाख से ज़्यादा वोटों से शिकस्त दी।

ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की राजनीति के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार राकेश पाठक कहते हैं, ‘ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार सचमुच समझ से परे है। वह क्षेत्र के प्रति समर्पित थे। बेहतर काम किये। बावजूद इसके मोदी की सुनामी उन्हें ले डूबी।’ पाठक यह भी कहते हैं, ‘मोदी की सुनामी को कांग्रेस मानने को तैयार नहीं थी, सिंधिया भी इसे ‘पढ़ने’ में नाकाम रहे।’

कमलनाथ के गढ़ छिंदवाड़ा क्यों हारी कांग्रेस?

कमलनाथ के गढ़ छिंदवाड़ा को उनके बेटे नकुलनाथ ने जैसे-तैसे 37,536 वोट से जीता। इस एक सीट की जीत ने 29-0 के हालातों से कांग्रेस और कमलनाथ को ज़बरदस्त फ़ज़ीहत से बचाया। 

बहरहाल, नकुलनाथ ने छिंदवाड़ा जीतकर सक्रिय राजनीति में पहली सीढ़ी (लोकसभा में क़दम) ज़रूर रख दिया, लेकिन यह जीत - कमलनाथ के गढ़ में कमलनाथ के ओहदे के अनुरूप क़तई नहीं रही। विधानसभा 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र की सभी सात सीटों को जीता था। छह महीने के अंतराल में ही कांग्रेस इन सात में से चार सीटों को हार गई।

कुलस्ते और डामोर भर पाँच अंकों से जीते

मंडला में फग्गन सिंह कुलस्ते और रतलाम-झाबुआ सीट पर जी.एस. डामोर भर की जीत पाँच अंकों (क्रमश: 97674 और 90636) में हुई, बीजेपी के शेष 26 प्रत्याशी एक लाख से लेकर साढ़े पाँच लाख से ज़्यादा मतों के अंतर से जीतकर लोकसभा पहुँचे हैं। एक ख़ास बात इस अंतर को लेकर यह भी है कि 2014 के नतीजों के मुक़ाबले क़रीब-क़रीब हर सीट पर मध्य प्रदेश में बीजेपी की जीत का  अंतर बढ़ गया।

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